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तमिलनाडु विश्वास मत: सीबीआई जांच और राष्ट्रपति शासन की मांग वाली PIL सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की

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तमिलनाडु विश्वास मत: सीबीआई जांच और राष्ट्रपति शासन की मांग वाली PIL सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने तमिलनाडु के 13 मई के विश्वास मत में कथित विधायक खरीद-फरोख्त की सीबीआई जांच और राष्ट्रपति शासन की मांग वाली PIL को 'अस्पष्ट और निराधार' बताकर खारिज कर दिया। CJI सूर्यकांत की पीठ ने साफ कहा — विश्वसनीय साक्ष्य के बिना न्यायिक हस्तक्षेप संभव नहीं।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 19 जून को तमिलनाडु विश्वास मत में सीबीआई जांच और राष्ट्रपति शासन की मांग वाली PIL खारिज की।
CJI सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी.
मोहन की पीठ ने कहा — आरोप 'सामान्य और अस्थिर', कोई विश्वसनीय सामग्री नहीं।
रमेश ने दायर की थी; 13 मई के विश्वास मत में मुख्यमंत्री विजय की TVK सरकार ने बहुमत हासिल किया था।
याचिका में AIADMK विधायकों की कथित खरीद-फरोख्त और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के उल्लंघन का आरोप था।
याचिका में 2024 के 'सीता सोरेन' संविधान पीठ फैसले का हवाला दिया गया था, जिसे अदालत ने अपर्याप्त साक्ष्य के कारण अप्रासंगिक माना।

सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार, 19 जून को तमिलनाडु विधानसभा में 13 मई को हुए विश्वास मत में कथित अनियमितताओं की केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) से जांच कराने और जांच पूरी होने तक राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि याचिका में लगाए गए आरोप अस्पष्ट और निराधार हैं तथा उनके समर्थन में कोई विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया।

मामले की पृष्ठभूमि

अधिवक्ता जया सुकीन द्वारा प्रस्तुत और के.के. रमेश द्वारा दायर इस याचिका में केंद्र सरकार, सीबीआई और तमिलनाडु सरकार को निर्देश देने की मांग की गई थी कि 13 मई के विश्वास मत के दौरान हुई कथित विधायकों की खरीद-फरोख्त और भ्रष्टाचार की जांच की जाए। इसी विश्वास मत में मुख्यमंत्री विजय के नेतृत्व वाली तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) सरकार ने बहुमत हासिल किया था।

याचिकाकर्ता का आरोप था कि अन्य राजनीतिक दलों के कई विधायकों को धन और अन्य लाभ देकर TVK सरकार के पक्ष में मतदान के लिए प्रभावित किया गया। साथ ही दावा किया गया था कि विश्वास मत लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं कराया गया।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने याचिका पर विस्तार से सुनवाई के बाद अपने आदेश में कहा, 'हमने इस मामले पर विस्तार से सुनवाई की। यह याचिका सामान्य और अस्थिर आरोपों पर आधारित है, जिनके समर्थन में कोई विश्वसनीय सामग्री प्रस्तुत नहीं की गई है। ऐसे में न्यायिक हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।'

पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता पहले भी कई जनहित याचिकाएं दायर कर चुके हैं, इसलिए एक PIL खारिज होने पर उन्हें निराश नहीं होना चाहिए।

याचिका में उठाए गए कानूनी तर्क

याचिका में सर्वोच्च न्यायालय के वर्ष 2024 के 'सीता सोरेन' मामले में संविधान पीठ के फैसले का हवाला दिया गया था, जिसमें कहा गया था कि रिश्वत लेने के आरोपी विधायक संविधान के अनुच्छेद 105(2) और 194(2) के तहत संसदीय विशेषाधिकार का दावा नहीं कर सकते। इसके अतिरिक्त, अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (AIADMK) के भीतर TVK सरकार को समर्थन देने को लेकर हुए मतभेद और विश्वास मत के बाद लंबित दलबदल विरोधी मामलों का भी उल्लेख किया गया था।

विधानसभा भंग करने की मांग भी नकारी

याचिका में विधानसभा भंग करने और सीबीआई जांच पूरी होने तक तमिलनाडु में राष्ट्रपति शासन लागू करने की भी मांग की गई थी। अदालत ने इन सभी मांगों को विश्वसनीय साक्ष्यों के अभाव में अस्वीकार कर दिया।

आगे की स्थिति

सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद TVK सरकार के खिलाफ इस मार्ग से न्यायिक हस्तक्षेप की संभावना फिलहाल बंद हो गई है। हालांकि, राज्य में दलबदल विरोधी कार्यवाहियाँ अभी भी लंबित बताई जाती हैं, जो आने वाले समय में राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकती हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन न्यायिक मार्ग अब इस रूप में बंद हो चुका है।
RashtraPress
5 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु विश्वास मत वाली PIL क्यों खारिज की?
सर्वोच्च न्यायालय ने PIL को इसलिए खारिज किया क्योंकि उसमें लगाए गए आरोप अस्पष्ट और निराधार थे तथा उनके समर्थन में कोई विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया था। CJI सूर्यकांत की पीठ ने कहा कि विश्वसनीय प्रमाणों के अभाव में न्यायिक हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।
तमिलनाडु विश्वास मत कब और किसके नेतृत्व में हुआ?
यह विश्वास मत 13 मई को तमिलनाडु विधानसभा में हुआ, जिसमें मुख्यमंत्री विजय के नेतृत्व वाली तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) सरकार ने बहुमत हासिल किया। इसी विश्वास मत में कथित अनियमितताओं को लेकर PIL दायर की गई थी।
PIL में क्या-क्या मांगें की गई थीं?
याचिका में सीबीआई से जांच कराने, तमिलनाडु विधानसभा भंग करने और जांच पूरी होने तक राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की मांग की गई थी। साथ ही विधायकों की कथित खरीद-फरोख्त की जांच का निर्देश देने की भी अपील थी।
याचिका में 'सीता सोरेन' मामले का हवाला क्यों दिया गया था?
2024 के 'सीता सोरेन' मामले में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने फैसला दिया था कि रिश्वत लेने के आरोपी विधायक अनुच्छेद 105(2) और 194(2) के तहत संसदीय विशेषाधिकार का दावा नहीं कर सकते। याचिकाकर्ता ने इसे आधार बनाकर तमिलनाडु के कथित मामले में जांच की मांग की थी, लेकिन अदालत ने ठोस साक्ष्य के अभाव में इसे अपर्याप्त माना।
इस फैसले के बाद TVK सरकार की स्थिति क्या है?
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा PIL खारिज होने के बाद इस न्यायिक मार्ग से TVK सरकार पर तत्काल कोई दबाव नहीं है। हालांकि, राज्य में दलबदल विरोधी कार्यवाहियाँ अभी भी लंबित बताई जाती हैं, जो आगे चलकर राजनीतिक स्थिति को प्रभावित कर सकती हैं।
राष्ट्र प्रेस
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