निशिकांत दुबे का कांग्रेस पर हमला: 'लगातार हार से उबर न पाने पर अभद्र भाषा का सहारा'
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसद निशिकांत दुबे ने 26 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में पत्रकारों से बात करते हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर तीखे आरोप लगाए। दुबे ने कहा कि लगातार चुनावी पराजय से उबर न पाने के कारण कांग्रेस अब अभद्र भाषा का सहारा ले रही है। उनके अनुसार, यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक मर्यादाओं के विरुद्ध है।
मुख्य आरोप और बयान
दुबे ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री और उनके दिवंगत माता-पिता के विरुद्ध अपमानजनक टिप्पणियाँ की जा रही हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी राजनीतिक नेता के परिवार के सदस्यों के बारे में इस प्रकार की भाषा का उपयोग न केवल अशोभनीय है, बल्कि लोकतांत्रिक परंपराओं के भी खिलाफ है।
ऐतिहासिक संदर्भ: वाजपेयी और इंदिरा गांधी का उदाहरण
भाजपा सांसद ने 1971-72 के दौर का उल्लेख करते हुए कहा कि बांग्लादेश युद्ध के बाद तत्कालीन अमेरिकी नेताओं हेनरी किसिंजर और रिचर्ड निक्सन ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बारे में अपमानजनक टिप्पणियाँ की थीं। उस समय विपक्ष में रहते हुए अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेताओं ने संसद में इंदिरा गांधी का पक्ष लिया था। दुबे का तर्क था कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद प्रधानमंत्री पद की गरिमा से समझौता नहीं होना चाहिए।
कांग्रेस के नेतृत्व पर निशाना
दुबे ने कहा कि मल्लिकार्जुन खड़गे से लेकर राहुल गांधी तक पार्टी का नेतृत्व संभाल रहे हैं, फिर भी कांग्रेस अपनी राजनीतिक स्थिति सुधारने में नाकाम रही है। उनके अनुसार, पार्टी का यह पतन उसे लोकतांत्रिक बहस की बजाय आपत्तिजनक भाषा की ओर धकेल रहा है।
मानहानि मामले पर सवाल
भाजपा सांसद ने मानहानि के एक मामले में राहुल गांधी के बरी होने पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि वह मामला गृह मंत्री के विरुद्ध की गई टिप्पणी से जुड़ा था और यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या एक राष्ट्रीय दल के नेता का दूसरे दल के नेता के विरुद्ध इस प्रकार की भाषा का प्रयोग लोकतांत्रिक आचरण के अनुरूप है।
लोकतांत्रिक मर्यादा पर जोर
दुबे ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में सभी राजनीतिक दलों और नेताओं को अपनी बात रखने तथा सरकार की आलोचना करने का पूरा अधिकार है। उन्होंने कहा, 'जब राजनीतिक विरोधी लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने में असमर्थ महसूस करते हैं, तो वे अभद्र भाषा का सहारा लेते हैं।' यह देखना अब शेष है कि इन आरोप-प्रत्यारोपों के बीच संसद के आगामी सत्र में दोनों पक्षों के बीच बहस का स्तर क्या रहता है।