एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक जेएस राजपूत बोले — शिक्षा विचारधारा से नहीं, समर्पण से चलनी चाहिए
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के पूर्व निदेशक जेएस राजपूत ने नई दिल्ली में कहा कि संस्था को किसी भी विचारधारा से ऊपर उठकर, पूर्ण समर्पण के साथ काम करना चाहिए और आलोचना को सकारात्मक दृष्टि से स्वीकार करना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि शिक्षा के क्षेत्र में राजनीतिक दबाव और वैचारिक पूर्वाग्रह दोनों ही संस्था की साख को नुकसान पहुँचाते हैं।
मंत्री की वह सलाह जिसने हिम्मत दी
राजपूत ने बताया कि उनके कार्यकाल की शुरुआत में एक मंत्री ने उन्हें स्पष्ट रूप से कहा था कि राजनीति के कारण कभी-कभी कुछ सिफारिशें आ सकती हैं, लेकिन उन्हें तभी स्वीकार करें जब वे एनसीईआरटी के हित में हों — अन्यथा अस्वीकार कर दें। उन्होंने कहा, 'उस मंत्री ने मुझे कोई नाम या कोई ऐसा काम नहीं दिया कि मुझे ये करना चाहिए या ये नहीं। इस बात ने मुझे बहुत हिम्मत दी और मैं काफी दबाव झेल सका।'
जब सरकार बदली और नए मंत्री आए, तो उन्होंने राजपूत से पूछा कि उन्हें निर्देश कौन देता था। राजपूत का उत्तर था — 'मुझे कोई निर्देश नहीं देता था। एनसीईआरटी में प्रकाशित होने वाले हर एक शब्द के लिए मैं जिम्मेदार हूँ।'
इतिहास-लेखन और वैश्विक परिप्रेक्ष्य
राजपूत ने चीन और जापान का उदाहरण देते हुए कहा कि हर देश अपना इतिहास अपने नज़रिए से लिखता है — यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। उन्होंने कहा, 'चीन जो इतिहास लिखता है, वो जापान को पसंद नहीं आएगा, और जो जापान लिख रहा है, वो साफ तौर पर चीन पसंद नहीं करेगा। ऐसा होना बहुत ही जाहिर-सी बात है।' हालाँकि उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि एनसीईआरटी को पूरी तरह संस्थागत समर्पण के साथ काम करना चाहिए।
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि लेखक खुशवंत सिंह सहित कई विद्वानों ने उन्हें बताया कि कुछ इतिहास-पुस्तकें फ़ारसी इतिहासकारों के नज़रिए से लिखी गई हैं और स्थानीय रूप से उपलब्ध स्रोतों की अनदेखी की गई है।
विचारधारा की दीवार और लेखकों का इनकार
राजपूत ने खुलासा किया कि जब उन्होंने कुछ वरिष्ठ लेखकों से उनकी पुरानी पाठ्यपुस्तकों में संशोधन का अनुरोध किया — जो लगभग 30 वर्ष पहले लिखी गई थीं — तो उन्होंने यह कहते हुए मना कर दिया कि वे भाजपा के साथ काम नहीं करते। राजपूत के अनुसार उन्होंने स्पष्ट किया कि वे भाजपा नहीं, बल्कि एक स्वायत्त संस्था के प्रतिनिधि हैं, फिर भी दो लेखकों ने अस्वीकार कर दिया। इसके बाद उन्हें अन्य विशेषज्ञों की तलाश करनी पड़ी।
उन्होंने कहा, 'शिक्षा विचारधारा से प्रभावित नहीं होनी चाहिए।' यह टिप्पणी उस व्यापक बहस के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण है जो पाठ्यक्रम में बदलावों को लेकर वर्षों से चली आ रही है।
पाठ्यपुस्तक-निर्माण की प्रक्रिया और जवाबदेही
राजपूत ने एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक-निर्माण प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन किया। उनके अनुसार विशेषज्ञों को आमंत्रित किया जाता है, प्रोफेसर प्रारूप तैयार करते हैं, विभागाध्यक्ष और बाहरी विशेषज्ञ समीक्षा करते हैं और अंतिम मंजूरी निदेशक स्तर पर होती है। उन्होंने कहा कि उनकी भूमिका यह सुनिश्चित करना थी कि सभी चरण पूरे हों और हर सुझाव दर्ज हो।
उन्होंने एक उदाहरण दिया — एक बार उन्हें हाथ से लिखी चिट्ठी मिली जिसमें कक्षा तीन की किताब में एक चित्र का शीर्षक गलत बताया गया था। चित्र में किसान के कंधे पर हल था, लेकिन शीर्षक था 'किसान खेत में हल जोत रहा है।' राजपूत ने तुरंत काम रोककर उस व्यक्ति को धन्यवाद-पत्र लिखा और अतिरिक्त पुस्तकें भेजीं। उन्होंने कहा कि ऐसी गलतियाँ मिलती रहती हैं और अगले संस्करण में उन्हें सुधारा जाता है।
आगे की राह
राजपूत की यह टिप्पणियाँ ऐसे समय में आई हैं जब एनसीईआरटी की नई पाठ्यपुस्तकों और पाठ्यक्रम में बदलावों को लेकर शिक्षाविदों, अभिभावकों और राजनीतिक दलों के बीच तीखी बहस जारी है। उनका मानना है कि संस्थागत स्वायत्तता और पारदर्शी समीक्षा प्रक्रिया ही एनसीईआरटी की विश्वसनीयता की असली नींव है।