संभल जामा मस्जिद सर्वे: सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा, पूजा स्थल अधिनियम की व्याख्या पर टिकी नज़र
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 25 सितंबर 2026 को संभल की शाही जामा मस्जिद के सर्वे से जुड़े विवाद में सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। मस्जिद इंतजामिया समिति ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा परिसर के सर्वे के लिए एडवोकेट कमिश्नर की नियुक्ति को वैध ठहराया गया था। अदालत का निर्णय बाद की तारीख में सुनाया जाएगा।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद 2024 में दायर एक सिविल मुकदमे से जन्मा है, जिसमें हिंदू पक्ष ने दावा किया है कि संभल की जामा मस्जिद मूल रूप से एक हिंदू मंदिर थी, जिसे 16वीं शताब्दी में ध्वस्त कर मस्जिद के रूप में परिवर्तित किया गया। इसी आधार पर हिंदू पक्ष ने परिसर में धार्मिक अनुष्ठान के अधिकार और सर्वे की माँग रखी। ट्रायल कोर्ट ने 19 नवंबर 2024 को एकतरफा (एक्स-पार्टी) आदेश पारित करते हुए स्थानीय जाँच के लिए एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त किया था।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय का रुख
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 19 मई 2025 को ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा था कि इस स्तर पर यह नहीं कहा जा सकता कि मुकदमा पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 के तहत स्वतः प्रतिबंधित है। उच्च न्यायालय के इसी फैसले के विरुद्ध मस्जिद समिति ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, और यह मामला तब से सर्वोच्च न्यायालय में लंबित था।
सुनवाई में किसने क्या कहा
मस्जिद समिति की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी और अधिवक्ता निजाम पाशा ने दलीलें प्रस्तुत कीं। हिंदू पक्ष की नुमाइंदगी अधिवक्ता हरि शंकर जैन ने की, जबकि उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज पेश हुए। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ ने तीनों पक्षों की बातें सुनीं।
उत्तर प्रदेश सरकार की दलील
एएसजी के.एम. नटराज ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार मूल वाद के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहती, क्योंकि वह मामला अभी ट्रायल कोर्ट में लंबित है। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य का दायित्व दोनों पक्षों के धार्मिक अधिकारों एवं हितों की रक्षा करना है। साथ ही उन्होंने पूजा स्थल अधिनियम, 1991 की व्याख्या पर ज़ोर दिया — उनके अनुसार धारा 2 में 'रूपांतरण' की परिभाषा में किसी पूजा स्थल में बदलाव या परिवर्तन भी सम्मिलित है, और धारा 3 किसी भी पूजा स्थल के रूपांतरण पर पूरी तरह रोक लगाती है।
आगे की राह
गौरतलब है कि पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 की व्याख्या पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय केवल इस मामले तक सीमित नहीं रहेगा — यह देश के कई अन्य धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों पर भी प्रभाव डाल सकता है। यह ऐसे समय में आया है जब अयोध्या निर्णय के बाद पूजा स्थल अधिनियम की प्रासंगिकता को लेकर न्यायिक और सामाजिक बहस तेज़ हुई है। सर्वोच्च न्यायालय अब बाद की तारीख में अपना निर्णय सुनाएगा, जिसका इंतज़ार दोनों पक्षों सहित पूरे देश को रहेगा।