एनएसई का ₹30,000 करोड़ का आईपीओ: एक दशक की देरी, को-लोकेशन विवाद और ऑप्शंस आय में गिरावट की चुनौती
सारांश
मुख्य बातें
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का प्रस्तावित ₹30,000 करोड़ का प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) भारतीय पूंजी बाज़ार के इतिहास का सबसे बड़ा शेयर इश्यू बनने की राह पर है — लेकिन करीब एक दशक की देरी, नियामकीय उठापटक और ऑप्शंस कारोबार में हालिया सुस्ती ने इस बहुप्रतीक्षित लिस्टिंग को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। वैल्यू रिसर्च की एक रिपोर्ट के अनुसार, एक्सचेंज की आय का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा ऑप्शंस ट्रेडिंग से आता है — और यही क्षेत्र अब भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) की कड़ी नियामकीय निगरानी में है।
को-लोकेशन विवाद: देरी की जड़
वर्ष 2010 से 2014 के बीच सामने आए को-लोकेशन विवाद ने NSE के आईपीओ की राह में सबसे बड़ा रोड़ा अटकाया। आरोप था कि कुछ ब्रोकर NSE के डेटा सेंटर में बैकअप सर्वर से पहले जुड़ जाते थे, जिससे उन्हें अन्य निवेशकों की तुलना में कुछ मिलीसेकेंड पहले बाज़ार की जानकारी मिल जाती थी। फॉरेंसिक ऑडिट में इस पैटर्न की पुष्टि हुई और सेबी ने जाँच शुरू की।
जब NSE ने वर्ष 2016 में अपना ड्राफ्ट प्रॉस्पेक्टस दाखिल किया, तब तक यह विवाद अनसुलझा था। नियामकीय अनिश्चितता के चलते आईपीओ की प्रक्रिया रोक दी गई और मामला सेबी की कार्रवाई, अपीलीय न्यायाधिकरण और अंततः सर्वोच्च न्यायालय तक जा पहुँचा।
सेटलमेंट और आईपीओ की वापसी
रिपोर्ट के अनुसार, अब यह मामला अंतिम चरण में है। NSE ने सेबी के साथ ₹1,491 करोड़ के संशोधित सेटलमेंट का प्रस्ताव रखा है, जिसे मंजूरी मिलने की संभावना जताई जा रही है। इसके बाद आईपीओ का रास्ता साफ होता दिख रहा है।
गौरतलब है कि वर्ष 2022 में आशीष चौहान की NSE में वापसी ने आईपीओ प्रक्रिया को नई गति देने में अहम भूमिका निभाई। चौहान NSE की संस्थापक टीम का हिस्सा रहे हैं और उन्होंने बीएसई (BSE) की 2017 की लिस्टिंग का नेतृत्व भी किया था। उनकी वापसी से एक्सचेंज की नियामकीय विश्वसनीयता को बल मिला।
एक दशक में आय का विस्तार
यह भी उल्लेखनीय है कि जिस दौरान NSE सूचीबद्ध नहीं हो सका, उसके कारोबार में तेज़ विस्तार हुआ। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में एक्सचेंज की आय लगभग 9 गुना बढ़ी। वर्ष 2016 में कुल आय में ट्रांजैक्शन चार्ज की हिस्सेदारी 49.5 प्रतिशत थी, जो वित्त वर्ष 2026 में बढ़कर 78.7 प्रतिशत हो गई। इस वृद्धि का सबसे बड़ा कारण डेरिवेटिव्स — विशेषकर ऑप्शंस ट्रेडिंग — में आई जबरदस्त तेज़ी रही।
नियामकीय बदलाव और आय पर असर
सेबी के आँकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 में 91 प्रतिशत रिटेल फ्यूचर्स और ऑप्शंस ट्रेडर्स को शुद्ध नुकसान हुआ, जिसकी कुल राशि करीब ₹1.1 लाख करोड़ रही। इसी पृष्ठभूमि में सेबी ने वर्ष 2024 से डेरिवेटिव्स बाज़ार में कई बदलाव लागू किए — दोनों एक्सचेंजों के सात साप्ताहिक एक्सपायरी दिनों को घटाकर एक करना, NSE के निफ्टी की एक्सपायरी मंगलवार और BSE के सेंसेक्स की एक्सपायरी गुरुवार तय करना, कॉन्ट्रैक्ट साइज़ बढ़ाना और एक्सपायरी के समय अतिरिक्त मार्जिन लागू करना शामिल है।
वित्त वर्ष 2026 इन नए नियमों के तहत पूरा संचालन करने वाला पहला साल रहा। इस दौरान NSE की परिचालन आय में करीब 3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई, जबकि समायोजित शुद्ध लाभ 17 प्रतिशत घटकर ₹9,101 करोड़ रह गया — जो पिछले वित्त वर्ष में ₹10,978 करोड़ था। इसी अवधि में इक्विटी ऑप्शंस बाज़ार में NSE की हिस्सेदारी 97 प्रतिशत से घटकर 75 प्रतिशत पर आ गई।
आगे की राह और स्थिर आय के स्रोत
रिपोर्ट के अनुसार, NSE की आय अभी भी काफी हद तक ऑप्शंस कारोबार पर निर्भर है और अन्य व्यावसायिक गतिविधियाँ इस गिरावट की भरपाई करने में सक्षम नहीं हैं। हालाँकि एक्सचेंज की कुल आय का शेष 21 प्रतिशत हिस्सा डेटा फीड्स, लिस्टिंग फीस, इंडेक्स लाइसेंसिंग और को-लोकेशन चार्जेज़ से आता है — ये अपेक्षाकृत स्थिर आय के स्रोत हैं और इनमें लगातार वृद्धि भी देखी जा रही है। सेटलमेंट को अंतिम मंजूरी मिलने के बाद आईपीओ की समयसीमा स्पष्ट होने की उम्मीद है।