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आरएसएस को राजनीतिक नहीं, सेवा के नज़रिए से देखें — 'हंड्रेड ईयर्स यंग' लेखिका रश्मि सामंत

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आरएसएस को राजनीतिक नहीं, सेवा के नज़रिए से देखें — 'हंड्रेड ईयर्स यंग' लेखिका रश्मि सामंत

सारांश

'हंड्रेड ईयर्स यंग' की लेखिका रश्मि सामंत का कहना है कि आरएसएस को राजनीतिक नहीं, सेवा के नज़रिए से समझना ज़रूरी है। 20 युवा लेखकों के बदले अनुभवों की यह पुस्तक संघ की उस तस्वीर को सामने लाती है जो मुख्यधारा की बहस में अक्सर नज़रअंदाज़ होती है।

मुख्य बातें

रश्मि सामंत की पुस्तक 'हंड्रेड ईयर्स यंग' में 20 युवा लेखकों के आरएसएस के साथ बदले अनुभव संकलित हैं, जिनमें से अधिकांश 30 वर्ष से कम आयु के हैं।
पुस्तक में भारतीय, ब्रिटिश, इजरायली और अमेरिकी योगदानकर्ता हैं; हिंदू, ईसाई, मुस्लिम, यहूदी और एलजीबीटीक्यूआईए+ समुदाय के दृष्टिकोण शामिल हैं।
1962 के भारत चीन युद्ध के दौरान आरएसएस स्वयंसेवकों ने सिविल प्रशासन के कार्य संभाले; पंडित नेहरू ने संघ को 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में आमंत्रित किया था।
सामंत के अनुसार आरएसएस कोविड, भूकंप और बाढ़ जैसी आपदाओं में सबसे पहले राहत लेकर पहुँचा।
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने पुस्तक की प्रस्तावना लिखी है, जो संगठन और आलोचनाओं के बीच संतुलित दृष्टिकोण का समर्थन करती है।

नई दिल्ली — राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को अक्सर एक राजनीतिक चश्मे से देखा जाता है, लेकिन इसकी असली पहचान सेवा पर आधारित एक संगठन के रूप में है — यह कहना है 'हंड्रेड ईयर्स यंग : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' पुस्तक की लेखिका रश्मि सामंत का। 18 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में हुई एक विशेष बातचीत में उन्होंने संघ से जुड़ी गलतफहमियों, उसके सेवा कार्यों और युवाओं से उसकी प्रासंगिकता पर विस्तार से अपने विचार रखे।

पुस्तक का उद्देश्य: पूर्वाग्रह नहीं, अनुभव

रश्मि सामंत के अनुसार, आरएसएस को प्रायः एक 'कलर्ड लेंस' यानी पूर्वाग्रह वाले चश्मे से देखा जाता है। उनका कहना है, "जिन लोगों ने इस संगठन के साथ काम किया है या इसके संपर्क में रहे हैं, उनका अनुभव बहुत सकारात्मक रहा है।" पुस्तक में 20 युवा और प्रतिभाशाली लेखकों के वे अनुभव संकलित हैं, जिनकी आरएसएस के बारे में पहले की धारणा और बाद में बदली सोच को दर्ज किया गया है।

पुस्तक की प्रस्तावना में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत लिखते हैं कि कई लोगों ने संघ को ठीक से जाने बिना आलोचनात्मक या अत्यधिक प्रशंसात्मक टिप्पणियाँ की हैं। सामंत का कहना है कि यह पुस्तक इन दोनों अतिवादी नज़रियों के बीच एक संतुलित रास्ता प्रस्तुत करती है।

'100 ईयर्स यंग' शीर्षक का अर्थ

पुस्तक के शीर्षक के बारे में सामंत बताती हैं कि आरएसएस की सभी शाखाओं में युवा आज भी खेल कूद, शारीरिक गतिविधियों और बौद्धिक चर्चाओं में सक्रिय हैं। उन्होंने कहा, "इस किताब में योगदान देने वाले सभी लेखक 40 साल से कम उम्र के हैं — इनमें से अधिकांश 30 साल से भी कम के हैं।" यही कारण है कि एक शताब्दी पुराने संगठन को 'यंग' कहा गया है।

विविधता और समावेश: पुस्तक में अनेक आवाज़ें

सामंत ने बताया कि उनका उद्देश्य था कि पुस्तक में सभी धर्मों, पहचानों और राष्ट्रीयताओं के लोगों को शामिल किया जाए। इसलिए पुस्तक में भारतीय, ब्रिटिश, इजरायली और अमेरिकी योगदानकर्ता हैं। धार्मिक दृष्टि से इसमें हिंदू, ईसाई, मुस्लिम और यहूदी नज़रिए शामिल हैं। एलजीबीटीक्यूआईए+ समुदाय के लोग और उनके समर्थक भी इसमें अपनी बात रखते हैं।

इसके अलावा, ब्रिटिश, इजरायली, जर्मन विद्वानों और जर्मनी के एक सांसद ने भी भारतीय अध्ययन पर अपने शोध के आधार पर आरएसएस के बारे में लिखा है।

आरएसएस के सेवा कार्य: इतिहास के पन्नों में

सामंत ने आरएसएस के ऐतिहासिक सेवा योगदान पर विस्तार से बात की। उन्होंने बताया कि 1962 के भारत चीन युद्ध के दौरान जब सिविल पुलिस को सीमा पर भेजा गया, तब पूरे देश में ट्रैफिक नियंत्रण जैसे नागरिक कार्य आरएसएस के स्वयंसेवकों ने संभाले। यह ऐतिहासिक तथ्य बहुत कम लोगों को ज्ञात है। उन्होंने यह भी बताया कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने आरएसएस को 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में आमंत्रित किया था, जिसमें 3,500 स्वयंसेवकों ने मार्च किया।

इसके अलावा, कोविड महामारी के दौरान सेक्स वर्कर और ट्रांसजेंडर समुदाय को राहत पहुँचाने में आरएसएस सबसे पहले आगे आया। गुजरात भूकंप के समय सरकारी सहायता पहुँचने से पहले ही स्वयंसेवक घटनास्थल पर मौजूद थे। विभाजन के दौरान पाकिस्तान से आए सिंधी हिंदुओं की मदद का उल्लेख भी उन्होंने किया।

युवा पीढ़ी, वैचारिक टकराव और आगे का रास्ता

युवाओं में वैचारिक मतभेद के सवाल पर सामंत ने कहा कि भारत की युवा आबादी लगभग 30 से 40 करोड़ है और वे रचनात्मक, राष्ट्र निर्माण के कार्यों में लगे हैं। उन्होंने स्काईरूट का उदाहरण दिया, जिसने भारत का पहला निजी अंतरिक्ष यान लॉन्च किया। उनके अनुसार नकारात्मक खबरों को सोशल मीडिया के एल्गोरिदम के कारण अनुपात से अधिक कवरेज मिलती है।

दुनिया के सबसे बड़े छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) — जो आरएसएस से प्रेरित है — का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इसने 1947 से ही पेपर लीक जैसे मुद्दों पर संघर्ष किया है। सामंत का मानना है कि संवाद और धैर्य के साथ बातचीत ही वैचारिक मतभेदों को दूर करने का सही मार्ग है, और आरएसएस हमेशा से इस बातचीत के लिए खुला रहा है।

आने वाले समय में आरएसएस और युवाओं के बीच सार्थक संवाद की उम्मीद के साथ सामंत ने कहा कि आज का आरएसएस 1925 के आरएसएस से काफी अलग है — यह समय के साथ खुद को ढालता है और सीखता रहता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो मुख्यधारा की कवरेज की एक बड़ी चूक सामने आती है। हालाँकि, एक पाठक के तौर पर यह भी ज़रूरी है कि इन दावों को स्वतंत्र शोध और डेटा की कसौटी पर परखा जाए — केवल अनुभव कथन पर्याप्त नहीं होते। पुस्तक की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इसमें सभी पक्षों — विदेशी विद्वानों से लेकर एलजीबीटीक्यूआईए+ समुदाय तक — की आवाज़ें शामिल हैं; यह इसे प्रचार से अलग करती है, भले ही इसका झुकाव स्पष्ट हो।
RashtraPress
18 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'हंड्रेड ईयर्स यंग' पुस्तक क्या है और इसे किसने लिखा है?
यह पुस्तक रश्मि सामंत द्वारा लिखित है और इसमें 20 युवा लेखकों के वे अनुभव संकलित हैं, जिनकी आरएसएस के बारे में सोच पहले अलग थी और जो बाद में बदल गई। पुस्तक की प्रस्तावना आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने लिखी है।
रश्मि सामंत के अनुसार आरएसएस को राजनीतिक नज़रिए से क्यों नहीं देखना चाहिए?
सामंत का कहना है कि आरएसएस मूल रूप से एक सेवा आधारित संगठन है, जो भूकंप, बाढ़, युद्ध और महामारी जैसी हर आपदा में सबसे पहले सहायता पहुँचाता है। उनके अनुसार, भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सत्ता में होने के कारण इसे राजनीतिक दृष्टि से देखा जाता है, जबकि संघ का अस्तित्व उससे बहुत पहले से है।
पुस्तक में किन किन धर्मों और राष्ट्रीयताओं के लेखक शामिल हैं?
पुस्तक में भारतीय, ब्रिटिश, इजरायली और अमेरिकी योगदानकर्ता हैं। धार्मिक दृष्टि से इसमें हिंदू, ईसाई, मुस्लिम और यहूदी नज़रिए शामिल हैं, और एलजीबीटीक्यूआईए+ समुदाय के लोग भी इसमें अपनी बात रखते हैं।
आरएसएस के किन ऐतिहासिक सेवा कार्यों का उल्लेख पुस्तक में है?
पुस्तक में 1962 के भारत चीन युद्ध के दौरान आरएसएस स्वयंसेवकों द्वारा सिविल प्रशासन संभालने का उल्लेख है। इसके अलावा 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में 3,500 स्वयंसेवकों की भागीदारी, कोविड महामारी में हाशिये पर खड़े समुदायों की सहायता, और गुजरात भूकंप के दौरान सरकारी मदद से पहले पहुँचने का ज़िक्र किया गया है।
आरएसएस और आज की युवा पीढ़ी के बीच क्या संबंध है?
रश्मि सामंत के अनुसार, आरएसएस आज भी मूलतः एक युवा संगठन है जहाँ शाखाओं में खेल कूद और बौद्धिक चर्चाएँ होती हैं। संघ से प्रेरित अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) को वे दुनिया का सबसे बड़ा छात्र संगठन बताती हैं, जो 1947 से युवाओं के मुद्दों पर सक्रिय रहा है।
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