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एनसीईआरटी पुनर्गठन विवाद: 'दशकों तक कम्युनिस्ट लिखते रहे, तब विरोध क्यों नहीं हुआ?' — पूर्व निदेशक जेएस राजपूत

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एनसीईआरटी पुनर्गठन विवाद: 'दशकों तक कम्युनिस्ट लिखते रहे, तब विरोध क्यों नहीं हुआ?' — पूर्व निदेशक जेएस राजपूत

सारांश

एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक समिति के पुनर्गठन पर विपक्ष के विरोध को पूर्व निदेशक जेएस राजपूत ने दोहरे मानदंड करार दिया — उनका सवाल है कि जब दशकों तक कम्युनिस्ट लेखक किताबें लिखते रहे तब चुप्पी क्यों थी? साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि अंतिम निर्णय हमेशा एनसीईआरटी के आंतरिक स्टाफ का होता है।

मुख्य बातें

एनसीईआरटी ने 11वीं-12वीं कक्षा की राजनीति विज्ञान पाठ्यपुस्तक समिति का पुनर्गठन किया, जिस पर एनएसयूआई और विपक्ष ने विरोध दर्ज कराया।
पूर्व निदेशक जेएस राजपूत ने कहा कि कई दशकों तक कम्युनिस्ट लेखक एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकें लिखते रहे, तब कोई विरोध नहीं हुआ।
राजपूत ने स्पष्ट किया कि बाहरी विशेषज्ञ केवल इनपुट देते हैं; पुस्तक का अंतिम अनुमोदन एनसीईआरटी स्टाफ का अधिकार है।
उन्होंने अपने कार्यकाल का उदाहरण दिया जब राजीव गांधी की हत्या से जुड़े तथ्यात्मक रूप से गलत अंश को प्रकाशन से पहले रोका गया।
सर्वोच्च न्यायालय ने भी सत्य, शांति, अहिंसा, प्रेम और धार्मिक आचरण जैसे सार्वभौमिक मूल्यों को पाठ्यक्रम में शामिल करने की सराहना की है।

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा 11वीं-12वीं कक्षा की राजनीति विज्ञान पाठ्यपुस्तक समिति के पुनर्गठन पर छिड़े विवाद के बीच, संस्था के पूर्व निदेशक जेएस राजपूत ने नई टीम की आलोचना को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि जो लोग नई समिति में आरएसएस से जुड़े सदस्यों पर आपत्ति जता रहे हैं, वे यह भूल रहे हैं कि कई दशकों तक कम्युनिस्ट विचारधारा के लेखक एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकें तैयार करते रहे और तब किसी ने विरोध नहीं किया।

विवाद की पृष्ठभूमि

एनसीईआरटी ने हाल ही में 11वीं और 12वीं कक्षा की राजनीति विज्ञान पाठ्यपुस्तकें तैयार करने वाली समिति का पुनर्गठन किया, जिसके बाद एनएसयूआई और विपक्षी दलों ने नई समिति के कुछ सदस्यों के आरएसएस से कथित जुड़ाव को लेकर प्रदर्शन किए। यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब एनसीईआरटी पाठ्यक्रम में बदलावों को लेकर पहले से ही राजनीतिक बहस जारी है।

राजपूत का पलटवार

पूर्व निदेशक जेएस राजपूत ने कहा, 'अगर कोई आरएसएस से भी जुड़ा है, तो इसका मतलब नहीं है कि वो शख्स संघ की विचारधारा के अधीन है। क्या उन्हें ये याद नहीं है कि कई दशकों तक कम्युनिस्ट एनसीईआरटी के टेक्सटबुक के लिए लिखा करते थे? क्या उस वक्त लोगों ने विरोध-प्रदर्शन किया? इसलिए वर्तमान में किए जा रहे विरोध-प्रदर्शन का कोई मतलब नहीं है।'

उन्होंने एनसीईआरटी के आंतरिक तंत्र पर ज़ोर देते हुए कहा कि बाहरी विशेषज्ञ केवल इनपुट दे सकते हैं, अंतिम निर्णय संस्था के अपने स्टाफ का होता है। उनके शब्दों में, 'मैं जब डायरेक्टर था, तो मैंने स्पष्ट तौर पर कहा था कि विशेषज्ञ बाहर से हो सकते हैं, लेखक भी हो सकते हैं, लेकिन किताब का एक-एक शब्द एनसीईआरटी के स्टाफ फाइनल करेंगे।'

राजीव गांधी प्रकरण: एनसीईआरटी की जवाबदेही का उदाहरण

राजपूत ने अपने कार्यकाल का एक महत्वपूर्ण प्रसंग साझा किया। उन्होंने बताया कि एक पाठ्यपुस्तक के अंतिम अनुमोदन के दौरान एक प्रोफेसर ने उन्हें सूचित किया कि पांडुलिपि में राजीव गांधी की हत्या को 'तमिल क्रिश्चियन' द्वारा किए जाने का उल्लेख था — एक तथ्यात्मक रूप से गलत और सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील दावा। राजपूत ने तत्काल लेखक को बुलाकर उस अंश को प्रकाशन से रोका। यह घटना उनके इस तर्क को रेखांकित करती है कि एनसीईआरटी का आंतरिक तंत्र ही अंतिम सुरक्षा कवच है।

एनसीईआरटी की विचारधारा-निरपेक्ष भूमिका

पूर्व निदेशक ने स्पष्ट किया कि एनसीईआरटी के लिए हर बच्चा भारत का बच्चा है, चाहे वह किसी भी पृष्ठभूमि से हो। उन्होंने कहा, 'एनसीईआरटी के लिए ये कहना गलत होगा कि हम इन लोगों को नहीं मानते क्योंकि ये कांग्रेस से जुड़े हैं या किसी दूसरी पार्टी से। आलोचना हमारी मदद करती है।' उन्होंने पाँच सार्वभौमिक मूल्यों — सच्चाई, शांति, अहिंसा, प्रेम और धार्मिक आचरण — का उल्लेख करते हुए कहा कि इन पर किसी भी धर्म को आपत्ति नहीं हो सकती और सर्वोच्च न्यायालय ने भी इनकी सराहना की है।

एनसीईआरटी का जनविश्वास बरकरार

राजपूत ने संस्था की साख पर भरोसा जताते हुए कहा कि 30-35 वर्ष की उम्र के आईएएस अधिकारी भी मानते हैं कि उनकी सफलता में एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों की अहम भूमिका रही। उन्होंने माना कि संस्था से जुड़े विवाद हैं, लेकिन जनता का भरोसा अभी भी बना हुआ है। आगे चलकर एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक समिति का काम और उसके परिणाम ही इस बहस का असली जवाब देंगे।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न से ध्यान हटाता है — पाठ्यपुस्तक समिति में विविध और स्वतंत्र शैक्षणिक दृष्टिकोण सुनिश्चित करने की प्रक्रिया क्या है? अतीत में हुई कथित वैचारिक एकरसता को वर्तमान की वैचारिक एकरसता के औचित्य के रूप में प्रस्तुत करना, समस्या का समाधान नहीं है। एनसीईआरटी की विश्वसनीयता इसी बात में है कि उसका आंतरिक तंत्र किसी भी बाहरी दबाव से मुक्त रहे — चाहे वह दबाव किसी भी विचारधारा का हो। असली कसौटी नई पाठ्यपुस्तकों की सामग्री होगी, न कि समिति के सदस्यों की पृष्ठभूमि।
RashtraPress
20 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक समिति पुनर्गठन विवाद क्या है?
एनसीईआरटी ने 11वीं-12वीं कक्षा की राजनीति विज्ञान पाठ्यपुस्तक तैयार करने वाली समिति का पुनर्गठन किया है। एनएसयूआई और विपक्षी दलों ने नई समिति के कुछ सदस्यों के आरएसएस से कथित जुड़ाव पर आपत्ति जताते हुए प्रदर्शन किए हैं।
पूर्व निदेशक जेएस राजपूत ने विरोध पर क्या कहा?
जेएस राजपूत ने कहा कि यह विरोध दोहरे मानदंड पर आधारित है, क्योंकि कई दशकों तक कम्युनिस्ट विचारधारा के लेखक एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकें लिखते रहे और तब किसी ने आपत्ति नहीं जताई। उनके अनुसार आरएसएस से जुड़े होने का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति उसी विचारधारा के अनुसार लिखेगा।
एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तकों में अंतिम निर्णय किसका होता है?
राजपूत के अनुसार बाहरी विशेषज्ञ और लेखक केवल इनपुट प्रदान करते हैं, लेकिन पुस्तक के हर शब्द का अंतिम अनुमोदन एनसीईआरटी के आंतरिक स्टाफ द्वारा किया जाता है। यही संस्था की जवाबदेही का मूल आधार है।
राजपूत ने राजीव गांधी से जुड़े किस प्रसंग का उल्लेख किया?
राजपूत ने बताया कि उनके कार्यकाल में एक पाठ्यपुस्तक की पांडुलिपि में राजीव गांधी की हत्या को 'तमिल क्रिश्चियन' द्वारा किए जाने का गलत उल्लेख था। एनसीईआरटी स्टाफ ने इसे पकड़ा और राजपूत ने तत्काल लेखक को बुलाकर उस अंश को प्रकाशित होने से रोका।
क्या एनसीईआरटी पर जनता का भरोसा बना हुआ है?
जेएस राजपूत के अनुसार एनसीईआरटी ने अपनी साख नहीं खोई है। उन्होंने कहा कि 30-35 वर्ष की उम्र के आईएएस अधिकारी भी मानते हैं कि उनकी सफलता में एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। विवाद हैं, लेकिन जनविश्वास बरकरार है।
राष्ट्र प्रेस
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