एनसीएसटी का विश्वभारती विश्वविद्यालय को दूसरा नोटिस, ST प्रोफेसर नियुक्ति में अनियमितता के आरोप
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (एनसीएसटी) ने विश्वभारती विश्वविद्यालय (वीबीयू) के अधिकारियों को पुनः नोटिस जारी किया है, जिसमें बंगाली विभाग में अनुसूचित जनजाति (ST) श्रेणी के एसोसिएट प्रोफेसर पद की भर्ती प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं पर स्पष्टीकरण माँगा गया है। यह नोटिस इसलिए जारी किया गया क्योंकि विश्वविद्यालय ने फरवरी 2026 में भेजे गए पहले नोटिस का कोई जवाब नहीं दिया था।
मुख्य घटनाक्रम
कल्याणी विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर तुषार पटुआ ने जनवरी 2026 में एनसीएसटी को लिखित शिकायत दर्ज कराई थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि वीबीयू के बंगाली विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर (ST) पद के लिए आयोजित भर्ती प्रक्रिया में योग्य उम्मीदवारों को साक्षात्कार से जानबूझकर बाहर रखा गया। शिकायत के आधार पर आयोग ने जाँच प्रारंभ की और फरवरी में कुलपति से रिपोर्ट तलब की।
विश्वविद्यालय की ओर से कोई प्रतिक्रिया न मिलने पर आयोग ने अब कुलपति डॉ. प्रोबीर कुमार घोष को विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया है। वीबीयू को सात दिनों के भीतर शिकायत से संबंधित समस्त जानकारी और उठाए गए कदमों का ब्यौरा देना होगा।
आयोग की चेतावनी
एनसीएसटी ने अपने नोटिस में स्पष्ट किया है कि यदि निर्धारित समयसीमा के भीतर संतोषजनक उत्तर नहीं मिला, तो संविधान प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए विश्वविद्यालय के अधिकारियों को आयोग के समक्ष व्यक्तिगत रूप से तलब किया जा सकता है। यह चेतावनी संकेत देती है कि आयोग इस मामले को गंभीरता से ले रहा है।
विवाद की पृष्ठभूमि
जनवरी 2026 में बंगाली विभाग में सहायक एवं एसोसिएट प्रोफेसर पदों के साक्षात्कार स्थगित होने के बाद जारी प्रारंभिक सूची विवादों में आ गई थी। कई उम्मीदवारों ने चयन मानदंडों और उन्हें बाहर रखे जाने के कारणों पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए। गौरतलब है कि मई 2026 में साक्षात्कार प्रक्रिया पूरी हो गई, परंतु ST श्रेणी की नियुक्ति को लेकर विवाद थमा नहीं।
शिकायतकर्ता पटुआ का कहना है कि विश्वविद्यालय की निरंतर चुप्पी ने भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता पर और भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह ऐसे समय में आया है जब देशभर के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में आरक्षित वर्गों की भर्ती में पारदर्शिता को लेकर बहस तेज़ है।
विश्वभारती की प्रतिक्रिया
इस पूरे प्रकरण में विश्वभारती विश्वविद्यालय के अधिकारियों की ओर से अब तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। आयोग के पहले नोटिस का जवाब न देना और अब दूसरे नोटिस का सामना करना — दोनों मिलकर संस्था की जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं।
आगे क्या होगा
अब सभी पक्षों की नज़रें सात दिनों की समयसीमा पर टिकी हैं। यदि वीबीयू इस बार भी मौन रहा, तो एनसीएसटी संवैधानिक अधिकारों के तहत कुलपति सहित अन्य अधिकारियों को सीधे तलब कर सकता है। इस मामले का परिणाम केंद्रीय विश्वविद्यालयों में ST आरक्षण के क्रियान्वयन की निगरानी के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।