आरएसएस को अलग-थलग करना अमेरिकी हितों के लिए घातक: हडसन इंस्टीट्यूट के स्कॉलर की चेतावनी
सारांश
मुख्य बातें
हडसन इंस्टीट्यूट के सीनियर फेलो बिल ड्रेक्सेल ने चेतावनी दी है कि अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में राजनीतिक नेताओं और एडवोकेसी समूहों द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को अलग-थलग करने की मुहिम अमेरिकी हितों को नुकसान पहुँचा सकती है और अमेरिका-भारत संबंधों को प्रगाढ़ करने के प्रयासों को कमज़ोर कर सकती है। यह तर्क उन्होंने वॉल स्ट्रीट जर्नल में प्रकाशित एक ओपिनियन लेख में रखा, जो 29 अगस्त को न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के कार्यक्रम के बाद सामने आया।
मैडिसन स्क्वायर गार्डन कार्यक्रम और विवाद
29 अगस्त को मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने लगभग 5,000 लोगों को संबोधित किया। इस आयोजन को 'सार्वभौमिक एकता' के उत्सव के रूप में प्रस्तुत किया गया था। कार्यक्रम के पहले और बाद में पश्चिमी देशों में इसे लेकर तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आईं।
न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी ने बुकिंग रद्द करने की माँगों पर प्रतिक्रिया देते हुए आरएसएस की हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा को 'अलग करने वाली' और इसके उभार को 'बेहद चिंताजनक' बताया। हालाँकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि शहर प्रशासन का इस निजी कार्यक्रम पर कोई अधिकार नहीं था।
अंतरराष्ट्रीय दबाव की कोशिशें
लेख के अनुसार, यूएस कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (यूएससीआईआरएफ) ने भागवत का वीज़ा रद्द करने की माँग की। टोरंटो में उनके अगले कार्यक्रम से पूर्व लगभग 270 संगठनों ने कनाडाई सरकार से आरएसएस को आतंकवादी संगठन घोषित करने पर विचार करने का आग्रह किया। लंदन में भी समूहों ने मेयर सादिक खान से अनुरोध किया कि भागवत को शहर के नियंत्रण वाले किसी भी स्थान पर कार्यक्रम करने की अनुमति न दी जाए।
आरएसएस का आकार और प्रभाव
ड्रेक्सेल ने अपने लेख में आरएसएस की व्यापकता का विवरण दिया। उन्होंने बताया कि यह संगठन पूरे भारत में लगभग 83,000 नियमित स्थानीय बैठकें आयोजित करता है, जिनमें शारीरिक व्यायाम, गीत, खेल और हिंदू सभ्यता की जानकारी शामिल होती है। इसके अनुमानित 50 लाख प्रतिभागियों में से लगभग सभी अवैतनिक स्वयंसेवक हैं।
उन्होंने आरएसएस को व्यापक हिंदू राष्ट्रवादी आंदोलन का अगुआ बताया और कहा कि इसने लगभग 2,500 संबद्ध संगठन बनाने में सहयोग किया है। इस नेटवर्क में धार्मिक समूह, एक मज़दूर संघ और निजी स्कूलों की एक बड़ी श्रृंखला शामिल है।
अमेरिकी हितों पर असर और रणनीतिक तर्क
ड्रेक्सेल ने तर्क दिया कि इज़रायल के खिलाफ अभियान की तर्ज़ पर आरएसएस को अलग-थलग करने की कोशिश उस संगठन की तुलना में अमेरिकी हितों को अधिक नुकसान पहुँचाती है, जिसे निशाना बनाया जा रहा है। उनके अनुसार, भारत में आरएसएस के आकार, पहुँच और प्रभाव को देखते हुए इस तरह की कोशिशों से उसके कमज़ोर होने की संभावना नगण्य है।
उन्होंने लिखा कि भारत के सबसे प्रभावशाली नागरिक-समाज संगठन के लिए दरवाज़े बंद करने से केवल आरएसएस के उन गुटों को बल मिलेगा जिनका आलोचक सबसे अधिक विरोध करते हैं — और जो प्रायः इस बात से सहमत होते हैं कि संवाद की कोई गुंजाइश नहीं है। ड्रेक्सेल ने भारत की आर्थिक प्रगति और इंडो-पैसिफिक तथा मध्य पूर्व में उसकी रणनीतिक भूमिका का भी हवाला देते हुए कहा कि आरएसएस के विचारों का समर्थन किए बिना भी अमेरिका के लिए इसके साथ जुड़ना और इसे समझना ज़रूरी है।
यह लेख ऐसे समय में आया है जब अमेरिका-भारत संबंध रणनीतिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर नई ऊँचाइयाँ छू रहे हैं और पश्चिमी देशों में भारतीय संगठनों की गतिविधियों को लेकर बहस तेज़ हो रही है।