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राजा पर्व पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने ओडिशा को दी बधाई, बोलीं — प्रकृति से जुड़ने का पर्व

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राजा पर्व पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने ओडिशा को दी बधाई, बोलीं — प्रकृति से जुड़ने का पर्व

सारांश

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने एक्स पर ओडिशा के अनूठे तीन दिवसीय राजा पर्व पर बधाई दी — एक ऐसा उत्सव जो धरती माता के नारीत्व का सम्मान करता है, महिलाओं को विश्राम का अधिकार देता है और मानसून के आगमन का स्वागत करता है। ओडिशा की मूल निवासी राष्ट्रपति का यह संदेश इस पर्व को राष्ट्रीय पहचान देता है।

मुख्य बातें

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने 14 जून को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर ओडिशा के राजा पर्व पर बधाई दी।
राजा पर्व ओडिशा का तीन दिवसीय नारीत्व उत्सव है, जिसमें धरती माता की पूजा की जाती है।
पर्व का नाम संस्कृत के 'रजस' शब्द से आया है; चौथे दिन 'वसुमती स्नान' की परंपरा होती है।
इन तीन दिनों में महिलाएँ काम से विश्राम लेती हैं और नई साड़ी, आभूषण व आलता से उत्सव मनाती हैं।
पुरी मंदिर में भगवान जगन्नाथ के साथ भूमि देवी की चाँदी की मूर्ति स्थापित है।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने 14 जून को ओडिशा के प्रसिद्ध तीन दिवसीय पर्व 'राजा' के अवसर पर देशवासियों और विशेष रूप से ओडिशा के लोगों को हार्दिक बधाई दी। राष्ट्रपति ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी शुभकामनाएँ साझा करते हुए इस पर्व को धरती, माँ और बादलों के सम्मान में मनाया जाने वाला मानसूनी उत्सव बताया।

राष्ट्रपति का संदेश

राष्ट्रपति मुर्मु ने अपनी पोस्ट में लिखा, 'फसल के त्योहार 'राजा' के मौके पर मैं देश के लोगों और खासकर ओडिशा के लोगों को दिल से बधाई देती हूँ।' उन्होंने आगे कहा कि पीठा, पान के पत्ते और झूला झूलने जैसी परंपराओं के बीच यह पर्व हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर रहने की सीख देता है। मुर्मु ने यह भी कामना की कि राजा पर्व की यह भावना नागरिकों को राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पित होने की प्रेरणा दे।

राजा पर्व का सांस्कृतिक महत्व

राजा पर्व ओडिशा का एक अनूठा तीन दिवसीय नारीत्व उत्सव है, जो प्रतिवर्ष जून के मध्य में मनाया जाता है। मान्यता है कि हिंदू देवी भूमि — जो देवी महालक्ष्मी का धरती माता स्वरूप हैं और भगवान विष्णु की पत्नी मानी जाती हैं — इन तीन दिनों के दौरान मासिक धर्म से गुज़रती हैं। 'राजा' शब्द संस्कृत के 'रजस' से आया है, जिसका अर्थ मासिक धर्म है।

पर्व के पहले दिन को 'पहिली राजा', दूसरे दिन को 'मिथुन संक्रांति' और तीसरे दिन को 'भुदाहा' या 'बासी राजा' कहते हैं। चौथे और अंतिम दिन 'वसुमती स्नान' मनाया जाता है, जिसमें महिलाएँ धरती माता के प्रतीक सिल-बट्टे को हल्दी का लेप लगाकर नहलाती हैं और फूल, सिंदूर से उनकी पूजा करती हैं।

परंपराएँ और रीति-रिवाज़

पर्व से ठीक एक दिन पहले 'सजाबजा' यानी तैयारी का दिन होता है, जिसमें घर और रसोई की सफाई होती है और तीन दिनों के लिए मसाले पीसे जाते हैं। इन तीन दिनों में महिलाएँ और लड़कियाँ घरेलू काम से विश्राम लेती हैं, नई साड़ी व आभूषण पहनती हैं और आलता लगाती हैं। धरती माता को हर तरह के मौसमी फल अर्पित किए जाते हैं।

गौरतलब है कि मध्यकाल में यह पर्व खेतीबाड़ी से जुड़े उत्सव के रूप में और अधिक लोकप्रिय हुआ। पुरी मंदिर में भगवान जगन्नाथ के साथ भूमि देवी की चाँदी की मूर्ति भी स्थापित है, और देवी भूमि को जगन्नाथ की पत्नी के रूप में पूजा जाता है। यह पर्व असम के 'अंबुवाची मेले' से भी समानता रखता है।

आम जनता पर असर

राजा पर्व ओडिशा में महिलाओं के लिए विशेष सामाजिक महत्व रखता है, क्योंकि यह उन्हें सांस्कृतिक सम्मान और विश्राम का अधिकार देता है। राष्ट्रपति मुर्मु — जो स्वयं ओडिशा की आदिवासी पृष्ठभूमि से आती हैं — की इस बधाई ने पर्व को राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक पहचान दिलाई है।

क्या होगा आगे

राजा पर्व के समापन के बाद ओडिशा में वसुमती स्नान की परंपरा के साथ खरीफ फसल की बुवाई के मौसम की शुरुआत मानी जाती है। राष्ट्रपति की शुभकामनाओं ने इस पारंपरिक पर्व को एक बार फिर राष्ट्रीय सांस्कृतिक विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो मुख्यधारा की सांस्कृतिक बहस में अक्सर नज़रअंदाज़ होता है। यह उल्लेखनीय है कि स्वयं ओडिशा से आने वाली राष्ट्रपति की इस पहल से क्षेत्रीय सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय मंच मिलता है — एक ऐसे समय में जब स्थानीय परंपराओं के संरक्षण की माँग ज़ोर पकड़ रही है।
RashtraPress
30 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ओडिशा का राजा पर्व क्या है?
राजा पर्व ओडिशा का तीन दिवसीय नारीत्व उत्सव है, जो जून के मध्य में मनाया जाता है। इसमें धरती माता (देवी भूमि) की पूजा होती है और महिलाएँ तीन दिनों तक काम से विश्राम लेती हैं।
राजा पर्व कितने दिनों तक मनाया जाता है और इसके दिनों के नाम क्या हैं?
राजा पर्व तीन दिनों तक मनाया जाता है — पहले दिन को 'पहिली राजा', दूसरे को 'मिथुन संक्रांति' और तीसरे को 'भुदाहा' या 'बासी राजा' कहते हैं। चौथे दिन 'वसुमती स्नान' की परंपरा होती है।
'राजा' शब्द का अर्थ क्या है?
'राजा' शब्द संस्कृत के 'रजस' से आया है, जिसका अर्थ मासिक धर्म है। मान्यता है कि इन तीन दिनों में धरती माता मासिक धर्म से गुज़रती हैं, इसलिए इस दौरान खेती का काम बंद रखा जाता है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने राजा पर्व पर क्या कहा?
राष्ट्रपति मुर्मु ने एक्स पर लिखा कि यह मानसून का मनभावन त्योहार धरती, माँ और बादलों के सम्मान में मनाया जाता है। उन्होंने कामना की कि इस पर्व की भावना नागरिकों को राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरित करे।
वसुमती स्नान की परंपरा क्या है?
वसुमती स्नान राजा पर्व का चौथा और अंतिम दिन होता है, जिसमें महिलाएँ धरती माता के प्रतीक सिल-बट्टे को हल्दी लगाकर नहलाती हैं और फूल व सिंदूर से उनकी पूजा करती हैं। इस दिन के साथ खरीफ फसल की बुवाई का मौसम भी शुरू माना जाता है।
राष्ट्र प्रेस
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