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पीए संगमा: विपक्ष के उम्मीदवार को सत्ता पक्ष का समर्थन, तीन PM के कार्यकाल में रहे लोकसभा अध्यक्ष

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पीए संगमा: विपक्ष के उम्मीदवार को सत्ता पक्ष का समर्थन, तीन PM के कार्यकाल में रहे लोकसभा अध्यक्ष

सारांश

भारतीय संसदीय इतिहास में वह क्षण अभूतपूर्व था — विपक्ष के उम्मीदवार पीए संगमा को सत्ताधारी वाजपेयी सरकार का समर्थन मिला। मेघालय के एक छोटे गाँव से निकलकर लोकसभा की सर्वोच्च पीठ तक पहुँचे संगमा ने तीन प्रधानमंत्रियों के बीच संसदीय गरिमा की मिसाल कायम की।

मुख्य बातें

पीए संगमा मई 1996 से मार्च 1998 तक लोकसभा अध्यक्ष रहे — इस दौरान तीन प्रधानमंत्री (वाजपेयी, देवगौड़ा, गुजराल) बदले।
संसदीय इतिहास में पहली बार सत्ताधारी वाजपेयी सरकार ने विपक्षी उम्मीदवार संगमा को लोकसभा अध्यक्ष पद के लिए समर्थन दिया।
जन्म 1 सितंबर 1947 को मेघालय के पश्चिमी गारो हिल्स के चपाहाटी गाँव में; 1977 में पहली बार तुरा सीट से सांसद बने।
2012 में राष्ट्रपति चुनाव लड़ा; 4 मार्च 2016 को हृदयाघात से निधन।
2017 में भारत सरकार ने मरणोपरांत पद्म विभूषण से सम्मानित किया।

पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पूर्णो अगितोक संगमा (पीए संगमा) भारतीय संसदीय इतिहास के उन विरले नेताओं में से हैं, जिन्हें विपक्ष का उम्मीदवार होते हुए भी सत्ताधारी दल का समर्थन मिला। मई 1996 से मार्च 1998 तक के अपने कार्यकाल में उन्होंने तीन प्रधानमंत्रियोंअटल बिहारी वाजपेयी, एचडी देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल — के साथ काम किया, और हर बार लोकसभा अध्यक्ष पद की गरिमा को अक्षुण्ण रखा। पूर्वोत्तर भारत से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति की सर्वोच्च संसदीय कुर्सी तक पहुँचने वाले संगमा का जीवन स्वयं एक मिसाल है।

संसदीय इतिहास में अभूतपूर्व क्षण

भारतीय राजनीति में 1996 का वर्ष गठबंधन की राजनीति के एक नए युग की शुरुआत का था। भारतीय जनता पार्टी (BJP) सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी और अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। विश्वास मत से पूर्व लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव की बारी आई, तो विपक्ष ने पीए संगमा को अपना उम्मीदवार घोषित किया।

संसदीय इतिहास में यह पहला ऐसा अवसर था जब तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी की सरकार ने विपक्षी उम्मीदवार संगमा को ही अपना समर्थन दे दिया। इस असाधारण राजनीतिक सहमति ने संगमा को सर्वसम्मति के निकट लोकसभा अध्यक्ष की कुर्सी पर बिठाया — एक ऐसी मिसाल जो भारतीय लोकतंत्र में आज भी उद्धृत की जाती है।

तीन प्रधानमंत्रियों के साथ निष्पक्ष कार्यकाल

संगमा का अध्यक्ष-काल राजनीतिक उथल-पुथल से भरा रहा। मई 1996 से मार्च 1998 के बीच केंद्र में तीन अलग-अलग विचारधाराओं के प्रधानमंत्री बदले, लेकिन संगमा ने पद की निष्पक्षता और संसदीय शुचिता से कोई समझौता नहीं किया। उनकी कानूनी पृष्ठभूमि, सांसद और मंत्री के रूप में लंबे अनुभव तथा स्वाभाविक बुद्धिमत्ता ने उन्हें इस जटिल दौर में भी एक सशक्त पीठासीन अधिकारी बनाए रखा।

साधारण पृष्ठभूमि से असाधारण यात्रा

पूर्णो अगितोक संगमा का जन्म 1 सितंबर 1947 को मेघालय के पश्चिमी गारो हिल्स जिले के चपाहाटी गाँव में हुआ था। बचपन संघर्षों में बीता, किंतु उनके दृढ़ संकल्प ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय संबंधों में स्नातकोत्तर और कानून की डिग्री तक पहुँचाया। शिक्षक के रूप में करियर शुरू कर उन्होंने 1977 में मेघालय की तुरा लोकसभा सीट से पहली बार संसद में प्रवेश किया और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

गौरतलब है कि पूर्वोत्तर भारत से आने वाले नेताओं का राष्ट्रीय राजनीति में इस स्तर तक पहुँचना उस दौर में विशेष रूप से उल्लेखनीय था। संगमा ने मेघालय के मुख्यमंत्री के रूप में भी अपनी प्रशासनिक क्षमता का परिचय दिया।

राजनीतिक दूरदर्शिता और अंतिम वर्ष

संगमा की राजनीतिक दूरदर्शिता पद से बाहर भी स्पष्ट दिखी। 2014 के लोकसभा चुनाव परिणामों से पूर्व 12 मई को उन्होंने तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी। रिपोर्टों के अनुसार, उस मुलाकात के बाद उन्होंने कहा था कि वे 'भावी प्रधानमंत्री' से मिलने गए थे — एक ऐसा कथन जो बाद में सटीक साबित हुआ।

2012 में संगमा ने राष्ट्रपति चुनाव भी लड़ा, जिसमें विपक्ष के कई दलों ने उन्हें समर्थन दिया। 4 मार्च 2016 को हृदयाघात के कारण उनका निधन हो गया। 2017 में भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत पद्म विभूषण से सम्मानित किया — देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान से उनकी विरासत को औपचारिक मान्यता मिली।

विरासत और महत्व

पीए संगमा का जीवन यह स्थापित करता है कि संसदीय लोकतंत्र में पद की गरिमा राजनीतिक दलगत निष्ठाओं से ऊपर हो सकती है। उनका कार्यकाल आज भी इस बात का प्रमाण है कि सर्वसम्मति और निष्पक्षता, राजनीतिक विविधता के बावजूद, संभव है। पूर्वोत्तर भारत के लिए वे एक स्थायी प्रेरणास्रोत बने रहेंगे।

संपादकीय दृष्टिकोण

यह संसदीय संस्था की स्वायत्तता में एक सचेत निवेश था। यह सवाल उठता है कि क्या समकालीन राजनीति में ऐसी सर्वसम्मति फिर संभव है, या यह प्रसंग अब केवल इतिहास की किताबों तक सीमित रह जाएगा। पूर्वोत्तर से आए एक स्वनिर्मित नेता की यह यात्रा मुख्यधारा की कवरेज में अक्सर उतनी गहराई से नहीं उठाई जाती जितनी वह माँगती है।
RashtraPress
31 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पीए संगमा कौन थे और उनकी पहचान क्यों है?
पूर्णो अगितोक संगमा भारत के पूर्व लोकसभा अध्यक्ष और मेघालय के पूर्व मुख्यमंत्री थे। वे संसदीय इतिहास में उस दुर्लभ घटना के नायक हैं जब विपक्षी उम्मीदवार को सत्ताधारी दल का समर्थन मिला और वे लोकसभा अध्यक्ष बने।
पीए संगमा को लोकसभा अध्यक्ष पद पर सत्ता पक्ष का समर्थन कैसे मिला?
1996 में जब विपक्ष ने संगमा को लोकसभा अध्यक्ष पद का उम्मीदवार घोषित किया, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने भी उन्हें समर्थन दे दिया। यह संसदीय इतिहास में पहली ऐसी मिसाल थी।
पीए संगमा के कार्यकाल में कितने प्रधानमंत्री बदले?
मई 1996 से मार्च 1998 तक के अपने कार्यकाल में संगमा ने तीन प्रधानमंत्री — अटल बिहारी वाजपेयी, एचडी देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल — के साथ काम किया। इस पूरे दौर में उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष पद की निष्पक्षता बनाए रखी।
पीए संगमा को पद्म विभूषण कब मिला?
भारत सरकार ने 2017 में पीए संगमा को मरणोपरांत पद्म विभूषण से सम्मानित किया। उनका निधन 4 मार्च 2016 को हृदयाघात के कारण हुआ था।
पीए संगमा का राजनीतिक सफर कहाँ से शुरू हुआ?
संगमा ने 1977 में मेघालय की तुरा लोकसभा सीट से पहली बार संसद में प्रवेश किया। शिक्षक से राजनेता बने संगमा ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों में स्नातकोत्तर और कानून की डिग्री हासिल की थी तथा मेघालय के मुख्यमंत्री भी रहे।
राष्ट्र प्रेस
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