23 अक्टूबर 2026
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सीजेपी कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी पर 'सामना' का प्रहार: शिवसेना (यूबीटी) ने केंद्र पर 'पुलिस राज' का आरोप लगाया

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सीजेपी कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी पर 'सामना' का प्रहार: शिवसेना (यूबीटी) ने केंद्र पर 'पुलिस राज' का आरोप लगाया

सारांश

शिवसेना (यूबीटी) के मुखपत्र 'सामना' ने सीजेपी कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी को लेकर केंद्र पर सीधा हमला बोला — जंतर-मंतर बंद, युवा जेल में, और सवाल यह कि क्या तिरंगा थामना अब अपराध है।

मुख्य बातें

शिवसेना (यूबीटी) ने 23 अक्टूबर 2026 को 'सामना' संपादकीय में केंद्र सरकार पर 'पुलिस राज' स्थापित करने का आरोप लगाया।
सीजेपी कार्यकर्ता सौरव दास और आशुतोष रांका को तिहाड़ जेल में 7 दिन हिरासत में रखा गया।
दोनों ने जंतर-मंतर को अधिकृत विरोध स्थलों से एकतरफा हटाने के सरकारी आदेश की अवहेलना की थी।
'सामना' ने मुंबई, दिल्ली, पटना, लखनऊ और कोलकाता में विरोध स्थलों पर कब्जे की निंदा की।
दुष्कर्म दोषी कुलदीप सेंगर की सजा निलंबन और युवा प्रदर्शनकारियों पर सख्ती को विरोधाभास के रूप में उठाया गया।
सोनम वांगचुक और अर्थशास्त्री पराकला प्रभाकर का हवाला देते हुए 'अवांछित तत्व' के तर्क को खारिज किया गया।

शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने 23 अक्टूबर 2026 को अपने मुखपत्र 'सामना' में प्रकाशित एक तीखे संपादकीय के ज़रिए केंद्र सरकार पर 'गहरी असुरक्षा' से ग्रस्त होने और देश में 'पुलिस राज' स्थापित करने का आरोप लगाया। यह आलोचना 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) के युवा कार्यकर्ताओं सौरव दास और आशुतोष रांका की गिरफ्तारी और उन्हें सात दिनों तक हिरासत में रखे जाने के संदर्भ में की गई है।

गिरफ्तारी की पृष्ठभूमि

दोनों कार्यकर्ताओं को तिहाड़ जेल भेजा गया था। उन पर आरोप था कि उन्होंने सरकार के उस एकतरफा आदेश की अवहेलना की, जिसके तहत जंतर-मंतर को अधिकृत विरोध स्थलों की सूची से हटा दिया गया था। दास और रांका भ्रष्ट चुनावी तौर-तरीकों के खिलाफ वहाँ प्रदर्शन करने पहुँचे थे।

गौरतलब है कि जंतर-मंतर दशकों से नागरिक असहमति का प्रतीकात्मक केंद्र रहा है। इसे विरोध स्थलों की सूची से हटाना, आलोचकों के अनुसार, लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के एक स्थापित मंच को बंद करने जैसा है।

'सामना' का तर्क: लोकतंत्र बनाम दमन

'सामना' के संपादकीय में तीखा सवाल दागा गया — 'ये युवा जंतर-मंतर पर डांडिया खेलने नहीं गए थे। वे भ्रष्ट चुनावी तौर-तरीकों के खिलाफ अपनी आवाज उठाने गए थे। सरकार के अन्याय के खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए सरकार से ही अनुमति माँगना बेतुका है।'

संपादकीय में मुंबई, दिल्ली, पटना, लखनऊ और कोलकाता जैसे शहरों में सार्वजनिक विरोध स्थलों पर कब्जे की निंदा करते हुए इसे 'लोकतंत्र का गला घोंटना' करार दिया गया। साथ ही कहा गया कि पुलिस तंत्र और वफादार समर्थकों का उपयोग असहमति दबाने के लिए हो रहा है।

न्यायपालिका और विरोधाभास पर सवाल

'सामना' ने एक बड़ा विरोधाभास सामने रखा — जहाँ अदालतें तिरंगा थामे युवाओं को उपदेश देती हैं, वहीं गंभीर अपराध करने वालों के प्रति न्याय व्यवस्था कथित तौर पर नरम रुख अपनाती है। इसके उदाहरण के रूप में दुष्कर्म के दोषी पूर्व नेता कुलदीप सेंगर का हवाला दिया गया, जिनकी सजा एक न्यायाधीश ने निलंबित की थी।

पार्टी ने हाई कोर्ट द्वारा प्रदर्शनकारी युवाओं को फ्रांस या अल्बानिया के छात्र आंदोलनों का हवाला देकर नसीहत देने पर भी गहरी निराशा जताई। शिवसेना (यूबीटी) ने न्यायपालिका से आग्रह किया कि वह केवल ऊपरी लक्षणों को देखने के बजाय समस्या की जड़ तक जाए।

प्रमुख नामों का उल्लेख

पुलिस की कार्रवाई को सही ठहराने के लिए दिए गए 'अवांछित तत्वों' के तर्क को खारिज करते हुए 'सामना' ने सोनम वांगचुक, विपक्षी सांसदों और अर्थशास्त्री पराकला प्रभाकर जैसे प्रमुख लोगों का उल्लेख किया, जो सड़कों पर उतरे थे। संपादकीय में पूछा गया — 'क्या ये लोग भी उपद्रवी हैं?'

यह ऐसे समय में आया है जब विपक्षी दलों और नागरिक समाज के बीच सरकार पर विरोध प्रदर्शन के अधिकारों को संकुचित करने के आरोप बढ़ते जा रहे हैं। शिवसेना (यूबीटी) की राय में, मौजूदा नेतृत्व की नीति स्पष्ट है — नागरिकों को न सवाल पूछने चाहिए और न जवाबदेही माँगनी चाहिए।

आगे का राजनीतिक परिदृश्य

'सामना' ने अंत में कहा — 'जब कोई सरकार तिरंगा थामे शांतिप्रिय युवाओं से डरने लगे, तो यह उसकी ताकत नहीं, बल्कि उसके राजनीतिक वहम की पराकाष्ठा है।' यह संपादकीय स्पष्ट संकेत देता है कि आने वाले दिनों में शिवसेना (यूबीटी) इस मुद्दे को और तेज़ी से उठाती रहेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

इसलिए इसे उसी परिप्रेक्ष्य में पढ़ा जाना चाहिए — लेकिन जंतर-मंतर को अधिकृत विरोध स्थलों से हटाने का सवाल केवल दलगत राजनीति से परे जाता है। यह एक ऐसी प्रशासनिक कार्रवाई है जिस पर स्वतंत्र नागरिक समाज भी सवाल उठा रहा है। कुलदीप सेंगर जैसे उदाहरण वाकई न्यायिक प्राथमिकताओं पर असहज करने वाले सवाल खड़े करते हैं। मुख्यधारा की कवरेज जो अक्सर चूक जाती है, वह यह है कि विरोध स्थलों का नियमन कब वैध प्रशासन है और कब असहमति का दमन — इस रेखा को स्पष्ट करना अदालतों और नागरिक समाज दोनों की ज़िम्मेदारी है।
RashtraPress
23 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सीजेपी कार्यकर्ता सौरव दास और आशुतोष रांका को क्यों गिरफ्तार किया गया?
दोनों कार्यकर्ताओं ने सरकार के उस आदेश की अवहेलना की, जिसके तहत जंतर-मंतर को अधिकृत विरोध स्थलों की सूची से एकतरफा हटाया गया था। वे भ्रष्ट चुनावी तौर-तरीकों के खिलाफ वहाँ प्रदर्शन करने पहुँचे थे और उन्हें तिहाड़ जेल में 7 दिन हिरासत में रखा गया।
'सामना' संपादकीय में केंद्र पर क्या आरोप लगाए गए?
शिवसेना (यूबीटी) के मुखपत्र 'सामना' ने केंद्र सरकार पर 'गहरी असुरक्षा' और 'पुलिस राज' कायम करने का आरोप लगाया। संपादकीय में कहा गया कि असहमति दबाने के लिए पुलिस और वफादार समर्थकों का इस्तेमाल हो रहा है और मुंबई, दिल्ली समेत कई शहरों में विरोध स्थलों पर कब्जा कर लोकतंत्र का गला घोंटा जा रहा है।
जंतर-मंतर को विरोध स्थलों से क्यों हटाया गया?
सरकार ने जंतर-मंतर को अधिकृत विरोध स्थलों की सूची से एकतरफा तरीके से हटा दिया। इस फैसले का कोई विस्तृत सार्वजनिक कारण नहीं दिया गया, और इसी आदेश की अवहेलना करने पर सीजेपी कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया।
शिवसेना (यूबीटी) ने न्यायपालिका के बारे में क्या कहा?
'सामना' ने अदालतों से आग्रह किया कि वे केवल ऊपरी लक्षण देखने के बजाय समस्या की जड़ तक जाएँ। पार्टी ने हाई कोर्ट द्वारा युवा प्रदर्शनकारियों को विदेशी छात्र आंदोलनों का उदाहरण देकर नसीहत देने पर निराशा जताई और दुष्कर्म दोषी कुलदीप सेंगर की सजा निलंबन को विरोधाभास के रूप में पेश किया।
इस विवाद में सोनम वांगचुक और पराकला प्रभाकर का नाम क्यों आया?
पुलिस ने सार्वजनिक रैलियों में 'अवांछित तत्वों' के घुसने का तर्क दिया था। 'सामना' ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि सोनम वांगचुक, विपक्षी सांसद और अर्थशास्त्री पराकला प्रभाकर जैसे प्रतिष्ठित लोग भी सड़कों पर उतरे हैं, और उन्हें 'उपद्रवी' नहीं कहा जा सकता।
राष्ट्र प्रेस
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