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आरएसएस को अलग-थलग करना अमेरिकी हितों के लिए घातक: हडसन इंस्टीट्यूट के स्कॉलर की चेतावनी

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आरएसएस को अलग-थलग करना अमेरिकी हितों के लिए घातक: हडसन इंस्टीट्यूट के स्कॉलर की चेतावनी

सारांश

पश्चिमी देशों में आरएसएस को घेरने की मुहिम उल्टी पड़ सकती है — यही कहना है हडसन इंस्टीट्यूट के स्कॉलर बिल ड्रेक्सेल का। 83,000 बैठकें, 50 लाख स्वयंसेवक और 2,500 संबद्ध संगठनों वाले इस नेटवर्क को बाहर से कमज़ोर करना अमेरिका के लिए भारत से दूरी का नुस्खा बन सकता है।

मुख्य बातें

हडसन इंस्टीट्यूट के सीनियर फेलो बिल ड्रेक्सेल ने वॉल स्ट्रीट जर्नल में लिखा कि आरएसएस को अलग-थलग करने की मुहिम अमेरिकी हितों को नुकसान पहुँचाती है।
29 अगस्त को मैडिसन स्क्वायर गार्डन , न्यूयॉर्क में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने लगभग 5,000 लोगों को संबोधित किया।
यूएससीआईआरएफ ने भागवत का वीज़ा रद्द करने की माँग की; 270 संगठनों ने कनाडा से आरएसएस को आतंकवादी संगठन घोषित करने का आग्रह किया।
आरएसएस पूरे भारत में 83,000 नियमित बैठकें आयोजित करता है और इसके अनुमानित 50 लाख अवैतनिक स्वयंसेवक हैं।
ड्रेक्सेल के अनुसार, पश्चिमी दबाव आरएसएस के उन कट्टर गुटों को और मज़बूत कर सकता है जो संवाद को अस्वीकार करते हैं।

हडसन इंस्टीट्यूट के सीनियर फेलो बिल ड्रेक्सेल ने चेतावनी दी है कि अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में राजनीतिक नेताओं और एडवोकेसी समूहों द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को अलग-थलग करने की मुहिम अमेरिकी हितों को नुकसान पहुँचा सकती है और अमेरिका-भारत संबंधों को प्रगाढ़ करने के प्रयासों को कमज़ोर कर सकती है। यह तर्क उन्होंने वॉल स्ट्रीट जर्नल में प्रकाशित एक ओपिनियन लेख में रखा, जो 29 अगस्त को न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के कार्यक्रम के बाद सामने आया।

मैडिसन स्क्वायर गार्डन कार्यक्रम और विवाद

29 अगस्त को मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने लगभग 5,000 लोगों को संबोधित किया। इस आयोजन को 'सार्वभौमिक एकता' के उत्सव के रूप में प्रस्तुत किया गया था। कार्यक्रम के पहले और बाद में पश्चिमी देशों में इसे लेकर तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आईं।

न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी ने बुकिंग रद्द करने की माँगों पर प्रतिक्रिया देते हुए आरएसएस की हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा को 'अलग करने वाली' और इसके उभार को 'बेहद चिंताजनक' बताया। हालाँकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि शहर प्रशासन का इस निजी कार्यक्रम पर कोई अधिकार नहीं था।

अंतरराष्ट्रीय दबाव की कोशिशें

लेख के अनुसार, यूएस कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (यूएससीआईआरएफ) ने भागवत का वीज़ा रद्द करने की माँग की। टोरंटो में उनके अगले कार्यक्रम से पूर्व लगभग 270 संगठनों ने कनाडाई सरकार से आरएसएस को आतंकवादी संगठन घोषित करने पर विचार करने का आग्रह किया। लंदन में भी समूहों ने मेयर सादिक खान से अनुरोध किया कि भागवत को शहर के नियंत्रण वाले किसी भी स्थान पर कार्यक्रम करने की अनुमति न दी जाए।

आरएसएस का आकार और प्रभाव

ड्रेक्सेल ने अपने लेख में आरएसएस की व्यापकता का विवरण दिया। उन्होंने बताया कि यह संगठन पूरे भारत में लगभग 83,000 नियमित स्थानीय बैठकें आयोजित करता है, जिनमें शारीरिक व्यायाम, गीत, खेल और हिंदू सभ्यता की जानकारी शामिल होती है। इसके अनुमानित 50 लाख प्रतिभागियों में से लगभग सभी अवैतनिक स्वयंसेवक हैं।

उन्होंने आरएसएस को व्यापक हिंदू राष्ट्रवादी आंदोलन का अगुआ बताया और कहा कि इसने लगभग 2,500 संबद्ध संगठन बनाने में सहयोग किया है। इस नेटवर्क में धार्मिक समूह, एक मज़दूर संघ और निजी स्कूलों की एक बड़ी श्रृंखला शामिल है।

अमेरिकी हितों पर असर और रणनीतिक तर्क

ड्रेक्सेल ने तर्क दिया कि इज़रायल के खिलाफ अभियान की तर्ज़ पर आरएसएस को अलग-थलग करने की कोशिश उस संगठन की तुलना में अमेरिकी हितों को अधिक नुकसान पहुँचाती है, जिसे निशाना बनाया जा रहा है। उनके अनुसार, भारत में आरएसएस के आकार, पहुँच और प्रभाव को देखते हुए इस तरह की कोशिशों से उसके कमज़ोर होने की संभावना नगण्य है।

उन्होंने लिखा कि भारत के सबसे प्रभावशाली नागरिक-समाज संगठन के लिए दरवाज़े बंद करने से केवल आरएसएस के उन गुटों को बल मिलेगा जिनका आलोचक सबसे अधिक विरोध करते हैं — और जो प्रायः इस बात से सहमत होते हैं कि संवाद की कोई गुंजाइश नहीं है। ड्रेक्सेल ने भारत की आर्थिक प्रगति और इंडो-पैसिफिक तथा मध्य पूर्व में उसकी रणनीतिक भूमिका का भी हवाला देते हुए कहा कि आरएसएस के विचारों का समर्थन किए बिना भी अमेरिका के लिए इसके साथ जुड़ना और इसे समझना ज़रूरी है।

यह लेख ऐसे समय में आया है जब अमेरिका-भारत संबंध रणनीतिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर नई ऊँचाइयाँ छू रहे हैं और पश्चिमी देशों में भारतीय संगठनों की गतिविधियों को लेकर बहस तेज़ हो रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह एक असुविधाजनक प्रश्न को टाल देता है — क्या 'जुड़ाव' की नीति तब भी उतनी ही प्रभावी होती है जब संगठन के भीतर विविध धाराएँ हों और पारदर्शिता सीमित हो? मुख्यधारा की कवरेज इस बात को नज़रअंदाज़ करती है कि पश्चिमी आलोचना और कूटनीतिक जुड़ाव परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक भी हो सकते हैं। गौरतलब है कि इज़रायल की तुलना — जो ड्रेक्सेल खुद करते हैं — एक जटिल मिसाल है, क्योंकि वहाँ अलगाव की नीति के नतीजे भी मिले-जुले रहे हैं। असली सवाल यह है कि अमेरिका 'जुड़ाव' को किस शर्त पर परिभाषित करता है — और क्या वह शर्त भारत की आंतरिक बहुलता का सम्मान करती है।
RashtraPress
9 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बिल ड्रेक्सेल कौन हैं और उन्होंने आरएसएस पर क्या कहा?
बिल ड्रेक्सेल हडसन इंस्टीट्यूट के सीनियर फेलो और अमेरिकी विदेश नीति के जानकार हैं। उन्होंने वॉल स्ट्रीट जर्नल में लिखा कि पश्चिमी देशों द्वारा आरएसएस को अलग-थलग करने की कोशिश अमेरिकी हितों को नुकसान पहुँचाती है और अमेरिका-भारत संबंधों को कमज़ोर करती है।
मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आरएसएस का कार्यक्रम क्यों विवादास्पद रहा?
29 अगस्त को न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने लगभग 5,000 लोगों को संबोधित किया। न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी ने आरएसएस की विचारधारा को 'अलग करने वाली' बताया, जबकि यूएससीआईआरएफ ने भागवत का वीज़ा रद्द करने की माँग की।
कनाडा और ब्रिटेन में आरएसएस के खिलाफ क्या कदम उठाने की माँग हुई?
टोरंटो में भागवत के कार्यक्रम से पहले लगभग 270 संगठनों ने कनाडाई सरकार से आरएसएस को आतंकवादी संगठन घोषित करने पर विचार करने का आग्रह किया। लंदन में समूहों ने मेयर सादिक खान से अनुरोध किया कि भागवत को शहर के नियंत्रण वाले किसी भी स्थान पर कार्यक्रम की अनुमति न दी जाए।
आरएसएस का भारत में कितना विस्तार है?
आरएसएस पूरे भारत में लगभग 83,000 नियमित स्थानीय बैठकें आयोजित करता है और इसके अनुमानित 50 लाख प्रतिभागी हैं, जिनमें से लगभग सभी अवैतनिक स्वयंसेवक हैं। इसने लगभग 2,500 संबद्ध संगठन बनाने में सहयोग किया है, जिनमें धार्मिक समूह, मज़दूर संघ और निजी स्कूलों की श्रृंखला शामिल है।
ड्रेक्सेल के अनुसार आरएसएस को अलग-थलग करने से क्या नुकसान हो सकता है?
ड्रेक्सेल के अनुसार, पश्चिमी दबाव आरएसएस के उन कट्टर गुटों को और मज़बूत कर सकता है जो संवाद को अस्वीकार करते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि भारत की रणनीतिक और आर्थिक अहमियत को देखते हुए अमेरिका के लिए आरएसएस के साथ जुड़ना और उसे समझना ज़रूरी है।
राष्ट्र प्रेस
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