सुप्रीम कोर्ट सख्त: शिक्षक भर्ती में ट्रांसजेंडर बहिष्कार पर दिल्ली सरकार से 15 दिन में जवाब तलब
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 20 अक्टूबर 2026 को दिल्ली सरकार और दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड (DSSSB) से यह स्पष्ट करने को कहा है कि शिक्षक पदों की भर्ती विज्ञापनों में ट्रांसजेंडर श्रेणी को क्यों शामिल नहीं किया गया। अदालत ने साथ ही यह भी पूछा कि रिक्तियों को केवल पुरुष और महिला उम्मीदवारों के बीच विभाजित करने का कानूनी आधार क्या है और सार्वजनिक रोज़गार में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को किस प्रकार समायोजित किया जाएगा। संबंधित पक्षों को 15 दिनों के भीतर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह कार्यवाही जेन कौशिक द्वारा दायर याचिका से उत्पन्न हुई है, जिसमें उन्होंने दिल्ली उच्च न्यायालय के 18 दिसंबर 2025 के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें शिक्षण पदों पर ट्रांसजेंडर के लिए अलग रिक्तियाँ, न्यूनतम योग्यता और आयु सीमा में छूट, तथा सरकारी नियुक्तियों में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए एक समर्पित भर्ती नीति की उनकी माँग अस्वीकार कर दी गई थी। उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता को एक सलाहकार समिति के पास जाने का निर्देश दिया था, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही टिप्पणी की थी कि उस समिति के पास निर्णय लेने की न्यायिक शक्तियाँ नहीं थीं — इसलिए उच्च न्यायालय का वह निर्णय प्रथम दृष्टया त्रुटिपूर्ण था।
इसी क्रम में प्रवीण सिंह द्वारा दायर एक अलग याचिका भी अदालत के समक्ष है, जिसमें सरकारी नौकरियों तक ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की पहुँच और आयु में छूट से जुड़े मुद्दे उठाए गए हैं।
बेंच के प्रमुख सवाल
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कई अहम प्रश्न खड़े किए। अदालत ने पूछा कि क्या नियमों के तहत शिक्षण पदों का विज्ञापन पुरुष और महिला उम्मीदवारों के लिए अलग-अलग निकालना अनिवार्य है, और यदि ऐसा नहीं है, तो इस वर्गीकरण का उद्देश्य क्या है। पीठ ने यह भी जानना चाहा कि DSSSB द्वारा जारी होने वाली भर्ती अधिसूचनाओं में 'थर्ड जेंडर' को शामिल करने पर सरकार का क्या विचार है।
गौरतलब है कि कौशिक ने तर्क दिया था कि DSSSB के ऑनलाइन आवेदन पंजीकरण प्रणाली (OARS) पोर्टल पर पंजीकृत होने के बावजूद, नियुक्ति के चरण में उन्हें बाहर किए जाने की आशंका है, क्योंकि भर्ती विज्ञापन केवल पुरुष या महिला उम्मीदवारों का उल्लेख करते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई अंतरिम राहत
अदालत ने कौशिक को यह अनुमति दी है कि वे भर्ती अधिसूचना में उल्लिखित लिंग की परवाह किए बिना, ट्रांसजेंडर श्रेणी के तहत रिक्तियों के लिए आवेदन कर सकती हैं। यह राहत पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने उनकी रिट याचिका लंबित रहने के दौरान दी थी, और सर्वोच्च न्यायालय ने उसे बरकरार रखा है। यह संकेत देता है कि शीर्ष अदालत इस मुद्दे को केवल प्रक्रियात्मक नहीं, बल्कि मौलिक अधिकारों से जुड़ा मानती है।
व्यापक कानूनी संदर्भ
सर्वोच्च न्यायालय ने पहले कहा था कि कौशिक द्वारा उठाए गए कई मुद्दों पर 'जेन कौशिक बनाम भारत संघ' के पूर्व फैसले में विचार हो चुका है, जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 और उसके तहत बने नियमों की प्रयोज्यता पर ध्यान दिया गया था। इसके अतिरिक्त, अदालत ने पूर्व न्यायाधीश आशा मेनन की अध्यक्षता में एक सलाहकार समिति भी गठित की है, जिसका दायरा समान अवसर नीति, उचित व्यवस्था, शिकायत निवारण, लिंग और नाम में बदलाव, समावेशी चिकित्सा देखभाल, और जेंडर-विविध व्यक्तियों की सुरक्षा जैसे विषयों तक फैला है।
यह मामला ऐसे समय में आया है जब सार्वजनिक क्षेत्र की भर्ती प्रक्रियाओं में ट्रांसजेंडर समुदाय के समावेशन को लेकर देशभर में बहस तेज़ हो रही है। अगली सुनवाई में दिल्ली सरकार और DSSSB के हलफनामे मामले की दिशा तय करेंगे।