गुजरात यूसीसी 2026 को राष्ट्रपति की मंजूरी, विवाह-उत्तराधिकार में अब एकसमान कानून
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने गुजरात यूनिफॉर्म सिविल कोड, 2026 को अपनी संवैधानिक स्वीकृति दे दी है, जिसके बाद राज्य सरकार ने 2 अक्टूबर 2026 को राजपत्र अधिसूचना जारी कर दी और क्रियान्वयन की प्रक्रिया आधिकारिक रूप से शुरू हो गई। इस कदम के साथ गुजरात, उत्तराखंड के बाद समान नागरिक संहिता (यूसीसी) अपनाने वाला देश का दूसरा राज्य बन गया है। यह कानून विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे व्यक्तिगत नागरिक मामलों में धर्म-निरपेक्ष एकसमान ढाँचा लागू करता है।
मुख्य घटनाक्रम
गुजरात विधानसभा ने 24 मार्च 2026 को यूसीसी विधेयक पारित किया था। इससे पहले फरवरी 2024 में राज्य सरकार ने सेवानिवृत्त सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति गठित की थी, जिसने मौजूदा व्यक्तिगत कानूनों का अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट मार्च 2026 में राज्य सरकार को सौंपी। इसके बाद विधेयक पेश हुआ और पारित होने पर राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा गया। गौरतलब है कि यूसीसी की दिशा में गुजरात में पहल 2022 में ही शुरू हो गई थी, जब विधानसभा चुनावों से पूर्व राज्य सरकार ने इस संभावना पर विचार की घोषणा की थी।
कानून की प्रमुख व्यवस्थाएँ
यूसीसी के तहत विवाह का पंजीकरण अनिवार्य किया गया है और एकविवाह का नियम लागू होगा — अर्थात जीवनसाथी के जीवित रहते दूसरा विवाह पूर्णतः प्रतिबंधित रहेगा। विवाह और तलाक दोनों के लिए एकसमान कानूनी प्रक्रिया निर्धारित की गई है। लिव-इन रिलेशनशिप को भी निर्धारित समय-सीमा और प्रक्रिया के तहत पंजीकृत कराना अनिवार्य होगा, और ऐसे संबंधों से जन्मे बच्चों के अधिकार भी कानूनी रूप से संरक्षित किए गए हैं।
उत्तराधिकार और संपत्ति अधिकारों के मामले में कानून ने बेटी और बेटे को समान दर्जा दिया है — पैतृक और अन्य उत्तराधिकार संबंधी मामलों में दोनों के अधिकार बराबर होंगे। बिना वसीयत के किसी व्यक्ति की मृत्यु की स्थिति में उसके जीवनसाथी, बच्चों और माता-पिता के अधिकारों की स्पष्ट व्यवस्था की गई है। सरोगेसी और गोद लेने से जन्मे बच्चों को भी समान कानूनी सुरक्षा का प्रावधान है।
अनुसूचित जनजातियों को छूट
कानून में एक उल्लेखनीय अपवाद यह है कि अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों को इसके प्रावधानों से छूट दी गई है। सरकार ने इसके पीछे आदिवासी समुदायों की पारंपरिक सामाजिक और वैवाहिक व्यवस्थाओं को ध्यान में रखना बताया है। यह छूट उत्तराखंड के यूसीसी मॉडल से मिलती-जुलती है और संभावित संवैधानिक चुनौतियों से बचने की कोशिश को भी दर्शाती है।
राष्ट्रीय परिदृश्य में गुजरात का स्थान
यह ऐसे समय में आया है जब केंद्र में भारतीय जनता पार्टी (BJP) नेतृत्व की सरकार राष्ट्रीय स्तर पर यूसीसी की दिशा में वैचारिक प्रतिबद्धता जता चुकी है। उत्तराखंड ने पहले ही यूसीसी लागू कर एक मिसाल कायम की थी, और अब गुजरात के कदम से यह धारणा मजबूत होगी कि BJP-शासित राज्य इस एजेंडे को आगे बढ़ाते रहेंगे। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने भी विधेयक के पारित होने पर गुजरात सरकार को बधाई दी थी।
आगे क्या होगा
राजपत्र अधिसूचना जारी होने के बाद अब राज्य सरकार कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए आवश्यक नियमों और प्रशासनिक ढाँचे की अधिसूचनाएँ जारी करेगी। विशेषज्ञों के अनुसार पंजीकरण व्यवस्था के लिए डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर और प्रशिक्षित अधिकारियों की जरूरत होगी। आलोचकों का कहना है कि विविध धार्मिक और सामुदायिक समूहों को इस नए ढाँचे के साथ तालमेल बिठाने में समय और स्पष्टीकरण दोनों की आवश्यकता होगी।