'सेक्रेड आर्ट ऑफ लद्दाख' का अनावरण: उपराज्यपाल सक्सेना ने लुप्त होती बौद्ध विरासत को दस्तावेज़ में सहेजने की सराहना की
सारांश
मुख्य बातें
लद्दाख के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने 2 अक्टूबर 2026 को लेह में लेखक श्रीकांत सोमानी की पुस्तक 'सेक्रेड आर्ट ऑफ लद्दाख: फेडिंग ट्रेजर्स' का औपचारिक अनावरण किया। यह पुस्तक लद्दाख की बौद्ध कला, वास्तुकला, आध्यात्मिक परंपराओं और पवित्र विरासत स्थलों का विस्तृत दस्तावेज़ीकरण है — एक ऐसी विरासत जो आलोचकों के अनुसार तेज़ी से लुप्त होने के कगार पर है।
अनावरण समारोह और उपराज्यपाल की प्रतिक्रिया
अनावरण अवसर पर सक्सेना ने कहा कि ऐसी रचना का अनावरण करना उनके लिए सौभाग्य की बात है। उन्होंने कहा, 'सेक्रेड आर्ट ऑफ लद्दाख: फेडिंग ट्रेजर्स' केवल तस्वीरों का संग्रह नहीं है, बल्कि लद्दाख की समृद्ध संस्कृति, कला, परंपरा और विरासत को संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ी प्रयास है। उन्होंने आगे जोड़ा कि यही विरासत इस क्षेत्र की आत्मा है।
उपराज्यपाल ने बताया कि अनावरण से पूर्व उन्होंने पुस्तक के पन्ने देखे और इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि लेखक ने लद्दाख की पवित्र और सांस्कृतिक विरासत को बेहद बारीकी से दर्ज किया है।
लेखक श्रीकांत सोमानी: पर्यटक से संरक्षक तक का सफर
पुस्तक के लेखक श्रीकांत सोमानी प्रसिद्ध उद्योगपति और सोमानी सेरामिक्स लिमिटेड के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक हैं। लद्दाख की यात्राओं के दौरान वे यहाँ की कला और सांस्कृतिक विरासत से गहराई से प्रभावित हुए।
सक्सेना ने सोमानी के बारे में कहा कि एक पर्यटक से खोजकर्ता और फिर लद्दाख की विरासत के समर्पित संरक्षक बनने तक उनका सफर प्रेरणादायक है। इस रुचि ने ही उन्हें इस क्षेत्र की धीरे-धीरे लुप्त होती कला और सांस्कृतिक विरासत को दस्तावेज़ के रूप में सहेजने के लिए प्रेरित किया।
पुस्तक की विषयवस्तु और महत्व
उपराज्यपाल ने बताया कि पुस्तक का शीर्षक ही इसकी विषयवस्तु को स्पष्ट करता है। इसमें लद्दाख के पवित्र विरासत स्थलों में मौजूद ऐतिहासिक, धार्मिक और कलात्मक महत्व को प्रतीकों तथा दृश्यों के माध्यम से सामने लाने का प्रयास किया गया है। पुस्तक इन स्थलों की कला और स्थापत्य में छिपी सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विरासत को समझने का अवसर भी प्रदान करती है।
गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब लद्दाख में पर्यटन की बढ़ती आमद और जलवायु परिवर्तन के कारण सदियों पुरानी बौद्ध भित्तिचित्र-कला, मठ-स्थापत्य और परंपरागत शिल्प-परंपराएँ खतरे में बताई जा रही हैं। ऐसे में यह पुस्तक एक महत्वपूर्ण दृश्य-अभिलेख के रूप में काम करती है।
संरक्षण की आवश्यकता
पुस्तक के माध्यम से लेखक ने लुप्त होती कला और विरासत के संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित किया है। विभिन्न पवित्र विरासत स्थलों की ऐतिहासिक, धार्मिक और कलात्मक विशेषताओं के साथ-साथ उनकी प्रतीकात्मकता और दृश्यात्मक पक्ष को भी बारीकी से प्रस्तुत किया गया है।
यह पुस्तक न केवल शोधार्थियों और कला-प्रेमियों के लिए, बल्कि नीति-निर्माताओं के लिए भी एक संदर्भ-ग्रंथ बन सकती है — विशेषकर उस समय जब लद्दाख की विरासत के संरक्षण हेतु ठोस नीतिगत ढाँचे की माँग तेज़ हो रही है।