20 अगस्त 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक जेएस राजपूत बोले — शिक्षा विचारधारा से नहीं, समर्पण से चलनी चाहिए

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक जेएस राजपूत बोले — शिक्षा विचारधारा से नहीं, समर्पण से चलनी चाहिए

सारांश

एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक जेएस राजपूत ने खुलासा किया कि वरिष्ठ लेखकों ने 'भाजपा के साथ काम न करने' का हवाला देकर पाठ्यपुस्तक संशोधन से इनकार किया — और एक मंत्री ने खुद कहा था कि संस्था के हित में न हो तो सिफारिश मत मानो। शिक्षा में वैचारिक ध्रुवीकरण की यह स्वीकारोक्ति बड़ी बहस छेड़ती है।

मुख्य बातें

एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक जेएस राजपूत ने कहा कि संस्था को विचारधारा से ऊपर उठकर, पूर्ण समर्पण के साथ काम करना चाहिए।
एक मंत्री ने राजपूत को सलाह दी थी कि राजनीतिक सिफारिशें केवल तभी मानें जब वे एनसीईआरटी के हित में हों।
कम से कम दो वरिष्ठ लेखकों ने भाजपा के साथ काम न करने का हवाला देकर पाठ्यपुस्तक संशोधन से इनकार किया।
राजपूत ने चीन-जापान का उदाहरण देते हुए कहा कि हर देश अपना इतिहास अपने नज़रिए से लिखता है — यह स्वाभाविक है।
पाठ्यपुस्तक में मिली गलती पर राजपूत ने तुरंत सुधार किया और पाठक को धन्यवाद-पत्र लिखा — जवाबदेही का उदाहरण।
खुशवंत सिंह सहित विद्वानों ने राजपूत को बताया कि कुछ इतिहास-पुस्तकें फ़ारसी नज़रिए से लिखी गई हैं और स्थानीय स्रोतों की अनदेखी हुई।

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के पूर्व निदेशक जेएस राजपूत ने नई दिल्ली में कहा कि संस्था को किसी भी विचारधारा से ऊपर उठकर, पूर्ण समर्पण के साथ काम करना चाहिए और आलोचना को सकारात्मक दृष्टि से स्वीकार करना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि शिक्षा के क्षेत्र में राजनीतिक दबाव और वैचारिक पूर्वाग्रह दोनों ही संस्था की साख को नुकसान पहुँचाते हैं।

मंत्री की वह सलाह जिसने हिम्मत दी

राजपूत ने बताया कि उनके कार्यकाल की शुरुआत में एक मंत्री ने उन्हें स्पष्ट रूप से कहा था कि राजनीति के कारण कभी-कभी कुछ सिफारिशें आ सकती हैं, लेकिन उन्हें तभी स्वीकार करें जब वे एनसीईआरटी के हित में हों — अन्यथा अस्वीकार कर दें। उन्होंने कहा, 'उस मंत्री ने मुझे कोई नाम या कोई ऐसा काम नहीं दिया कि मुझे ये करना चाहिए या ये नहीं। इस बात ने मुझे बहुत हिम्मत दी और मैं काफी दबाव झेल सका।'

जब सरकार बदली और नए मंत्री आए, तो उन्होंने राजपूत से पूछा कि उन्हें निर्देश कौन देता था। राजपूत का उत्तर था — 'मुझे कोई निर्देश नहीं देता था। एनसीईआरटी में प्रकाशित होने वाले हर एक शब्द के लिए मैं जिम्मेदार हूँ।'

इतिहास-लेखन और वैश्विक परिप्रेक्ष्य

राजपूत ने चीन और जापान का उदाहरण देते हुए कहा कि हर देश अपना इतिहास अपने नज़रिए से लिखता है — यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। उन्होंने कहा, 'चीन जो इतिहास लिखता है, वो जापान को पसंद नहीं आएगा, और जो जापान लिख रहा है, वो साफ तौर पर चीन पसंद नहीं करेगा। ऐसा होना बहुत ही जाहिर-सी बात है।' हालाँकि उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि एनसीईआरटी को पूरी तरह संस्थागत समर्पण के साथ काम करना चाहिए।

उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि लेखक खुशवंत सिंह सहित कई विद्वानों ने उन्हें बताया कि कुछ इतिहास-पुस्तकें फ़ारसी इतिहासकारों के नज़रिए से लिखी गई हैं और स्थानीय रूप से उपलब्ध स्रोतों की अनदेखी की गई है।

विचारधारा की दीवार और लेखकों का इनकार

राजपूत ने खुलासा किया कि जब उन्होंने कुछ वरिष्ठ लेखकों से उनकी पुरानी पाठ्यपुस्तकों में संशोधन का अनुरोध किया — जो लगभग 30 वर्ष पहले लिखी गई थीं — तो उन्होंने यह कहते हुए मना कर दिया कि वे भाजपा के साथ काम नहीं करते। राजपूत के अनुसार उन्होंने स्पष्ट किया कि वे भाजपा नहीं, बल्कि एक स्वायत्त संस्था के प्रतिनिधि हैं, फिर भी दो लेखकों ने अस्वीकार कर दिया। इसके बाद उन्हें अन्य विशेषज्ञों की तलाश करनी पड़ी।

उन्होंने कहा, 'शिक्षा विचारधारा से प्रभावित नहीं होनी चाहिए।' यह टिप्पणी उस व्यापक बहस के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण है जो पाठ्यक्रम में बदलावों को लेकर वर्षों से चली आ रही है।

पाठ्यपुस्तक-निर्माण की प्रक्रिया और जवाबदेही

राजपूत ने एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक-निर्माण प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन किया। उनके अनुसार विशेषज्ञों को आमंत्रित किया जाता है, प्रोफेसर प्रारूप तैयार करते हैं, विभागाध्यक्ष और बाहरी विशेषज्ञ समीक्षा करते हैं और अंतिम मंजूरी निदेशक स्तर पर होती है। उन्होंने कहा कि उनकी भूमिका यह सुनिश्चित करना थी कि सभी चरण पूरे हों और हर सुझाव दर्ज हो।

उन्होंने एक उदाहरण दिया — एक बार उन्हें हाथ से लिखी चिट्ठी मिली जिसमें कक्षा तीन की किताब में एक चित्र का शीर्षक गलत बताया गया था। चित्र में किसान के कंधे पर हल था, लेकिन शीर्षक था 'किसान खेत में हल जोत रहा है।' राजपूत ने तुरंत काम रोककर उस व्यक्ति को धन्यवाद-पत्र लिखा और अतिरिक्त पुस्तकें भेजीं। उन्होंने कहा कि ऐसी गलतियाँ मिलती रहती हैं और अगले संस्करण में उन्हें सुधारा जाता है।

आगे की राह

राजपूत की यह टिप्पणियाँ ऐसे समय में आई हैं जब एनसीईआरटी की नई पाठ्यपुस्तकों और पाठ्यक्रम में बदलावों को लेकर शिक्षाविदों, अभिभावकों और राजनीतिक दलों के बीच तीखी बहस जारी है। उनका मानना है कि संस्थागत स्वायत्तता और पारदर्शी समीक्षा प्रक्रिया ही एनसीईआरटी की विश्वसनीयता की असली नींव है।

संपादकीय दृष्टिकोण

यानी सत्तापक्ष और विपक्ष-समर्थक बुद्धिजीवियों की ओर से, वैचारिक दबाव आता है — उस बहस को नई परत देती है जो अक्सर एकतरफा ढंग से लड़ी जाती है। जब वरिष्ठ लेखक किसी स्वायत्त संस्था के निदेशक को यह कहकर मना करें कि 'हम भाजपा के साथ काम नहीं करते', तो यह भी उतना ही चिंताजनक है जितना सरकारी दबाव। असली सवाल यह है कि क्या एनसीईआरटी के पास ऐसी संस्थागत संरचना है जो किसी भी रंग के राजनीतिक दबाव को व्यवस्थित रूप से नकार सके — व्यक्तिगत निदेशक की नैतिक दृढ़ता पर निर्भर हुए बिना। राजपूत का अनुभव बताता है कि अभी यह ढाँचा व्यक्ति-केंद्रित है, संस्था-केंद्रित नहीं।
RashtraPress
20 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जेएस राजपूत कौन हैं और एनसीईआरटी से उनका क्या संबंध है?
जेएस राजपूत राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के पूर्व निदेशक हैं। उन्होंने संस्था के उच्चतम पद पर रहते हुए पाठ्यपुस्तक-निर्माण, विशेषज्ञ चयन और संस्थागत स्वायत्तता से जुड़े अनेक निर्णय लिए।
राजपूत ने एनसीईआरटी पर राजनीतिक दबाव के बारे में क्या कहा?
राजपूत ने बताया कि एक मंत्री ने उन्हें स्वयं कहा था कि राजनीतिक सिफारिशें केवल तभी मानें जब वे संस्था के हित में हों, अन्यथा अस्वीकार कर दें। उन्होंने यह भी कहा कि एनसीईआरटी में प्रकाशित हर शब्द की जिम्मेदारी उनकी थी, किसी मंत्री की नहीं।
किन लेखकों ने एनसीईआरटी के साथ काम करने से इनकार किया और क्यों?
राजपूत ने बताया कि जब उन्होंने कुछ वरिष्ठ लेखकों से उनकी पुरानी पाठ्यपुस्तकों में संशोधन का अनुरोध किया, तो कम से कम दो लेखकों ने यह कहते हुए मना कर दिया कि वे भाजपा के साथ काम नहीं करते। राजपूत ने स्पष्ट किया कि वे भाजपा नहीं, एक स्वायत्त संस्था के प्रतिनिधि थे, लेकिन दोनों नहीं माने।
इतिहास-लेखन पर राजपूत का क्या दृष्टिकोण है?
राजपूत का मानना है कि हर देश अपना इतिहास अपने नज़रिए से लिखता है — जैसे चीन और जापान एक-दूसरे के इतिहास-लेखन से असहमत रहते हैं। उन्होंने कहा कि यह स्वाभाविक है, लेकिन एनसीईआरटी को पूरी तरह संस्थागत समर्पण और निष्पक्षता के साथ काम करना चाहिए।
एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तकों में गलतियाँ कैसे सुधारी जाती हैं?
राजपूत के अनुसार, पाठ्यपुस्तकों की समीक्षा कई चरणों में होती है — विशेषज्ञ, विभागाध्यक्ष और निदेशक स्तर पर। पाठकों, शिक्षकों और स्कूलों से भी सुझाव लिए जाते हैं और अगले संस्करण में गलतियाँ सुधारी जाती हैं। उन्होंने स्वयं एक पाठक की चिट्ठी पर तुरंत कार्रवाई कर गलत शीर्षक सुधारने का उदाहरण दिया।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 2 घंटे पहले
  2. 3 घंटे पहले
  3. 4 घंटे पहले
  4. 11 घंटे पहले
  5. 5 महीने पहले
  6. 5 महीने पहले
  7. 1 साल पहले
  8. 1 साल पहले