14 अक्टूबर 2026
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जंतर-मंतर विरोध स्थल हटाने पर शिवसेना (यूबीटी) का केंद्र पर निशाना, 'सामना' में सत्तावाद का आरोप

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जंतर-मंतर विरोध स्थल हटाने पर शिवसेना (यूबीटी) का केंद्र पर निशाना, 'सामना' में सत्तावाद का आरोप

सारांश

दिल्ली पुलिस द्वारा जंतर-मंतर का प्रदर्शन-स्थल का दर्जा हटाने के बाद शिवसेना (यूबीटी) ने 'सामना' संपादकीय में केंद्र पर सत्तावाद का आरोप लगाया। वैकल्पिक स्थलों की ₹1.5 लाख/दिन की लागत को 'लोकतंत्र का व्यावसायीकरण' बताया; दिल्ली HC में याचिकाएँ दायर।

मुख्य बातें

शिवसेना (यूबीटी) ने 14 अक्टूबर 2026 को 'सामना' संपादकीय के माध्यम से केंद्र सरकार पर सत्तावाद संस्थागत करने का आरोप लगाया।
दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर से दशकों पुराने अधिकृत प्रदर्शन-स्थल का दर्जा हटाया; वैकल्पिक स्थल 4 से 21 किमी दूर निर्धारित किए गए।
रामलीला मैदान जैसे वैकल्पिक स्थलों की बुकिंग लागत ₹1.5 लाख प्रतिदिन से अधिक बताई गई है।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी सहित विपक्षी नेताओं ने इस कार्रवाई की निंदा की है।
गैर-अधिसूचना के विरुद्ध कानूनी याचिकाएँ दिल्ली उच्च न्यायालय में दायर की गई हैं।

शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने बुधवार, 14 अक्टूबर 2026 को केंद्र सरकार पर सत्तावाद को संस्थागत रूप देने और सार्वजनिक असहमति को व्यवस्थित ढंग से कुचलने का गंभीर आरोप लगाया। यह आलोचना दिल्ली पुलिस के उस फैसले के बाद सामने आई, जिसमें जंतर-मंतर से दशकों पुराने अधिकृत प्रदर्शन-स्थल का दर्जा हटा दिया गया।

सामना संपादकीय में क्या कहा गया

ठाकरे गुट के मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में दावा किया गया कि नए पुलिस आदेशों के तहत विरोध प्रदर्शनों को सत्ता के केंद्र से दूर धकेला जा रहा है। संपादकीय के अनुसार, अब प्रदर्शन के लिए रामलीला मैदान (लगभग 4 किमी दूर), शाहदरा स्थित सीबीडी ग्राउंड (लगभग 12 किमी दूर) और बुराड़ी ग्राउंड (20-21 किमी दूर) जैसी वैकल्पिक जगहें तय की गई हैं।

पार्टी का तर्क है कि यह एक सुनियोजित रणनीति है, जिसका उद्देश्य जन-आंदोलनों की आवाज़ को संसद और राष्ट्रीय विमर्श से दूर रखना है।

लोकतांत्रिक अधिकारों का 'व्यावसायीकरण'

संपादकीय में यह भी उजागर किया गया कि रामलीला मैदान जैसे वैकल्पिक स्थलों की बुकिंग लागत प्रतिदिन ₹1.5 लाख से अधिक है, महीनों पहले अग्रिम बुकिंग आवश्यक होती है, और ये स्थल प्रायः धार्मिक अथवा सत्तारूढ़ दल के आयोजनों के लिए आरक्षित रहते हैं। 'सामना' ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का 'व्यावसायीकरण' करार दिया।

गौरतलब है कि यह प्रशासनिक कार्रवाई उन समूहों के प्रदर्शनों के बाद आई, जो चुनावी जवाबदेही की माँग कर रहे थे। इन प्रदर्शनों के दौरान राजधानी में भारी सुरक्षा बल तैनात किए गए और बड़े पैमाने पर निवारक हिरासत की गई।

विपक्ष की प्रतिक्रिया और कानूनी चुनौती

ठाकरे गुट के अनुसार, कांग्रेस नेता राहुल गांधी सहित कई विपक्षी नेताओं ने इस कार्रवाई की कड़ी निंदा की है। साथ ही, जंतर-मंतर की गैर-अधिसूचना को चुनौती देने वाली याचिकाएँ तेज़ी से दिल्ली उच्च न्यायालय में दायर की गई हैं।

यह ऐसे समय में आया है जब नागरिक स्वतंत्रताओं पर बहस राष्ट्रीय स्तर पर तेज़ हो रही है और विपक्षी दल एकजुट होकर केंद्र सरकार पर दबाव बना रहे हैं।

ठाकरे गुट की चेतावनी

उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने दावा किया कि जब कोई सरकार 'अपनी ही जनता से डरने लगती है, तो उसके अंत की उलटी गिनती आधिकारिक रूप से शुरू हो जाती है।' पार्टी के अनुसार, शांतिपूर्ण सभा का अधिकार संवैधानिक रूप से संरक्षित है और आवाज़ों को शहर की सीमा से बाहर धकेलना 'गहरे प्रशासनिक भय' का प्रमाण है।

आने वाले दिनों में दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले और केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया इस विवाद की दिशा तय करेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

जबकि असली सवाल यह है कि क्या नागरिक समाज के लिए प्रदर्शन का अधिकार व्यवहार में उतना ही सुलभ है जितना संविधान में लिखा है।
RashtraPress
14 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जंतर-मंतर से प्रदर्शन स्थल का दर्जा क्यों हटाया गया?
दिल्ली पुलिस ने नए आदेशों के तहत जंतर-मंतर का दशकों पुराना अधिकृत प्रदर्शन-स्थल का दर्जा समाप्त कर दिया। अधिकारियों ने अभी तक इसका कोई विस्तृत आधिकारिक कारण नहीं दिया है; विपक्ष का आरोप है कि यह असहमति को दबाने की सुनियोजित रणनीति है।
शिवसेना (यूबीटी) ने केंद्र पर क्या आरोप लगाए हैं?
'सामना' संपादकीय में शिवसेना (यूबीटी) ने केंद्र पर सत्तावाद को संस्थागत करने और जन-असहमति को व्यवस्थित तरीके से दबाने का आरोप लगाया। पार्टी का कहना है कि प्रदर्शनों को सत्ता के केंद्र से दूर धकेलना 'गहरे प्रशासनिक भय' का संकेत है।
वैकल्पिक प्रदर्शन स्थलों में क्या समस्याएँ हैं?
सामना के अनुसार, रामलीला मैदान की बुकिंग लागत ₹1.5 लाख प्रतिदिन से अधिक है, महीनों पहले बुकिंग ज़रूरी होती है और ये स्थल अक्सर पहले से आरक्षित रहते हैं। बुराड़ी ग्राउंड जंतर-मंतर से 20-21 किमी दूर है, जिससे संसद तक आवाज़ पहुँचना व्यावहारिक रूप से कठिन हो जाता है।
इस मामले में कानूनी स्थिति क्या है?
जंतर-मंतर की गैर-अधिसूचना को चुनौती देने वाली याचिकाएँ दिल्ली उच्च न्यायालय में दायर की गई हैं। अदालत के फैसले से इस विवाद का कानूनी समाधान तय होगा।
विपक्ष ने इस पर क्या रुख अपनाया है?
ठाकरे गुट के अनुसार, कांग्रेस नेता राहुल गांधी सहित कई विपक्षी दलों ने इस कार्रवाई की कड़ी निंदा की है। शिवसेना (यूबीटी) ने इसे संवैधानिक अधिकारों पर हमला बताते हुए केंद्र सरकार को चेतावनी दी है।
राष्ट्र प्रेस
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