दिल्ली क्राइम ब्रांच ने ₹30 लाख के साइबर फ्रॉड सिंडिकेट का भंडाफोड़ किया, मुख्य हैंडलर जयपुर एयरपोर्ट पर गिरफ्तार
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच (वेस्टर्न रेंज-II) ने 4 सितंबर 2025 को एक बड़े अंतर-राज्यीय साइबर ठगी सिंडिकेट का पर्दाफाश किया, जो व्हाट्सएप, टेलीग्राम और फर्जी निवेश प्लेटफॉर्म के माध्यम से पीड़ितों से ₹30.06 लाख की ठगी कर चुका था। इस मामले के मुख्य हैंडलर उदित त्यागी (26, मेरठ) को जयपुर इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उतरते ही ब्यूरो ऑफ इमिग्रेशन ने पकड़ा और क्राइम ब्रांच को सौंप दिया। जाँच में सामने आया है कि इस नेटवर्क के तार चीनी और विदेशी ऑपरेटर्स से भी जुड़े हैं।
मामले की शुरुआत कैसे हुई
यह मामला पीड़ित गौरव रस्तोगी की शिकायत पर दर्ज ई-एफआईआर नंबर 27/2025 से शुरू हुआ। पुलिस के अनुसार, पीड़ित को पहले व्हाट्सएप ग्रुप 'एचओ30' में जोड़ा गया, जहाँ पार्ट-टाइम नौकरी और मोटे मुनाफे वाली ट्रेडिंग स्कीम का लालच दिया जाता था। भरोसा जीतने के लिए ग्रुप में नकली सफलता की कहानियाँ और मुनाफे के स्क्रीनशॉट साझा किए जाते थे।
इसके बाद पीड़ित को टेलीग्राम पर स्थानांतरित किया गया, जहाँ खुद को वित्तीय सलाहकार बताने वाले ठगों ने उसे एक फर्जी ट्रेडिंग ऐप पर छोटा निवेश करने को कहा। शुरुआती मुनाफा दिखाकर और छोटी रकम निकलवाकर पीड़ित का विश्वास अर्जित किया गया, फिर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाकर बड़ी रकम निवेश करवाई गई।
ठगी का तरीका
जब पीड़ित ने पैसा निकालने की कोशिश की, तो वीआईपी मेंबरशिप, टैक्स क्लीयरेंस, विड्रॉल चार्ज और सिस्टम मेंटेनेंस के नाम पर बार-बार अतिरिक्त रकम माँगी गई। इस तरह धीरे-धीरे पीड़ित से ₹30 लाख से अधिक की ठगी की गई। गौरतलब है कि यह रणनीति — जिसे 'पिग बुचरिंग स्कैम' भी कहा जाता है — देशभर में तेज़ी से फैल रही है और विदेशी आपराधिक नेटवर्क इसे संचालित करते हैं।
सात परतों वाला संगठित नेटवर्क
डीसीपी हर्ष इंदोरा के नेतृत्व में इंस्पेक्टर सतीश मलिक, एसआई अनुज छिकारा और रविंदर सिंह की तकनीकी टीम की जाँच में सामने आया कि यह कोई स्थानीय गिरोह नहीं, बल्कि 7 परतों वाला संगठित नेटवर्क था।
विदेशी स्तर पर चीनी और अन्य विदेशी डेवलपर्स फर्जी ऐप्स, वेबसाइट्स और ट्रेडिंग इंटरफेस बनाते थे, जिन पर नकली बैलेंस और मुनाफा दर्शाया जाता था। आरोपी हकम अली (25, बीकानेर) ने 'एचओ30' व्हाट्सएप ग्रुप बनाया था। टेलीग्राम पर विदेशी ऑपरेटर और भारतीय बिचौलिए मिलकर पीड़ितों को मैनेज करते थे और यूएसडीटी-आईएनआर दर तय करते थे।
ठगी का पैसा सीधे एक खाते में न रखकर 18 से अधिक 'म्यूल अकाउंट्स' में घुमाया जाता था। जाँच में मोनिश (22, हापुड़) के फेडरल बैंक खाते में पीड़ित के ₹5 लाख मिले, जिसे वास्तव में अनीश (22) और अक्षत सिरोही (22, मुरादनगर) संचालित करते थे।
मुख्य हैंडलर की गिरफ्तारी
नेटवर्क का मुख्य समन्वयक 'एके' नामक व्यक्ति अभी भी फरार है। मुख्य हैंडलर उदित त्यागी मामला दर्ज होने के बाद थाईलैंड, मलेशिया और यूएई भाग गया था। उसके खिलाफ लुक आउट सर्कुलर (एलओसी) जारी था। हाल ही में जयपुर इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उतरते ही ब्यूरो ऑफ इमिग्रेशन ने उसे हिरासत में लेकर क्राइम ब्रांच को सौंप दिया।
पुलिस ने उसके पास से म्यूल अकाउंट की चेकबुक, 7 मोबाइल फोन और सिम कार्ड बरामद किए। जाँच में यह भी सामने आया कि उदित का नाम गुजरात के राजकोट में दर्ज ₹8.16 लाख के साइबर फ्रॉड मामले में भी है।
व्यापक जाँच और आगे की कार्रवाई
आईएनसीआरपी डेटा की जाँच में आरोपी के खातों का संबंध 35 से अधिक साइबर अपराध शिकायतों से मिला है, जो अलग-अलग राज्यों में दर्ज हैं। पुलिस अब विदेशी ऑपरेटर्स की तलाश में जुटी है। यह मामला इस बात का संकेत है कि साइबर ठगी के नेटवर्क अब केवल घरेलू नहीं रहे — उनकी जड़ें अंतरराष्ट्रीय आपराधिक ढाँचे से जुड़ी हैं, जिससे जाँच और प्रत्यर्पण दोनों जटिल हो जाते हैं।