सीजेपी कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी पर 'सामना' का प्रहार: शिवसेना (यूबीटी) ने केंद्र पर 'पुलिस राज' का आरोप लगाया
सारांश
मुख्य बातें
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने 23 अक्टूबर 2026 को अपने मुखपत्र 'सामना' में प्रकाशित एक तीखे संपादकीय के ज़रिए केंद्र सरकार पर 'गहरी असुरक्षा' से ग्रस्त होने और देश में 'पुलिस राज' स्थापित करने का आरोप लगाया। यह आलोचना 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) के युवा कार्यकर्ताओं सौरव दास और आशुतोष रांका की गिरफ्तारी और उन्हें सात दिनों तक हिरासत में रखे जाने के संदर्भ में की गई है।
गिरफ्तारी की पृष्ठभूमि
दोनों कार्यकर्ताओं को तिहाड़ जेल भेजा गया था। उन पर आरोप था कि उन्होंने सरकार के उस एकतरफा आदेश की अवहेलना की, जिसके तहत जंतर-मंतर को अधिकृत विरोध स्थलों की सूची से हटा दिया गया था। दास और रांका भ्रष्ट चुनावी तौर-तरीकों के खिलाफ वहाँ प्रदर्शन करने पहुँचे थे।
गौरतलब है कि जंतर-मंतर दशकों से नागरिक असहमति का प्रतीकात्मक केंद्र रहा है। इसे विरोध स्थलों की सूची से हटाना, आलोचकों के अनुसार, लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के एक स्थापित मंच को बंद करने जैसा है।
'सामना' का तर्क: लोकतंत्र बनाम दमन
'सामना' के संपादकीय में तीखा सवाल दागा गया — 'ये युवा जंतर-मंतर पर डांडिया खेलने नहीं गए थे। वे भ्रष्ट चुनावी तौर-तरीकों के खिलाफ अपनी आवाज उठाने गए थे। सरकार के अन्याय के खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए सरकार से ही अनुमति माँगना बेतुका है।'
संपादकीय में मुंबई, दिल्ली, पटना, लखनऊ और कोलकाता जैसे शहरों में सार्वजनिक विरोध स्थलों पर कब्जे की निंदा करते हुए इसे 'लोकतंत्र का गला घोंटना' करार दिया गया। साथ ही कहा गया कि पुलिस तंत्र और वफादार समर्थकों का उपयोग असहमति दबाने के लिए हो रहा है।
न्यायपालिका और विरोधाभास पर सवाल
'सामना' ने एक बड़ा विरोधाभास सामने रखा — जहाँ अदालतें तिरंगा थामे युवाओं को उपदेश देती हैं, वहीं गंभीर अपराध करने वालों के प्रति न्याय व्यवस्था कथित तौर पर नरम रुख अपनाती है। इसके उदाहरण के रूप में दुष्कर्म के दोषी पूर्व नेता कुलदीप सेंगर का हवाला दिया गया, जिनकी सजा एक न्यायाधीश ने निलंबित की थी।
पार्टी ने हाई कोर्ट द्वारा प्रदर्शनकारी युवाओं को फ्रांस या अल्बानिया के छात्र आंदोलनों का हवाला देकर नसीहत देने पर भी गहरी निराशा जताई। शिवसेना (यूबीटी) ने न्यायपालिका से आग्रह किया कि वह केवल ऊपरी लक्षणों को देखने के बजाय समस्या की जड़ तक जाए।
प्रमुख नामों का उल्लेख
पुलिस की कार्रवाई को सही ठहराने के लिए दिए गए 'अवांछित तत्वों' के तर्क को खारिज करते हुए 'सामना' ने सोनम वांगचुक, विपक्षी सांसदों और अर्थशास्त्री पराकला प्रभाकर जैसे प्रमुख लोगों का उल्लेख किया, जो सड़कों पर उतरे थे। संपादकीय में पूछा गया — 'क्या ये लोग भी उपद्रवी हैं?'
यह ऐसे समय में आया है जब विपक्षी दलों और नागरिक समाज के बीच सरकार पर विरोध प्रदर्शन के अधिकारों को संकुचित करने के आरोप बढ़ते जा रहे हैं। शिवसेना (यूबीटी) की राय में, मौजूदा नेतृत्व की नीति स्पष्ट है — नागरिकों को न सवाल पूछने चाहिए और न जवाबदेही माँगनी चाहिए।
आगे का राजनीतिक परिदृश्य
'सामना' ने अंत में कहा — 'जब कोई सरकार तिरंगा थामे शांतिप्रिय युवाओं से डरने लगे, तो यह उसकी ताकत नहीं, बल्कि उसके राजनीतिक वहम की पराकाष्ठा है।' यह संपादकीय स्पष्ट संकेत देता है कि आने वाले दिनों में शिवसेना (यूबीटी) इस मुद्दे को और तेज़ी से उठाती रहेगी।