एनसीईआरटी पैनल में आरएसएस सदस्य: कांग्रेस-सपा ने उठाए शिक्षा में वैचारिक हस्तक्षेप के सवाल
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा राजनीतिक विज्ञान की नई पाठ्यपुस्तक तैयार करने के लिए गठित पैनल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से कथित तौर पर जुड़े चार सदस्यों को शामिल किए जाने की खबर के बाद 20 अगस्त 2026 को देशभर में राजनीतिक विवाद गहरा गया। विपक्षी दलों — विशेष रूप से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) और समाजवादी पार्टी (सपा) — ने केंद्र सरकार पर शिक्षा व्यवस्था में वैचारिक हस्तक्षेप का आरोप लगाते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी।
मुख्य घटनाक्रम
रिपोर्टों के अनुसार, एनसीईआरटी के नवगठित पैनल में आरएसएस से संबद्ध बताए जा रहे चार व्यक्तियों की नियुक्ति की गई है, जो राजनीतिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक के पुनर्लेखन में भूमिका निभाएंगे। इस खुलासे के बाद विपक्षी खेमे में हलचल मच गई और कई नेताओं ने अलग-अलग शहरों से सरकार को घेरा।
गौरतलब है कि एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकें देशभर के करोड़ों स्कूली छात्रों को पढ़ाई जाती हैं, इसलिए इनकी सामग्री और पैनल की संरचना पर उठे सवाल व्यापक सामाजिक महत्व रखते हैं।
कांग्रेस की प्रतिक्रिया
लखनऊ में कांग्रेस नेता राकेश राठौर ने कहा कि देश के तमाम संस्थानों में ऐसे लोगों की नियुक्ति की जा रही है जिनकी विचारधारा आरएसएस से जुड़ी है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है और इससे समाज में नफरत का माहौल बन रहा है।
मुंबई में कांग्रेस विधायक अमीन पटेल ने कहा कि सरकार देश के इतिहास और संविधान की मौजूदा व्याख्या को बदलना चाहती है। उन्होंने तर्क दिया कि संविधान ने नागरिकों को जो समानता और अधिकार दिए हैं, उन्हें कमज़ोर करने की कोशिश की जा रही है। पटेल ने दावा किया कि नई पीढ़ी — जिसमें जेन-ज़ी और जेन अल्फा शामिल हैं — अपने स्कूलों में सवाल पूछ रही है और शिक्षा व्यवस्था को लेकर अपनी राय रखने में सक्षम है।
कांग्रेस नेता हुसैन दलवई ने मुंबई में कहा कि इस मुद्दे को केवल चार व्यक्तियों की नियुक्ति तक सीमित करके देखना उचित नहीं होगा। उन्होंने इसे शिक्षा तंत्र में व्यापक वैचारिक प्रभाव फैलाने की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा बताया और कहा कि जनता अब ऐसी कोशिशों को समझने लगी है।
समाजवादी पार्टी का रुख
लखनऊ में सपा सांसद आरके चौधरी ने कहा कि आरएसएस की विचारधारा और संविधान की मूल भावना में मूलभूत अंतर है। उन्होंने संविधान की प्रस्तावना का हवाला देते हुए कहा कि इसमें सभी नागरिकों को समानता और न्याय का अधिकार दिया गया है। चौधरी ने आरोप लगाया कि आरएसएस एक ऐसी व्यवस्था की पक्षधर है जिसमें सदियों से चली आ रही सामाजिक असमानता बनी रहे, और शिक्षा में ऐसे विचारों को बढ़ावा देना संविधान की भावना के विरुद्ध होगा।
व्यापक संदर्भ
यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब एनसीईआरटी पाठ्यक्रम सुधार की प्रक्रिया में है और पिछले कुछ वर्षों में पाठ्यपुस्तकों में किए गए बदलावों को लेकर पहले भी विवाद हो चुके हैं। आलोचकों का कहना है कि शैक्षणिक पैनलों की संरचना में पारदर्शिता ज़रूरी है, ताकि शिक्षा का राजनीतिकरण न हो। केंद्र सरकार या एनसीईआरटी की ओर से इस विवाद पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार पैनल की संरचना और पाठ्यपुस्तक निर्माण प्रक्रिया पर क्या स्पष्टीकरण देती है।