आरएसएस में जाति नहीं, मेहनत से मिलती है तरक्की: इजरायली शोधकर्ता येशाया रोसेनमैन
सारांश
मुख्य बातें
इजरायली शोधकर्ता येशाया रोसेनमैन ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के साथ अपने अनुभव को सकारात्मक बताते हुए कहा है कि संगठन में किसी व्यक्ति की प्रगति उसकी जाति या आर्थिक हैसियत से नहीं, बल्कि मेहनत और योग्यता के आधार पर होती है। उन्होंने नई दिल्ली में 18 अक्टूबर 2026 को दिए गए एक साक्षात्कार में आरएसएस की कार्यसंस्कृति, सामाजिक भूमिका और भारत की वैश्विक पहचान पर विस्तार से अपने विचार रखे। रोसेनमैन का नाम आरएसएस के 100 वर्ष पूरे होने पर प्रकाशित पुस्तक 'हंड्रेड इयर्स यंग: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' में उपलब्धि हासिल करने वाले 18 युवाओं में शामिल है।
संगठन के साथ अनुभव और समर्पण की सराहना
रोसेनमैन ने आरएसएस के सदस्यों की कार्यशैली की तारीफ करते हुए कहा, 'वहाँ के लोग मित्रवत और दिल खोलकर आपका स्वागत करने वाले हैं। संगठन में मेरे मित्र हैं, जिनसे मैं मिलता रहता हूँ। मैं सबसे अधिक प्रभावित संगठन के लोगों का अपने उद्देश्य के प्रति समर्पण देख कर होता हूँ।' उनके अनुसार, संगठन के स्वयंसेवक किसी भौतिक लाभ या स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि अपने उद्देश्य के प्रति ईमानदारी और प्रतिबद्धता से काम करते हैं।
यह ऐसे समय में आया है जब आरएसएस अपने स्थापना के 100 वर्ष पूरे कर रहा है और संगठन की वैश्विक स्तर पर पहचान बढ़ाने की कोशिशें तेज हुई हैं। एक विदेशी शोधकर्ता का यह सकारात्मक मूल्यांकन इस संदर्भ में उल्लेखनीय माना जा रहा है।
मेहनत आधारित प्रगति और मोदी का उदाहरण
रोसेनमैन ने कहा, 'आरएसएस में किसी व्यक्ति की प्रगति उसकी मेहनत और योग्यता के आधार पर होनी चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी इसका उदाहरण हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी कार्यशैली और उपलब्धियों के दम पर आगे बढ़ते रहे।' उन्होंने आगे कहा कि पश्चिमी देशों में भारत के बारे में सीमित जानकारी के बावजूद मोदी एक 'अंतरराष्ट्रीय ब्रांड' बन चुके हैं।
उनके अनुसार, 'आम तौर पर, पश्चिमी देशों के लोग भारत के बारे में बहुत कम जानते हैं; वे बस ताजमहल, महात्मा गांधी और मोदी को जानते हैं। इसलिए, वे जानते हैं कि वह एक अंतरराष्ट्रीय ब्रांड हैं, और यह बात अपने आप में बहुत कुछ कह जाती है।' रोसेनमैन ने यह भी जोड़ा कि प्रधानमंत्री की वैश्विक पहचान के साथ भारत का मान-सम्मान भी बढ़ा है।
विकास और सुशासन: समर्थन की असली वजह
रोसेनमैन ने कहा कि भारत में मोदी के प्रति समर्थन को समझने के लिए विकास और सुशासन के पहलुओं पर ध्यान देना ज़रूरी है। उन्होंने स्वच्छ पेयजल, शौचालय, रसोई गैस, बैंक खाते और बुनियादी ढाँचे में हुए बदलावों का उल्लेख करते हुए कहा, 'इन क्षेत्रों में हुए परिवर्तन आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं। कई भारतीयों के लिए विकास और बेहतर प्रशासन, विचारधारा से पहले महत्व रखते हैं।'
गौरतलब है कि ऐसे अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण, जो भारत की नीतियों और संस्थाओं को विकास के नजरिए से देखते हैं, पश्चिमी मीडिया में कम ही उभर पाते हैं। रोसेनमैन ने इसी असंतुलन की ओर इशारा किया।
आरएसएस की सांस्कृतिक और सामाजिक भूमिका
इजरायली शोधकर्ता ने आरएसएस के सामाजिक कार्यों की भी सराहना करते हुए कहा कि संगठन का काम केवल विचारधारा तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक गतिविधियाँ भी इसकी पहचान का हिस्सा हैं। सांस्कृतिक भूमिका पर उन्होंने कहा, 'संगठन भारतीय सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने और उसे आगे बढ़ाने में भूमिका निभाता है।'
रोसेनमैन ने पश्चिमी देशों के लोगों से अपील की कि वे भारत की सभ्यता, इतिहास, गणित, साहित्य और सांस्कृतिक विरासत को पूर्वाग्रह के बिना समझें। उनके अनुसार, भारतीय और पश्चिमी सभ्यताओं के बीच कुछ साझा विचार और मूल्य भी हैं, और दोनों के बीच संवाद से सांस्कृतिक समझ को बढ़ाया जा सकता है।
प्रत्यक्ष संवाद की अपील
रोसेनमैन ने स्पष्ट किया कि आरएसएस को लेकर राय बनाने से पहले लोगों को संगठन के सदस्यों से सीधी बातचीत करनी चाहिए, न कि केवल तीसरे पक्ष की जानकारी पर निर्भर रहना चाहिए। उनका मानना है कि भारत की सांस्कृतिक विरासत को समझने से देश और उसकी संस्थाओं के बारे में व्यापक दृष्टिकोण विकसित हो सकता है। यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब आरएसएस को लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में अक्सर एकतरफा विमर्श देखा जाता है।