इलाहाबाद हाई कोर्ट के हिजाब फैसले पर मुस्लिम धर्मगुरुओं की तीखी प्रतिक्रिया, सुप्रीम कोर्ट जाने की सलाह
सारांश
मुख्य बातें
इलाहाबाद हाई कोर्ट के हिजाब संबंधी फैसले पर लखनऊ के प्रमुख मुस्लिम धर्मगुरुओं ने 25 अगस्त 2026 को कड़ी आपत्ति जताई है और अदालत से इस निर्णय पर पुनर्विचार करने की माँग की है। ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड सहित कई धार्मिक संगठनों ने फैसले को संविधान प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बताया है।
मुख्य प्रतिक्रियाएँ
ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना यासूब अब्बास ने कहा, 'माननीय हाई कोर्ट का जो फैसला आया है, वह बहुत अफसोस की बात है। इस्लाम में हिजाब जरूरी है, और भारत में हर धर्म और आस्था के लोग रहते हैं। सवाल यह है कि अगर कोई लड़की स्कार्फ पहनकर स्कूल जाना चाहती है, तो उसे ऐसा करने से पूरी तरह रोकना मेरी नजर में बिल्कुल गलत है, और कोर्ट को इस पर एक बार फिर से विचार करना चाहिए।' उन्होंने आगे कहा कि बोर्ड की ओर से वे इस फैसले को 'पूरी तरह से खारिज' करते हैं।
संविधान और धार्मिक अधिकारों का हवाला
मौलाना यासूब अब्बास ने संविधान का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत में हर धर्म और आस्था को समान अधिकार प्राप्त हैं। उनके अनुसार किसी लड़की को स्कार्फ पहनकर स्कूल, कॉलेज या किसी भी सार्वजनिक स्थान पर जाने से रोकना उसकी निजी स्वतंत्रता का हनन है। गौरतलब है कि हिजाब और धार्मिक पहचान से जुड़े मामले भारत में पहले भी विवाद का विषय रहे हैं, और 2022 में कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले के बाद यह मुद्दा राष्ट्रीय बहस में आया था।
मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली का रुख
मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने कहा कि हाई कोर्ट के फैसले की समीक्षा और पुनर्विचार किया जाना आवश्यक है। उनके अनुसार हिजाब या स्कार्फ पहनकर स्कूल जाने की इच्छुक छात्राओं को रोका नहीं जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हिजाब की अनुमति दी जानी चाहिए — यूनिफॉर्म और हिजाब को परस्पर विरोधी नहीं माना जाना चाहिए।
शिया धर्मगुरु और सुप्रीम कोर्ट जाने की सलाह
शिया धर्मगुरु मौलाना सैफ अब्बास ने कहा कि ड्रेस कोड से उन्हें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन हिजाब के लिए अनुमति माँगने वाली छात्रा को वह अनुमति मिलनी चाहिए। उन्होंने हाई कोर्ट की इस टिप्पणी को अस्वीकार किया कि इस्लाम में हिजाब अनिवार्य नहीं है। मौलाना सैफ अब्बास ने यह भी कहा कि उनके विचार में वकील की ओर से पक्ष सही तरीके से नहीं रखा गया और छात्रा को सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना चाहिए।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता का तर्क
मौलाना साजिद रशीदी ने एक अलग कोण से बात रखी। उन्होंने कहा कि भले ही हिजाब को इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा न माना जाए, तब भी देश में धार्मिक आजादी और निजी स्वतंत्रता का अधिकार मौजूद है। उनके अनुसार हिजाब पहनना एक व्यक्तिगत चुनाव है और इस पर न्यायिक टिप्पणी होना स्वयं में सवाल उठाता है। यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में धार्मिक पहचान और संवैधानिक अधिकारों को लेकर बहस तेज हो रही है।