उपग्रह तकनीक से मछलियों की निगरानी: कोच्चि में 30+ देशों के वैज्ञानिकों की अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू
सारांश
मुख्य बातें
कोच्चि स्थित आईसीएआर-सेंट्रल मरीन फिशरीज रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीएमएफआरआई) में 2 नवंबर 2026 से तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 'ट्रेवर-सफारी' की शुरुआत हुई, जिसमें 30 से अधिक देशों के वैज्ञानिक इस बात पर विचार-विमर्श करेंगे कि उपग्रह (सैटेलाइट) तकनीक और जलवायु अनुसंधान के ज़रिये महासागरों में हो रहे बदलावों और मत्स्य पालन पर उनके प्रभाव को बेहतर ढंग से कैसे समझा जाए। यह संगोष्ठी ऐसे समय में हो रही है जब जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव बढ़ रहा है और तटीय मछुआरा समुदायों की आजीविका खतरे में है।
संगोष्ठी की मुख्य विषयवस्तु
सैटेलाइट डेटा समुद्र के तापमान, महासागरीय उत्पादकता और मछलियों के वितरण में आ रहे बदलावों को ट्रैक करने में सहायक हो सकता है। इस तकनीकी जानकारी से संभावित मछली पकड़ने वाले क्षेत्रों (फिशिंग ज़ोन) की अग्रिम पहचान संभव होगी, जिससे मछुआरे अपनी समुद्री यात्राओं की अधिक कुशल योजना बना सकेंगे।
संगोष्ठी में जलवायु परिवर्तन, मानसून के बदलते स्वरूप और चरम मौसमी घटनाओं के मछलियों की आबादी तथा समुद्री जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों की भी गहन समीक्षा की जाएगी। महासागरीय परिस्थितियों और जल-गुणवत्ता में आ रहे बदलावों को तटीय समुदायों की आजीविका के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में रेखांकित किया जा रहा है।
तकनीकी सत्र और 'वन हेल्थ' दृष्टिकोण
बायोटेक्नोलॉजी विभाग के सहयोग से आयोजित एक विशेष सत्र में 'रिमोट सेंसिंग' के माध्यम से जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य की निगरानी पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। यह सत्र 'वन हेल्थ' (एक स्वास्थ्य) दृष्टिकोण के तहत आयोजित होगा, जो पर्यावरणीय स्वास्थ्य को मानव और पशु स्वास्थ्य से जोड़ता है — और जिसे वैश्विक स्तर पर वैज्ञानिक समुदाय तेज़ी से अपना रहा है।
वैज्ञानिक मत्स्य पालन को टिकाऊ (सस्टेनेबल) बनाने, समुद्री जैव विविधता की रक्षा और मछुआरा समुदायों के पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान के साथ एकीकृत करने के उपायों पर भी विचार करेंगे। मत्स्य पालन क्षेत्र में महिलाओं और हाशिए पर रहने वाले समुदायों की भूमिका को बल देने का विषय भी चर्चा में रहेगा।
सीएमएफआरआई निदेशक का वक्तव्य
सीएमएफआरआई के निदेशक डॉ. ग्रिनसन जॉर्ज ने कहा, 'इन चर्चाओं का मुख्य उद्देश्य महासागर की स्थितियों को बेहतर ढंग से समझना और पर्यावरणीय निगरानी में सुधार करना है, ताकि सुरक्षित मत्स्य पालन, टिकाऊ संसाधन, सीफूड सुरक्षा और तटीय समुदायों की आजीविका की दीर्घकालिक भलाई सुनिश्चित की जा सके।' उनका यह बयान इस तथ्य को रेखांकित करता है कि भारत के लाखों तटीय मछुआरों का भविष्य अब सीधे तौर पर महासागरीय निगरानी प्रणालियों की सटीकता से जुड़ा है।
आयोजन और नए नेटवर्क की शुरुआत
इस तीन दिवसीय संगोष्ठी में 80 से अधिक विदेशी प्रतिनिधियों के भाग लेने की उम्मीद है। इसका संयुक्त आयोजन कोचीन यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के केमिकल ओशनोग्राफी विभाग, ट्रेवर प्लैट साइंस फाउंडेशन, सीएमएफआरआई और मरीन बायोलॉजिकल एसोसिएशन ऑफ इंडिया द्वारा किया जा रहा है। इस अवसर पर 'बे ऑफ बंगाल नेटवर्क ऑफ ओशन रिसर्चर्स फॉर फिशरीज' की भी औपचारिक शुरुआत होगी, जिसका उद्देश्य बंगाल की खाड़ी क्षेत्र के देशों के वैज्ञानिकों के बीच अनुसंधान सहयोग को मज़बूत करना है।
गौरतलब है कि भारत के मत्स्य पालन क्षेत्र से करोड़ों लोगों की आजीविका जुड़ी है और जलवायु-प्रेरित महासागरीय बदलावों के मद्देनज़र इस तरह के वैज्ञानिक सहयोग की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है। संगोष्ठी के निष्कर्ष भावी नीतिगत दिशा-निर्देशों का आधार बन सकते हैं।