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गुजरात यूसीसी पर सलमान खुर्शीद का तंज: 'इसे यूनिफॉर्म नहीं, स्टेट सिविल कोड कहो'

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गुजरात यूसीसी पर सलमान खुर्शीद का तंज: 'इसे यूनिफॉर्म नहीं, स्टेट सिविल कोड कहो'

सारांश

गुजरात यूसीसी को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलते ही कांग्रेस के सलमान खुर्शीद ने सवाल उठाया — जब असम, उत्तराखंड और गुजरात तीनों के कोड अलग-अलग हैं, तो 'यूनिफॉर्म' कहाँ है? उनकी माँग है: इसे 'स्टेट सिविल कोड' कहो। आरएसएस नेता इंद्रेश कुमार ने इसे धार्मिक सौहार्द का कानून बताया।

मुख्य बातें

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने गुजरात यूसीसी विधेयक को मंजूरी दी; विधानसभा ने इसे मार्च 2026 में पारित किया था।
कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने कहा — हर राज्य का अलग कोड है, इसलिए इसे 'स्टेट सिविल कोड' कहा जाए, न कि यूनिफॉर्म सिविल कोड।
उत्तराखंड के यूसीसी के खिलाफ नैनीताल हाईकोर्ट में कई रिट याचिकाएँ और PIL दाखिल हैं।
आरएसएस नेता इंद्रेश कुमार ने यूसीसी को सभी धर्मों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करने वाला कानून बताया।
गुजरात यूसीसी में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, विरासत और लिव-इन रिलेशनशिप के लिए समान कानूनी ढाँचे का प्रावधान है।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा गुजरात समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक को मंजूरी दिए जाने के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद ने 2 अक्टूबर 2026 को गुवाहाटी में भारतीय जनता पार्टी (BJP) और उसके सहयोगी दलों पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि जब हर राज्य में अलग-अलग कोड लागू हो रहे हैं, तो इसे 'यूनिफॉर्म सिविल कोड' कहना भ्रामक है — सही नाम 'स्टेट सिविल कोड' होना चाहिए।

खुर्शीद का केंद्रीय तर्क

खुर्शीद ने स्पष्ट शब्दों में कहा, 'यूनिफॉर्म सिविल कोड कहाँ है? हर राज्य का अलग यूसीसी है, तो इसे यूसीसी क्यों कहा जाए? इसे 'स्टेट सिविल कोड' कहा जाना चाहिए।' उनका इशारा इस तथ्य की ओर था कि उत्तराखंड, असम और अब गुजरात — तीनों BJP-शासित राज्यों ने अपने-अपने यूसीसी ढाँचे अलग-अलग बनाए हैं।

उन्होंने आगे कहा, 'असम में जो लागू किया जा रहा है, वह दूसरे राज्य में लागू नहीं है। वहाँ जो लागू है, वह गुजरात में लागू नहीं है। अलग-अलग कोड को एक ही नाम कैसे दिया जा सकता है?' यह बयान उस व्यापक बहस को फिर से केंद्र में ले आया है कि राज्यवार यूसीसी संविधान की 'एकरूपता' की अवधारणा के अनुरूप है या नहीं।

गुजरात यूसीसी विधेयक: मुख्य प्रावधान

गुजरात विधानसभा ने मार्च 2026 में यूसीसी विधेयक पारित किया था। इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य धर्म की परवाह किए बिना विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, विरासत और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे व्यक्तिगत नागरिक मामलों के लिए एक समान कानूनी ढाँचा स्थापित करना है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह विधेयक अब कानून बनने की दिशा में है।

गौरतलब है कि उत्तराखंड देश का पहला राज्य था जिसने यूसीसी लागू किया। उसके बाद असम और अब गुजरात ने इस राह पर कदम रखा है — लेकिन तीनों के प्रावधानों में उल्लेखनीय अंतर बताए जा रहे हैं।

नैनीताल हाईकोर्ट में याचिकाएँ

कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने उत्तराखंड के यूसीसी के विरुद्ध नैनीताल हाईकोर्ट में दाखिल कई रिट याचिकाओं और जनहित याचिकाओं (PIL) का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस मामले में हाईकोर्ट का फैसला महत्वपूर्ण होगा और उस पर सभी की नजरें टिकी हैं। यह ऐसे समय में आया है जब यूसीसी की संवैधानिक वैधता को लेकर कानूनी विशेषज्ञों में मतभेद बना हुआ है।

आरएसएस नेता इंद्रेश कुमार का पक्ष

वहीं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के नेता इंद्रेश कुमार ने यूसीसी को धार्मिक सौहार्द स्थापित करने वाला कानून बताया। उन्होंने कहा, 'समान नागरिक संहिता ऐसा कानून है जो हर धर्म की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करता है।'

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, 'मान लीजिए दो धर्मों या उनके संप्रदायों के बीच किसी तरह का तनाव है, जैसे मुस्लिमों में शिया और सुन्नी के बीच — कानून यह सुनिश्चित करता है कि दोनों संप्रदाय एक-दूसरे पर अत्याचार न करें, बल्कि मिल-जुलकर रहें।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि यही संरक्षण सनातन धर्म सहित सभी धर्मों पर लागू होता है।

आगे की राह

यूसीसी का राज्यवार क्रियान्वयन और उस पर चल रही कानूनी लड़ाई आने वाले महीनों में और गहरी होने की संभावना है। नैनीताल हाईकोर्ट का फैसला एक मिसाल बन सकता है जो अन्य राज्यों के यूसीसी की वैधता को भी प्रभावित करे। विपक्षी दलों की माँग है कि यदि सरकार वाकई 'एकरूपता' चाहती है, तो केंद्रीय स्तर पर एक समान कानून लाया जाए।

संपादकीय दृष्टिकोण

'एकरूपता' की मूल अवधारणा को ही कमज़ोर करते हैं या नहीं। असम, उत्तराखंड और गुजरात के कोड में मूलभूत अंतर सार्वजनिक रूप से दर्ज हैं, और मुख्यधारा की कवरेज इस विरोधाभास को पर्याप्त गहराई से नहीं उठाती। नैनीताल हाईकोर्ट में लंबित याचिकाएँ इस पूरे प्रयोग की संवैधानिक परीक्षा हो सकती हैं। असली बहस अब 'यूसीसी हाँ या ना' से आगे बढ़कर 'कौन-सा यूसीसी और किसके लिए' तक पहुँच गई है।
RashtraPress
2 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सलमान खुर्शीद ने यूसीसी को 'स्टेट सिविल कोड' क्यों कहा?
कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद का तर्क है कि असम, उत्तराखंड और गुजरात — तीनों BJP-शासित राज्यों के यूसीसी के प्रावधान एक-दूसरे से अलग हैं। उनका कहना है कि जब हर राज्य का कोड अलग हो, तो उसे 'यूनिफॉर्म' कहना भ्रामक है और सही नाम 'स्टेट सिविल कोड' होना चाहिए।
गुजरात यूसीसी विधेयक में क्या प्रावधान हैं?
गुजरात यूसीसी विधेयक मार्च 2026 में विधानसभा से पारित हुआ था और हाल ही में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इसे मंजूरी दी। इसका उद्देश्य सभी धर्मों के नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, विरासत और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे व्यक्तिगत नागरिक मामलों में एक समान कानूनी ढाँचा लागू करना है।
उत्तराखंड यूसीसी के खिलाफ नैनीताल हाईकोर्ट में क्या चल रहा है?
उत्तराखंड में यूसीसी लागू किए जाने के विरुद्ध नैनीताल हाईकोर्ट में कई रिट याचिकाएँ और जनहित याचिकाएँ (PIL) दाखिल हैं। सलमान खुर्शीद ने कहा कि इस मामले में हाईकोर्ट का फैसला महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि यह अन्य राज्यों के यूसीसी की वैधता के लिए भी एक मिसाल बन सकता है।
आरएसएस नेता इंद्रेश कुमार ने यूसीसी के बारे में क्या कहा?
आरएसएस नेता इंद्रेश कुमार ने यूसीसी को धार्मिक सौहार्द कायम करने के लिए आवश्यक बताया। उन्होंने कहा कि यह कानून सभी धर्मों और उनके संप्रदायों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करता है, ताकि कोई किसी दूसरे के साथ अत्याचार या अन्याय न कर सके।
किन राज्यों में अभी तक यूसीसी लागू किया गया है?
अब तक उत्तराखंड, असम और गुजरात — तीन BJP/NDA शासित राज्यों ने अपने-अपने यूसीसी कानून बनाए हैं। हालाँकि, आलोचकों के अनुसार तीनों के प्रावधानों में अंतर है, जो 'एकरूपता' की मूल भावना पर सवाल खड़ा करता है।
राष्ट्र प्रेस
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