शिक्षक दिवस 2026: गणित के शौकीन राधाकृष्णन कैसे बने भारत के महानतम दार्शनिक-राष्ट्रपति
सारांश
मुख्य बातें
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन — वह नाम जिसने तमिलनाडु के एक निर्धन गाँव से निकलकर ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के व्याख्यान-कक्षों तक और फिर राष्ट्रपति भवन तक का सफर तय किया — की जयंती हर वर्ष 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाई जाती है। उनका जन्म 5 सितंबर 1888 को तिरुत्तनी (तमिलनाडु) में हुआ था, और उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि विपरीत परिस्थितियाँ प्रतिभा को दबा नहीं सकतीं — वे उसे और धारदार बना देती हैं।
गरीबी से ऑक्सफोर्ड तक: असाधारण शैक्षणिक यात्रा
एक रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार में जन्मे राधाकृष्णन के पिता चाहते थे कि उनका पुत्र मंदिर का पुजारी बने, न कि अंग्रेज़ी शिक्षा ग्रहण करे। लेकिन राधाकृष्णन की बौद्धिक प्रतिभा ने अपना रास्ता खुद बनाया — प्रारंभिक विद्यालय से लेकर मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज तक की पूरी पढ़ाई उन्होंने केवल छात्रवृत्ति के बल पर पूरी की।
दिलचस्प बात यह है कि वे मूल रूप से गणित पढ़ना चाहते थे, दर्शनशास्त्र नहीं। नई पुस्तकें खरीदने की सामर्थ्य न होने के कारण उनके एक चचेरे भाई ने दर्शनशास्त्र की अपनी पुरानी किताबें उन्हें दे दीं। उस एक संयोग ने उनकी — और भारतीय दर्शन की — दिशा सदा के लिए बदल दी। मात्र 20 वर्ष की आयु में उन्होंने 'वेदांत की नैतिकता' पर शोध-पत्र लिखा, जिसने हिंदू दर्शन की पश्चिमी आलोचनाओं का तार्किक खंडन किया।
बिना किसी औपचारिक पीएचडी की उपाधि के ही उन्होंने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में 'स्पैल्डिंग प्रोफेसर' के रूप में भारतीय दर्शन को वैश्विक मंच पर स्थापित किया — एक उपलब्धि जो आज भी दुर्लभ मानी जाती है।
स्वतंत्र भारत का पहला शिक्षा आयोग
स्वतंत्रता के तुरंत बाद, 1948 में, डॉ. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में 'विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग' का गठन किया गया — यह स्वतंत्र भारत का पहला शिक्षा आयोग था। इस आयोग ने देश की उच्च शिक्षा की बुनियादी रूपरेखा तैयार की और 'विश्वविद्यालय अनुदान आयोग' (UGC) की स्थापना की दृढ़ सिफारिश की — एक संस्था जो आज भी भारतीय उच्च शिक्षा की आधारशिला है। गौरतलब है कि इस आयोग की सिफारिशें आज भी भारतीय विश्वविद्यालय प्रणाली के मूल ढाँचे को प्रभावित करती हैं।
स्टालिन और माओ को भी पिघला दिया: अद्वितीय कूटनीति
1949 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें सोवियत संघ में भारत का राजदूत नियुक्त किया। एक वेदांत-दार्शनिक का कम्युनिस्ट रूस में नियुक्त होना उस समय अजीब लगा, लेकिन राधाकृष्णन ने अपनी मानवीय कूटनीति से सबको चौंका दिया।
जब उनकी भेंट तानाशाह जोसेफ स्टालिन से हुई, तो उन्होंने सम्राट अशोक का उदाहरण देते हुए शांति का संदेश दिया और निडरता से स्टालिन की पीठ थपथपाई। स्टालिन ने कहा था कि राधाकृष्णन पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने उन्हें राक्षस नहीं, बल्कि एक इंसान समझा। इसी प्रकार 1957 में एक आधिकारिक मुलाकात के दौरान उन्होंने चीनी नेता माओत्से तुंग के गाल भी थपथपाए, जिससे माओ भी हैरान रह गए।
राष्ट्रपति-काल: सादगी, संकट और शिक्षक दिवस का जन्म
1952 में वे भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति बने और 1962 में दूसरे राष्ट्रपति। उनके कार्यकाल (1962–1967) में भारत ने 1962 का चीन युद्ध और 1965 का पाकिस्तान युद्ध — दो बड़े संकट झेले। इन विपदाओं में उन्होंने देश को दृढ़ नेतृत्व प्रदान किया।
राज्यसभा के सभापति के रूप में जब सदन में तीखी बहसें होती थीं, तो वे अचानक संस्कृत के श्लोक या बाइबिल की पंक्तियाँ पढ़ने लगते थे, जिससे तनावपूर्ण माहौल तुरंत शांत हो जाता था। राष्ट्रपति के रूप में उनका मासिक वेतन ₹10,000 था, किंतु वे केवल ₹2,500 स्वीकार करते थे और शेष ₹7,500 प्रतिमाह 'प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष' को दान करते थे।
जब 1962 में उनके छात्रों और मित्रों ने 5 सितंबर को उनका जन्मदिन भव्य रूप से मनाने की अनुमति माँगी, तो उन्होंने विनम्रता से कहा — 'मेरा जन्मदिन मनाने के बजाय, यदि 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए, तो यह मेरे लिए गर्व की बात होगी।' इसी भावना से शिक्षक दिवस की परंपरा का जन्म हुआ।
सम्मान और विरासत
1931 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट सेवाओं के लिए नाइटहुड की उपाधि दी। 1954 में वे प्रथम समूह में भारत रत्न से सम्मानित हुए। 1975 में उन्होंने टेम्पलटन पुरस्कार जीता और पुरस्कार की पूरी राशि ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय को दान कर दी। अपने जीवन में 27 बार नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित इस महान दार्शनिक ने 17 अप्रैल 1975 को अंतिम साँस ली।
यह ऐसे समय में याद करने योग्य है जब शिक्षा-नीति और शिक्षकों की भूमिका पर राष्ट्रीय बहस जारी है — राधाकृष्णन का जीवन आज भी उस बहस का सबसे सशक्त उत्तर है।