'वन नेशन, वन इलेक्शन' से क्षेत्रीय दल और संघीय ढाँचा होंगे मज़बूत: JPC अध्यक्ष पीपी चौधरी
सारांश
मुख्य बातें
'वन नेशन, वन इलेक्शन' पर गठित 41 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने 31 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में कहा कि एक साथ चुनाव कराने की प्रस्तावित व्यवस्था क्षेत्रीय राजनीतिक दलों और देश के संघीय ढाँचे को कमज़ोर नहीं, बल्कि मज़बूत करेगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस विधेयक का केंद्रीय उद्देश्य लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ सम्पन्न कराना है, और समिति इसके संवैधानिक, राजनीतिक व व्यावहारिक आयामों पर गहन विचार-विमर्श कर रही है।
समिति की कार्यप्रगति
पीपी चौधरी ने बताया कि 'वन नेशन, वन इलेक्शन' पर गठित उच्चस्तरीय समिति अब तक नई दिल्ली में 25 बैठकें कर चुकी है। इसके अतिरिक्त, समिति ने लगभग 10 राज्यों का दौरा कर विभिन्न हितधारकों के साथ व्यापक विचार-विमर्श किया है।
इन राज्य दौरों के दौरान उद्योग जगत के प्रतिनिधियों, नागरिक समाज संगठनों, राजनीतिक दलों, मुख्यमंत्रियों, उपमुख्यमंत्रियों, विधानसभा अध्यक्षों, मुख्य सचिवों और विभिन्न विभागों के सचिवों से बातचीत की गई। चौधरी के अनुसार, इन सभी पक्षों के सुझावों से समिति को अपनी रिपोर्ट तैयार करने में महत्वपूर्ण सहायता मिली है।
ऐतिहासिक संदर्भ: 1952 से 1967 तक का प्रयोग
चौधरी ने बताया कि 1952 से 1967 के बीच देश में चार आम चुनाव लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए एक साथ कराए गए थे। उस दौर में चुनावों का समन्वय बनाए रखने के लिए आठ से नौ राज्यों की विधानसभाओं को उनका कार्यकाल पूर्ण होने से पूर्व ही भंग कर दिया गया था।
उन्होंने तर्क दिया कि इससे स्पष्ट होता है कि संविधान निर्माताओं की मूल सोच में भी एक साथ चुनाव कराने की अवधारणा अंतर्निहित थी। उनके अनुसार, संविधान की भावना और मूल मंशा 'वन नेशन, वन इलेक्शन' की दिशा में ही संकेत करती है।
क्षेत्रीय दलों और संघीय ढाँचे पर आशंकाओं का जवाब
पीपी चौधरी ने माना कि इस प्रस्ताव को लेकर अक्सर यह आशंका जताई जाती है कि एक साथ चुनाव होने से क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का प्रभाव सिकुड़ सकता है और देश के संघीय ढाँचे पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
हालाँकि, उन्होंने कहा कि विशेषज्ञों ने 1967 से 2024 तक के चुनावी इतिहास का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया — जिसमें 1967, 1971, 1977, 1980, 1984 और 1989 के आम चुनाव, 1989 से 2014 तक गठबंधन सरकारों का दौर, और 2014, 2019 तथा 2024 के चुनाव शामिल हैं। इस विश्लेषण के आधार पर विशेषज्ञों का मत है कि जब लोकसभा और विधानसभा चुनाव अलग-अलग समय पर होते हैं, तो केंद्र में सत्तारूढ़ मज़बूत दल प्रायः राज्यों के चुनावों में भी बड़ी बढ़त हासिल कर लेता है — जो क्षेत्रीय दलों के लिए अधिक चुनौतीपूर्ण स्थिति पैदा करता है।
आगे की राह
समिति अभी विभिन्न विशेषज्ञों, राजनीतिक दलों, जनप्रतिनिधियों और हितधारकों के सुझावों का गहन अध्ययन कर रही है। इसका लक्ष्य एक ऐसी चुनावी व्यवस्था प्रस्तावित करना है जो देश में चुनाव प्रक्रिया को अधिक सुव्यवस्थित बनाए और राष्ट्रीय तथा राज्य स्तर पर लोकतांत्रिक संस्थाओं को सुदृढ़ करे। यह उल्लेखनीय है कि लोकसभा पहले ही इस विधेयक को 41 सदस्यीय JPC के पास विचारार्थ भेज चुकी है, और समिति की रिपोर्ट आने के बाद ही अगले कदम का निर्धारण होगा।