5 अक्टूबर 2026
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बिहार बाढ़ पर पप्पू यादव का हमला: 'गाद नासा ने नहीं, बिहार की व्यवस्था ने जमा की'

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बिहार बाढ़ पर पप्पू यादव का हमला: 'गाद नासा ने नहीं, बिहार की व्यवस्था ने जमा की'

सारांश

पप्पू यादव का तंज — 'गाद नासा ने नहीं, बिहार की व्यवस्था ने जमा की।' पटना प्रेस वार्ता में उन्होंने ₹5,000 करोड़ न मिलने का दावा किया, फरक्का संधि पर चेतावनी दी और 1990 से अब तक के सिंचाई मंत्रियों की संपत्ति जाँच की माँग उठाई — बिहार में इस साल तीसरी बाढ़ के बीच।

मुख्य बातें

पूर्णिया सांसद पप्पू यादव ने 5 अक्टूबर 2026 को पटना में राज्य और केंद्र सरकार पर बाढ़ को लेकर तीखे आरोप लगाए।
उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी के कथित नासा-संबंधी बयान पर तंज कसते हुए पूछा — एंटी-इरोशन पर खर्च ₹1 करोड़ से अधिक कहाँ गए।
दावा किया कि 2017 में PM मोदी द्वारा घोषित ₹5,000 करोड़ की राशि बिहार को नहीं मिली।
फरक्का संधि दिसंबर में समाप्त हो रही है, लेकिन बाढ़ समाधान पर कोई गंभीर पहल नहीं।
इस वर्ष तीन बार बाढ़ की स्थिति बनी; सर्वोच्च न्यायालय में याचिका और करीब 50 पत्र लिखने का दावा।
1990 के बाद के सभी सिंचाई मंत्रियों और अधिकारियों की संपत्ति जाँच की माँग।

पूर्णिया से निर्दलीय सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने 5 अक्टूबर 2026 को पटना में एक प्रेस वार्ता के दौरान बिहार में बाढ़ और बाढ़ नियंत्रण के नाम पर होने वाले खर्च को लेकर राज्य एवं केंद्र सरकार पर तीखे आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि बाढ़ के स्थायी समाधान की बजाय हर वर्ष राहत और निर्माण के नाम पर करोड़ों रुपए बहाए जा रहे हैं, फिर भी समस्या जस की तस बनी हुई है।

नासा पर तंज और व्यवस्था पर सवाल

पप्पू यादव ने उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी के कथित बयान पर कटाक्ष करते हुए कहा कि यदि बिहार में बारिश और बाढ़ के लिए नासा जिम्मेदार है, तो नदियों में जमा गाद के लिए भी नासा ही जिम्मेदार होगा। उन्होंने सवाल किया कि एंटी-इरोशन के नाम पर एक करोड़ रुपए से अधिक खर्च हुए हैं, तो क्या वह धनराशि भी नासा लेकर चला गया? यह तंज उस राजनीतिक संस्कृति पर था जो जवाबदेही से बचने के लिए बाहरी कारणों का सहारा लेती है।

भ्रष्टाचार और ठेकेदारी पर सीधे आरोप

सांसद ने आरोप लगाया कि 1990 से अब तक बिहार में जाति, धर्म और मज़हब के नाम पर 'खुली लूट' हुई है। उन्होंने यह भी पूछा कि हर साल एक ही स्थान पर बाँध क्यों टूटता है और बार-बार उसी ठेकेदार को काम क्यों दिया जाता है। उन्होंने नेताओं, मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और अधिकारियों की भूमिका की जाँच की माँग करते हुए कहा कि बाढ़ बिहार के लिए 'नासूर' बन चुकी है और इस वर्ष तीन बार बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो चुकी है।

फरक्का संधि और केंद्रीय सहायता का मुद्दा

पप्पू यादव ने यह भी रेखांकित किया कि फरक्का संधि दिसंबर में समाप्त हो रही है, किंतु बिहार की बाढ़ समस्या के स्थायी समाधान को लेकर कोई गंभीर पहल नहीं हो रही। उन्होंने सवाल उठाया कि असम, पंजाब और नेपाल को केंद्रीय सहायता मिलती है, तो बिहार को क्यों नहीं। उनके दावे के अनुसार, 2008 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने बिहार की बाढ़ को राष्ट्रीय आपदा घोषित कर ₹1,000 करोड़ जारी किए थे, जबकि 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ₹5,000 करोड़ की घोषणा की थी — लेकिन उनके अनुसार वह राशि बिहार को नहीं मिली। सरकार की ओर से इन दावों पर अभी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

राजनीतिक दलों पर निशाना

पप्पू यादव ने कहा कि चुनाव के समय भारतीय जनता पार्टी (BJP) हिंदू-मुसलमान का मुद्दा उठाती है, लेकिन बाढ़ आने पर उसका हिंदुत्व 'डूब जाता है।' उसी तरह विपक्ष भी चुनाव में जाति की राजनीति करता है, लेकिन बाढ़ में उसकी जाति भी 'डूब जाती है।' उन्होंने आरोप लगाया कि नेता चुनाव के समय हेलीकॉप्टर से जनता के बीच पहुँचते हैं, परंतु आपदा के समय संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का अभाव स्पष्ट दिखता है।

पप्पू यादव का दावा और माँगें

सांसद ने बताया कि उन्होंने छपरा और नौतन में करीब ₹60 लाख की व्यक्तिगत सहायता दी है और टूटे घरों के लिए ₹10,000 से ₹25,000 तक की मदद पहुँचाई है। उन्होंने अन्य सांसदों पर सवाल उठाया कि जिनके पास पर्याप्त संसाधन हैं, उन्होंने बाढ़ पीड़ितों के लिए क्या किया। उनके अनुसार, वह इस संबंध में करीब 50 पत्र लिख चुके हैं और सर्वोच्च न्यायालय में भी याचिका दाखिल कर चुके हैं। उन्होंने 1990 के बाद बिहार में रहे सिंचाई मंत्रियों और अधिकारियों की संपत्ति की जाँच की माँग भी की। गौरतलब है कि बिहार में बाढ़ का यह संकट हर वर्ष लाखों परिवारों को विस्थापित करता है, और इस बार तीन-तीन बाढ़ की स्थितियों ने स्थायी समाधान की माँग को और तीव्र कर दिया है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन उनके सवाल — एक ही जगह बाँध का बार-बार टूटना, एक ही ठेकेदार को काम मिलना — बिहार की बाढ़ राजनीति के उस पुराने ढाँचे को उजागर करते हैं जिसमें आपदा एक उद्योग बन चुकी है। ₹5,000 करोड़ न मिलने का दावा सत्यापित नहीं है, फिर भी यह केंद्र-राज्य वित्तीय जवाबदेही की उस बड़ी बहस की तरफ इशारा करता है जिससे बिहार के नेता अक्सर बचते रहे हैं। फरक्का संधि की समाप्ति और नेपाल से जल-साझेदारी की अनुपस्थिति एक ऐसा नीतिगत शून्य है जिसे राज्य और केंद्र दोनों ने दशकों से नजरअंदाज किया है — और यही लापरवाही हर मानसून में करोड़ों बिहारियों की कीमत पर चुकाई जाती है।
RashtraPress
5 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पप्पू यादव ने नासा का जिक्र क्यों किया?
पप्पू यादव ने उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी के कथित उस बयान पर तंज कसा जिसमें बारिश और बाढ़ के लिए नासा को जिम्मेदार ठहराया गया था। यादव ने कहा कि अगर नासा बाढ़ के लिए जिम्मेदार है, तो एंटी-इरोशन पर खर्च हुए ₹1 करोड़ से अधिक की राशि का हिसाब भी नासा से माँगा जाए।
पप्पू यादव ने ₹5,000 करोड़ को लेकर क्या दावा किया?
उन्होंने दावा किया कि 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार बाढ़ राहत के लिए ₹5,000 करोड़ की घोषणा की थी, लेकिन यह राशि बिहार को नहीं मिली। इससे पहले 2008 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने बाढ़ को राष्ट्रीय आपदा घोषित कर ₹1,000 करोड़ दिए थे।
फरक्का संधि का बिहार की बाढ़ से क्या संबंध है?
फरक्का संधि दिसंबर 2026 में समाप्त हो रही है, जो गंगा के जल-बँटवारे को नियंत्रित करती है। पप्पू यादव ने चेतावनी दी कि इसके बावजूद बिहार की बाढ़ समस्या के स्थायी समाधान को लेकर कोई गंभीर राजनयिक या नीतिगत पहल नहीं हो रही है।
पप्पू यादव ने बाढ़ भ्रष्टाचार पर क्या माँग रखी?
उन्होंने माँग की कि 1990 के बाद बिहार में रहे सभी सिंचाई मंत्रियों और अधिकारियों की संपत्ति की जाँच हो। साथ ही उन्होंने सवाल उठाया कि एक ही स्थान पर बाँध बार-बार क्यों टूटता है और उसी ठेकेदार को काम क्यों दिया जाता है।
पप्पू यादव ने खुद बाढ़ पीड़ितों के लिए क्या किया?
सांसद ने दावा किया कि उन्होंने छपरा और नौतन में करीब ₹60 लाख की व्यक्तिगत सहायता दी है और टूटे घरों के लिए ₹10,000 से ₹25,000 तक की मदद की है। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका भी दाखिल की है और इस विषय पर करीब 50 पत्र लिखने का दावा किया।
राष्ट्र प्रेस
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