31 अक्टूबर 2026
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'वन नेशन, वन इलेक्शन' से क्षेत्रीय दल और संघीय ढाँचा होंगे मज़बूत: JPC अध्यक्ष पीपी चौधरी

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'वन नेशन, वन इलेक्शन' से क्षेत्रीय दल और संघीय ढाँचा होंगे मज़बूत: JPC अध्यक्ष पीपी चौधरी

सारांश

'वन नेशन, वन इलेक्शन' पर JPC अध्यक्ष पीपी चौधरी ने एक अहम तर्क पेश किया — अलग-अलग चुनाव क्षेत्रीय दलों को कमज़ोर करते हैं, न कि एक साथ चुनाव। 1952-67 के ऐतिहासिक संदर्भ और 1967-2024 के चुनावी विश्लेषण के आधार पर समिति अपनी रिपोर्ट की ओर बढ़ रही है।

मुख्य बातें

JPC अध्यक्ष पीपी चौधरी ने 31 अक्टूबर 2026 को कहा कि 'वन नेशन, वन इलेक्शन' से क्षेत्रीय दल और संघीय ढाँचा मज़बूत होंगे, कमज़ोर नहीं।
लोकसभा ने इस विधेयक को 41 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास विचारार्थ भेजा है।
समिति अब तक नई दिल्ली में 25 बैठकें कर चुकी है और लगभग 10 राज्यों का दौरा कर चुकी है।
1952 से 1967 के बीच चार आम चुनाव लोकसभा और विधानसभाओं के लिए एक साथ कराए गए थे; तब 8-9 राज्यों की विधानसभाएँ समय से पहले भंग की गई थीं।
विशेषज्ञों के विश्लेषण के अनुसार अलग-अलग चुनावों में केंद्र में सत्तारूढ़ दल राज्यों में भी बड़ी बढ़त लेता है, जो क्षेत्रीय दलों के लिए नुकसानदेह है।

'वन नेशन, वन इलेक्शन' पर गठित 41 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने 31 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में कहा कि एक साथ चुनाव कराने की प्रस्तावित व्यवस्था क्षेत्रीय राजनीतिक दलों और देश के संघीय ढाँचे को कमज़ोर नहीं, बल्कि मज़बूत करेगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस विधेयक का केंद्रीय उद्देश्य लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ सम्पन्न कराना है, और समिति इसके संवैधानिक, राजनीतिक व व्यावहारिक आयामों पर गहन विचार-विमर्श कर रही है।

समिति की कार्यप्रगति

पीपी चौधरी ने बताया कि 'वन नेशन, वन इलेक्शन' पर गठित उच्चस्तरीय समिति अब तक नई दिल्ली में 25 बैठकें कर चुकी है। इसके अतिरिक्त, समिति ने लगभग 10 राज्यों का दौरा कर विभिन्न हितधारकों के साथ व्यापक विचार-विमर्श किया है।

इन राज्य दौरों के दौरान उद्योग जगत के प्रतिनिधियों, नागरिक समाज संगठनों, राजनीतिक दलों, मुख्यमंत्रियों, उपमुख्यमंत्रियों, विधानसभा अध्यक्षों, मुख्य सचिवों और विभिन्न विभागों के सचिवों से बातचीत की गई। चौधरी के अनुसार, इन सभी पक्षों के सुझावों से समिति को अपनी रिपोर्ट तैयार करने में महत्वपूर्ण सहायता मिली है।

ऐतिहासिक संदर्भ: 1952 से 1967 तक का प्रयोग

चौधरी ने बताया कि 1952 से 1967 के बीच देश में चार आम चुनाव लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए एक साथ कराए गए थे। उस दौर में चुनावों का समन्वय बनाए रखने के लिए आठ से नौ राज्यों की विधानसभाओं को उनका कार्यकाल पूर्ण होने से पूर्व ही भंग कर दिया गया था।

उन्होंने तर्क दिया कि इससे स्पष्ट होता है कि संविधान निर्माताओं की मूल सोच में भी एक साथ चुनाव कराने की अवधारणा अंतर्निहित थी। उनके अनुसार, संविधान की भावना और मूल मंशा 'वन नेशन, वन इलेक्शन' की दिशा में ही संकेत करती है।

क्षेत्रीय दलों और संघीय ढाँचे पर आशंकाओं का जवाब

पीपी चौधरी ने माना कि इस प्रस्ताव को लेकर अक्सर यह आशंका जताई जाती है कि एक साथ चुनाव होने से क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का प्रभाव सिकुड़ सकता है और देश के संघीय ढाँचे पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

हालाँकि, उन्होंने कहा कि विशेषज्ञों ने 1967 से 2024 तक के चुनावी इतिहास का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया — जिसमें 1967, 1971, 1977, 1980, 1984 और 1989 के आम चुनाव, 1989 से 2014 तक गठबंधन सरकारों का दौर, और 2014, 2019 तथा 2024 के चुनाव शामिल हैं। इस विश्लेषण के आधार पर विशेषज्ञों का मत है कि जब लोकसभा और विधानसभा चुनाव अलग-अलग समय पर होते हैं, तो केंद्र में सत्तारूढ़ मज़बूत दल प्रायः राज्यों के चुनावों में भी बड़ी बढ़त हासिल कर लेता है — जो क्षेत्रीय दलों के लिए अधिक चुनौतीपूर्ण स्थिति पैदा करता है।

आगे की राह

समिति अभी विभिन्न विशेषज्ञों, राजनीतिक दलों, जनप्रतिनिधियों और हितधारकों के सुझावों का गहन अध्ययन कर रही है। इसका लक्ष्य एक ऐसी चुनावी व्यवस्था प्रस्तावित करना है जो देश में चुनाव प्रक्रिया को अधिक सुव्यवस्थित बनाए और राष्ट्रीय तथा राज्य स्तर पर लोकतांत्रिक संस्थाओं को सुदृढ़ करे। यह उल्लेखनीय है कि लोकसभा पहले ही इस विधेयक को 41 सदस्यीय JPC के पास विचारार्थ भेज चुकी है, और समिति की रिपोर्ट आने के बाद ही अगले कदम का निर्धारण होगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

राजनीतिक रूप से चतुर है — यह विपक्ष की उस केंद्रीय आपत्ति को ही पलटने का प्रयास है जो JPC के सामने सबसे बड़ी बाधा है। लेकिन यह तर्क अधूरा है: विशेषज्ञों के चुनावी आँकड़े यह नहीं बताते कि एक साथ मतदान में 'कोट-टेल इफेक्ट' कम होगा या ज़्यादा — दुनियाभर के तुलनात्मक अध्ययनों में यह बहस अनसुलझी है। इसके अलावा, यह प्रस्ताव किसी राज्य सरकार के समय से पहले गिरने की स्थिति में क्या होगा — इस संवैधानिक प्रश्न का ठोस उत्तर अभी सामने नहीं आया है। 25 बैठकें और 10 राज्यों के दौरे प्रक्रियागत गंभीरता दर्शाते हैं, पर असली कसौटी वह रिपोर्ट होगी जो यह तय करेगी कि क्या इस विचार को संविधान संशोधन की कठिन राह से गुज़ारा जा सकता है।
RashtraPress
31 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'वन नेशन, वन इलेक्शन' JPC क्या है और इसका काम क्या है?
यह 41 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति (JPC) है जिसे लोकसभा ने 'वन नेशन, वन इलेक्शन' विधेयक पर विचार के लिए गठित किया है। इसका उद्देश्य लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के संवैधानिक, राजनीतिक और व्यावहारिक पहलुओं का अध्ययन कर रिपोर्ट तैयार करना है।
JPC अध्यक्ष पीपी चौधरी ने क्षेत्रीय दलों की आशंका पर क्या कहा?
पीपी चौधरी ने कहा कि विशेषज्ञों के 1967 से 2024 तक के चुनावी विश्लेषण से पता चलता है कि अलग-अलग चुनावों में केंद्र का सत्तारूढ़ दल राज्यों में भी बड़ी जीत हासिल कर लेता है, जिससे क्षेत्रीय दल कमज़ोर पड़ते हैं। उनके अनुसार, एक साथ चुनाव इस प्रवृत्ति को संतुलित कर सकते हैं।
भारत में पहले एक साथ चुनाव कब और कैसे हुए थे?
1952 से 1967 के बीच देश में चार बार लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए गए थे। उस दौरान समन्वय बनाए रखने के लिए 8 से 9 राज्यों की विधानसभाएँ कार्यकाल पूरा होने से पहले भंग कर दी गई थीं।
JPC ने अब तक क्या-क्या कार्यवाही की है?
समिति अब तक नई दिल्ली में 25 बैठकें कर चुकी है और लगभग 10 राज्यों का दौरा कर उद्योग प्रतिनिधियों, नागरिक समाज, राजनीतिक दलों, मुख्यमंत्रियों, उपमुख्यमंत्रियों और वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों से विचार-विमर्श किया है।
इस प्रस्ताव पर आगे क्या होगा?
JPC विभिन्न पक्षों से प्राप्त सुझावों का अध्ययन कर अपनी अंतिम रिपोर्ट तैयार करेगी। रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद संसद में अगले विधायी चरण का निर्धारण होगा; समिति की रिपोर्ट की समयसीमा अभी घोषित नहीं की गई है।
राष्ट्र प्रेस
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