15 अक्टूबर 2026
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सोशल मीडिया कंपनियां बच्चों से कर रही हैं छल: NHRC सदस्य प्रियंक कानूनगो का POCSO उल्लंघन पर बड़ा बयान

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सोशल मीडिया कंपनियां बच्चों से कर रही हैं छल: NHRC सदस्य प्रियंक कानूनगो का POCSO उल्लंघन पर बड़ा बयान

सारांश

NHRC सदस्य प्रियंक कानूनगो का आरोप — इंस्टाग्राम और फेसबुक पर बच्चों के यौन शोषण के वीडियो से मेटा विज्ञापन कमा रही है, और सर्वोच्च न्यायालय के 2024 के आदेश के बावजूद ये कंपनियां स्थानीय पुलिस को सूचित नहीं कर रहीं। लाखों बच्चे न्याय का इंतजार कर रहे हैं।

मुख्य बातें

NHRC सदस्य प्रियंक कानूनगो ने 15 अक्टूबर 2026 को सोशल मीडिया कंपनियों पर पॉक्सो अधिनियम और सर्वोच्च न्यायालय के 2024 के आदेश की अनदेखी का आरोप लगाया।
पॉक्सो धारा 19, धारा 20 और नियम 11 के तहत सोशल मीडिया कंपनियों पर बाल यौन शोषण की सूचना स्थानीय पुलिस थाने को देना अनिवार्य है।
कानूनगो के अनुसार मेटा बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट पर विज्ञापन से आर्थिक लाभ उठा रही है।
कंपनियां अनुपालन से बचने के लिए महंगे वकीलों और विदेशी फंडिंग वाले एनजीओ का उपयोग कर रही हैं।
इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय में 15 अक्टूबर 2026 को पुनः सुनवाई होनी थी।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने 15 अक्टूबर 2026 को कहा कि सोशल मीडिया कंपनियां बाल यौन शोषण से जुड़े मामलों में सर्वोच्च न्यायालय के 2024 के स्पष्ट आदेश का पालन करने से अब भी बच रही हैं, और इस तरह वे भारत के लाखों बच्चों के साथ छल कर रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि इन कंपनियों के विज्ञापन राजस्व का सीधा लाभ बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) से जुड़े ट्रैफिक से होता है।

पॉक्सो कानून और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अनदेखी

कानूनगो ने कहा, पॉक्सो अधिनियम की धारा 19 यह स्पष्ट करती है कि बच्चों के यौन शोषण की सूचना स्थानीय पुलिस थाने को अनिवार्य रूप से देनी होगी। इसी कानून की धारा 20 तथा नियम 11 सोशल मीडिया मंचों पर भी समान रूप से लागू होते हैं। उन्होंने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय ने 2024 में यह फैसला सुनाया था कि 'स्थानीय पुलिस थाने को सूचित करने का नियम कानून का ही प्रावधान है — इससे कोई भी नहीं बच सकता।' बावजूद इसके अनुपालन अभी भी लंबित है।

मेटा पर गंभीर आरोप

कानूनगो ने कहा, 'हमने देखा है कि किस तरह इंस्टाग्राम और फेसबुक पर बच्चों के यौन शोषण के वीडियो बेचे जा रहे थे और उन पर विज्ञापन लगाकर मेटा कंपनी लगातार पैसे कमा रही थी।' उन्होंने सवाल किया कि जब इन मंचों पर ऐसी सामग्री फैलती है, तो उससे उत्पन्न ट्रैफिक और विज्ञापन राजस्व का असली लाभार्थी कौन है। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर सोशल मीडिया कंपनियों पर बच्चों की सुरक्षा को लेकर दबाव बढ़ रहा है।

महंगे वकील और विदेशी फंडिंग पर निशाना

NHRC सदस्य ने आरोप लगाया कि ये कंपनियां पुलिस को रिपोर्ट करने की बजाय महंगे वकीलों और विदेशी फंडिंग से चलने वाले एनजीओ के माध्यम से उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में कानूनी दाँव-पेंच करती रही हैं। कानूनगो ने कहा, 'भारत के मासूम बच्चों की तरफ से कौन बोलेगा? वे खुद अदालत नहीं जा सकते और न ही महंगे वकीलों का खर्च उठा सकते हैं।' उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में पॉक्सो के तहत जेल की सजा का भी प्रावधान है।

एक्स पोस्ट के ज़रिए भी उठाई आवाज़

कानूनगो ने 15 अक्टूबर की सुबह एक्स पर भी इस मुद्दे को उठाया। उन्होंने लिखा कि सर्वोच्च न्यायालय का 2024 का आदेश पारित होने के बाद भी उसका पालन नहीं हुआ है और उसी दिन इस मामले पर पुनः सुनवाई होनी थी। उन्होंने लिखा, 'कई वर्षों से यह मामला फंसा हुआ है, जबकि लाखों बच्चे न्याय मिलने का इंतजार कर रहे हैं।' गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब किसी वरिष्ठ संवैधानिक पदाधिकारी ने सोशल मीडिया कंपनियों पर इतने कड़े शब्दों में सार्वजनिक रूप से निशाना साधा हो।

आगे क्या होगा

सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले की 15 अक्टूबर 2026 को पुनः सुनवाई होनी थी। कानूनगो के अनुसार अदालत के स्पष्ट निर्देश के बावजूद अनुपालन सुनिश्चित न होना एक गंभीर संस्थागत विफलता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन कंपनियों को जवाबदेह नहीं बनाया गया, तो न केवल बच्चों का शोषण जारी रहेगा, बल्कि कानून के प्रति सोशल मीडिया कंपनियों की मनमानी भी बढ़ती जाएगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

या वे अदालतों में वर्षों तक मामले उलझाकर जवाबदेही से बच सकती हैं? पॉक्सो जैसा सख्त कानून और सर्वोच्च न्यायालय का 2024 का स्पष्ट आदेश होने के बावजूद अनुपालन न होना, यह दर्शाता है कि प्रवर्तन तंत्र में गंभीर खामियाँ हैं। मेटा पर विज्ञापन राजस्व से जुड़ा आरोप विशेष रूप से गंभीर है — यदि सत्यापित हो, तो यह केवल नियामक उल्लंघन नहीं, बल्कि बच्चों के शोषण से आर्थिक लाभ का मामला बनता है। मुख्यधारा की कवरेज जो बात अक्सर चूक जाती है, वह यह है कि यह लड़ाई केवल एक कानूनी विवाद नहीं — यह डिजिटल संप्रभुता और बहुराष्ट्रीय प्लेटफार्मों की भारतीय कानून के प्रति जवाबदेही की परीक्षा है।
RashtraPress
15 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

NHRC सदस्य प्रियंक कानूनगो ने सोशल मीडिया कंपनियों पर क्या आरोप लगाए हैं?
कानूनगो ने आरोप लगाया है कि सोशल मीडिया कंपनियां पॉक्सो अधिनियम की धारा 19, 20 और नियम 11 के तहत बाल यौन शोषण की सूचना स्थानीय पुलिस को देने से बच रही हैं। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के 2024 के स्पष्ट आदेश के बाद भी अनुपालन नहीं हो रहा और मेटा ऐसे कंटेंट से विज्ञापन राजस्व कमा रही है।
पॉक्सो अधिनियम के तहत सोशल मीडिया कंपनियों की क्या जिम्मेदारी है?
पॉक्सो अधिनियम की धारा 19 के तहत बच्चों के यौन शोषण की सूचना स्थानीय पुलिस थाने को देना अनिवार्य है, और धारा 20 तथा नियम 11 यह दायित्व सोशल मीडिया कंपनियों पर भी लागू करते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने 2024 में स्पष्ट किया था कि यह कानूनी प्रावधान है और इससे कोई भी नहीं बच सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कब और क्या आदेश दिया था?
सर्वोच्च न्यायालय ने 2024 में आदेश दिया था कि बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) की सूचना स्थानीय पुलिस थाने को देना कानूनी प्रावधान है और कोई भी कंपनी इससे बच नहीं सकती। इस मामले में 15 अक्टूबर 2026 को पुनः सुनवाई होनी थी।
क्या इस मामले में किसी कंपनी पर कार्रवाई हो सकती है?
कानूनगो के अनुसार पॉक्सो अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर जेल की सजा का प्रावधान है। हालांकि, कंपनियां महंगे वकीलों और एनजीओ के माध्यम से न्यायालयों में मामले उलझाती रही हैं, जिससे वास्तविक कार्रवाई में देरी हो रही है।
मेटा और इंस्टाग्राम पर क्या विशेष आरोप लगाए गए हैं?
कानूनगो ने आरोप लगाया कि इंस्टाग्राम और फेसबुक पर बच्चों के यौन शोषण के वीडियो बेचे जा रहे थे और मेटा उन पर विज्ञापन लगाकर आर्थिक लाभ उठा रही थी। उन्होंने सवाल किया कि जब ऐसी सामग्री इन प्लेटफार्मों पर फैलती है, तो विज्ञापन राजस्व का असली लाभार्थी कौन है।
राष्ट्र प्रेस
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