राघव चड्ढा का वोट पंजाब सूची से कटा, आप ने एसआईआर प्रक्रिया पर उठाए गंभीर सवाल
सारांश
मुख्य बातें
राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा का नाम पंजाब की मतदाता सूची से हटाए जाने के बाद 3 सितंबर को राजनीतिक विवाद गहरा गया। आम आदमी पार्टी (AAP) ने आरोप लगाया कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया के नाम पर देशभर में करोड़ों मतदाताओं के नाम सूचियों से मिटाए जा रहे हैं। पार्टी की मुख्य प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ और दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने इस मामले पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) को घेरा।
मुख्य घटनाक्रम
आप की मुख्य प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ ने आरोप लगाया कि राघव चड्ढा का नाम एसआईआर प्रक्रिया के तहत पंजाब की मतदाता सूची से हटाया गया है। उनके अनुसार, यह केवल एक सांसद का मामला नहीं है — पंजाब में करीब 20 लाख और देशभर में लगभग 13 करोड़ मतदाताओं के नाम सूचियों से हटाए जाने का दावा किया जा रहा है। कक्कड़ ने सवाल उठाया कि इतने बड़े पैमाने पर हुई इस कार्रवाई की जिम्मेदारी किस पर है।
कक्कड़ ने यह भी कहा कि चड्ढा को केवल अपने वोट की चिंता करने के बजाय पंजाब के उन लाखों लोगों की आवाज़ उठानी चाहिए जिनके नाम सूची से हटे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि एसआईआर प्रक्रिया में बड़ी खामियाँ हैं और यह BJP के निर्देश पर आगे बढ़ाई जा रही है।
बैक-डेटेड फॉर्म का आरोप
कक्कड़ ने यह भी दावा किया कि एसआईआर प्रक्रिया पूरी होने के बाद राघव चड्ढा ने दिल्ली के राजेंद्र नगर में बैक-डेटेड फॉर्म के ज़रिए अपना नाम मतदाता सूची में जुड़वाने की कोशिश की। हालाँकि, उन्होंने इस दावे के समर्थन में कोई आधिकारिक दस्तावेज़ सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत नहीं किया। उन्होंने कहा कि यदि किसी वीआईपी के लिए नियमों को दरकिनार किया जाता है तो यह उन आम मतदाताओं के साथ अन्याय होगा जिनके पास ऐसे विकल्प नहीं हैं।
सौरभ भारद्वाज का रुख
आप के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने कहा कि राघव चड्ढा दिल्ली में रहते हैं, इसलिए उनका वोट पंजाब में क्यों होना चाहिए। उन्होंने एसआईआर के नियमों का हवाला देते हुए बताया कि सत्यापन के दौरान यदि कोई व्यक्ति अपने पंजीकृत पते पर नहीं मिलता, तो उसका नाम सूची से हटाया जा सकता है — और इसी प्रक्रिया के तहत चड्ढा का नाम हटाया गया।
भारद्वाज ने दिल्ली के संदर्भ में भी चिंता जताई। उनके अनुसार, दिल्ली में भी बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम केवल इसलिए हटाए गए क्योंकि वे एक मकान से दूसरे मकान में स्थानांतरित हो गए थे। उन्होंने उदाहरण दिया कि यदि कोई किराएदार सामने वाले मकान में शिफ्ट हो जाए, तो पता बदलने के कारण उसे एसआईआर फॉर्म नहीं दिया जाता और उसका नाम 'शिफ्टेड' दिखाया जा सकता है।
चुनाव आयोग पर सवाल
भारद्वाज ने चुनाव आयोग (ECI) की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर आरोप लगाए। उनका कहना था कि यदि कोई व्यक्ति अस्थायी रूप से दूसरे शहर या गाँव में चला जाता है, तो उस समय घर पर अनुपस्थित होने के आधार पर उसका नाम हटाना उचित नहीं है। उन्होंने दावा किया कि कुछ पत्रकारों ने जब चुनाव आयोग से राघव चड्ढा के कथित बैक-डेटेड वोट पंजीकरण के बारे में सवाल पूछा, तो कथित तौर पर वह प्रक्रिया रोक दी गई — हालाँकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी।
नैतिक जिम्मेदारी पर बहस
भारद्वाज ने राघव चड्ढा के पुराने 'राइट टू रिजेक्ट' के विचार का हवाला देते हुए कहा कि जो नेता चुने हुए प्रतिनिधियों को वापस बुलाने की वकालत करते रहे हैं, उन्हें यह सिद्धांत खुद पर भी लागू करना चाहिए। उन्होंने कहा कि चड्ढा को AAP के विधायकों ने राज्यसभा भेजा था, और पार्टी से दूरी के बाद उनके नैतिक अधिकार पर सवाल उठना स्वाभाविक है। गौरतलब है कि किसी सांसद के पार्टी बदलने या पार्टी से अलग होने पर राज्यसभा सदस्यता स्वतः समाप्त नहीं होती — इसके लिए संवैधानिक और कानूनी प्रावधान लागू होते हैं।
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब देशभर में एसआईआर प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर कई राजनीतिक दलों में असंतोष बढ़ रहा है। आने वाले दिनों में चुनाव आयोग का इस पर आधिकारिक रुख और राघव चड्ढा की प्रतिक्रिया इस विवाद की दिशा तय करेगी।