प्रयागराज के सफाई कर्मचारियों ने राहुल गांधी के भेदभाव वाले बयान को नकारा, बोले- 'मोदी सरकार में मिला सम्मान'
सारांश
मुख्य बातें
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा दलित समाज के साथ भेदभाव और छुआछूत पर दिए गए बयान से प्रयागराज के सफाई कर्मचारियों ने असहमति जताई है। 29 अगस्त को प्रयागराज में सफाई कर्मचारियों ने कहा कि जमीनी स्तर पर अब भेदभाव की स्थिति पहले जैसी नहीं रही, और मंदिरों से लेकर स्कूलों तक उन्हें समान व्यवहार मिल रहा है।
कर्मचारियों की जमीनी प्रतिक्रिया
सफाई कर्मचारी नरेश कुमार ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में दलित समाज को सम्मान मिला है। उनके अनुसार, अब मंदिरों में प्रवेश, बच्चों की स्कूली शिक्षा और सार्वजनिक स्थानों पर आने-जाने में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होता। नरेश कुमार ने कहा कि यह बदलाव उन्हें व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर महसूस हो रहा है।
एक अन्य सफाई कर्मचारी मुकेश ने राहुल गांधी के उस दावे से असहमति जताई जिसमें स्कूलों में दलित बच्चों के साथ भेदभाव की बात कही गई थी। मुकेश ने कहा कि उनके अनुभव के अनुसार बच्चे अब स्कूल जाते हैं और पानी लेने जैसी सामान्य गतिविधियों में भी उन्हें कोई परेशानी नहीं होती।
राहुल गांधी का मूल बयान
राहुल गांधी ने दलितों के साथ होने वाले कथित भेदभाव और अत्याचार का मुद्दा उठाते हुए कहा था कि देश में हजारों वर्षों से दलितों पर अत्याचार और हिंसा होती रही है। उन्होंने कहा था कि संविधान लागू होने के बाद इस तरह का भेदभाव गैरकानूनी है, लेकिन इसके बावजूद कुछ जगहों पर दलित बच्चों से टॉयलेट साफ कराने और झाड़ू-पोछा करवाने जैसी घटनाएँ सामने आती हैं। उनके अनुसार, 'दलितों की आवाज जितनी बुलंद होती है और कोई व्यक्ति जितना सफल होता है, उस पर उतने ही अधिक हमले किए जाते हैं।'
कर्मचारियों का एनडीए सरकार पर रुख
प्रयागराज के सफाई कर्मचारियों का कहना है कि पिछली सरकारों के दौर में भेदभाव का अनुभव किया गया था, लेकिन जब से केंद्र और उत्तर प्रदेश में एनडीए सरकार सत्ता में आई है, दलित समाज के साथ व्यवहार में बदलाव आया है। उनका मानना है कि सरकारी योजनाओं से उन्हें पहले की तुलना में अधिक सम्मान और सुविधाएँ मिल रही हैं।
व्यापक संदर्भ
गौरतलब है कि दलित अधिकारों और भेदभाव का मुद्दा भारतीय राजनीति में लंबे समय से केंद्रीय विमर्श का हिस्सा रहा है। राहुल गांधी और विपक्ष जहाँ संरचनात्मक भेदभाव की निरंतरता को रेखांकित करते हैं, वहीं सत्तारूढ़ दल के समर्थक जमीनी सुधार का हवाला देते हैं। यह ऐसे समय में आया है जब 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की पृष्ठभूमि में दलित मतदाताओं को लेकर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है।
आगे क्या
सफाई कर्मचारियों की यह प्रतिक्रिया एक स्थानीय नमूने पर आधारित है और इसे व्यापक सामाजिक सर्वेक्षण का विकल्प नहीं माना जा सकता। दलित समाज में भेदभाव की स्थिति को लेकर राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर नीति-निर्माताओं, सामाजिक संगठनों और न्यायालयों में बहस जारी है।