पीए संगमा: विपक्ष के उम्मीदवार को सत्ता पक्ष का समर्थन, तीन PM के कार्यकाल में रहे लोकसभा अध्यक्ष
सारांश
मुख्य बातें
पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पूर्णो अगितोक संगमा (पीए संगमा) भारतीय संसदीय इतिहास के उन विरले नेताओं में से हैं, जिन्हें विपक्ष का उम्मीदवार होते हुए भी सत्ताधारी दल का समर्थन मिला। मई 1996 से मार्च 1998 तक के अपने कार्यकाल में उन्होंने तीन प्रधानमंत्रियों — अटल बिहारी वाजपेयी, एचडी देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल — के साथ काम किया, और हर बार लोकसभा अध्यक्ष पद की गरिमा को अक्षुण्ण रखा। पूर्वोत्तर भारत से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति की सर्वोच्च संसदीय कुर्सी तक पहुँचने वाले संगमा का जीवन स्वयं एक मिसाल है।
संसदीय इतिहास में अभूतपूर्व क्षण
भारतीय राजनीति में 1996 का वर्ष गठबंधन की राजनीति के एक नए युग की शुरुआत का था। भारतीय जनता पार्टी (BJP) सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी और अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। विश्वास मत से पूर्व लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव की बारी आई, तो विपक्ष ने पीए संगमा को अपना उम्मीदवार घोषित किया।
संसदीय इतिहास में यह पहला ऐसा अवसर था जब तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी की सरकार ने विपक्षी उम्मीदवार संगमा को ही अपना समर्थन दे दिया। इस असाधारण राजनीतिक सहमति ने संगमा को सर्वसम्मति के निकट लोकसभा अध्यक्ष की कुर्सी पर बिठाया — एक ऐसी मिसाल जो भारतीय लोकतंत्र में आज भी उद्धृत की जाती है।
तीन प्रधानमंत्रियों के साथ निष्पक्ष कार्यकाल
संगमा का अध्यक्ष-काल राजनीतिक उथल-पुथल से भरा रहा। मई 1996 से मार्च 1998 के बीच केंद्र में तीन अलग-अलग विचारधाराओं के प्रधानमंत्री बदले, लेकिन संगमा ने पद की निष्पक्षता और संसदीय शुचिता से कोई समझौता नहीं किया। उनकी कानूनी पृष्ठभूमि, सांसद और मंत्री के रूप में लंबे अनुभव तथा स्वाभाविक बुद्धिमत्ता ने उन्हें इस जटिल दौर में भी एक सशक्त पीठासीन अधिकारी बनाए रखा।
साधारण पृष्ठभूमि से असाधारण यात्रा
पूर्णो अगितोक संगमा का जन्म 1 सितंबर 1947 को मेघालय के पश्चिमी गारो हिल्स जिले के चपाहाटी गाँव में हुआ था। बचपन संघर्षों में बीता, किंतु उनके दृढ़ संकल्प ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय संबंधों में स्नातकोत्तर और कानून की डिग्री तक पहुँचाया। शिक्षक के रूप में करियर शुरू कर उन्होंने 1977 में मेघालय की तुरा लोकसभा सीट से पहली बार संसद में प्रवेश किया और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
गौरतलब है कि पूर्वोत्तर भारत से आने वाले नेताओं का राष्ट्रीय राजनीति में इस स्तर तक पहुँचना उस दौर में विशेष रूप से उल्लेखनीय था। संगमा ने मेघालय के मुख्यमंत्री के रूप में भी अपनी प्रशासनिक क्षमता का परिचय दिया।
राजनीतिक दूरदर्शिता और अंतिम वर्ष
संगमा की राजनीतिक दूरदर्शिता पद से बाहर भी स्पष्ट दिखी। 2014 के लोकसभा चुनाव परिणामों से पूर्व 12 मई को उन्होंने तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी। रिपोर्टों के अनुसार, उस मुलाकात के बाद उन्होंने कहा था कि वे 'भावी प्रधानमंत्री' से मिलने गए थे — एक ऐसा कथन जो बाद में सटीक साबित हुआ।
2012 में संगमा ने राष्ट्रपति चुनाव भी लड़ा, जिसमें विपक्ष के कई दलों ने उन्हें समर्थन दिया। 4 मार्च 2016 को हृदयाघात के कारण उनका निधन हो गया। 2017 में भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत पद्म विभूषण से सम्मानित किया — देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान से उनकी विरासत को औपचारिक मान्यता मिली।
विरासत और महत्व
पीए संगमा का जीवन यह स्थापित करता है कि संसदीय लोकतंत्र में पद की गरिमा राजनीतिक दलगत निष्ठाओं से ऊपर हो सकती है। उनका कार्यकाल आज भी इस बात का प्रमाण है कि सर्वसम्मति और निष्पक्षता, राजनीतिक विविधता के बावजूद, संभव है। पूर्वोत्तर भारत के लिए वे एक स्थायी प्रेरणास्रोत बने रहेंगे।