शीतला सप्तमी का महत्व: विजय और अभिजित मुहूर्त का अद्भुत संयोग
सारांश
Key Takeaways
- शीतला सप्तमी का पर्व देवी शीतला को समर्पित है।
- इस दिन बासी भोजन का विशेष महत्व है।
- कई शुभ मुहूर्त होते हैं जैसे विजय और अभिजित मुहूर्त।
- पर्व से पहले की तैयारियों में विशेष ध्यान दिया जाता है।
- ये परंपराएँ स्वास्थ्य की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
नई दिल्ली, 9 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। सनातन धर्म में पंचांग का महत्व केवल दिन की शुरुआत के लिए नहीं, बल्कि नए या शुभ कार्यों के लिए भी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। 10 मार्च के पंचांग के अनुसार, मंगलवार को चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि है, जिसे शीतला सप्तमी के रूप में मनाया जाता है।
यह पर्व मुख्यतः देवी शीतला को समर्पित है, जो खसरा, चेचक जैसे संक्रामक रोगों से रक्षा करने वाली देवी मानी जाती हैं। गुजरात सहित देश के विभिन्न हिस्सों में इसे 'शीतला सातम' या 'शीतला सप्तमी' के नाम से श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। लोग देवी का आशीर्वाद लेकर अपने परिवार के स्वास्थ्य की रक्षा की कामना करते हैं। इस दिन की एक महत्वपूर्ण परंपरा है कि घर में ताजा भोजन नहीं पकाया जाता, बल्कि केवल ठंडा (शीतल) और एक दिन पहले का बना हुआ बासी भोजन ही ग्रहण किया जाता है।
शीतला सातम की यह अवधारणा उत्तर भारत में मनाए जाने वाले 'बासोड़ा' और 'शीतला अष्टमी' से काफी मिलती-जुलती है। इन पर्वों में भी बासी भोजन का महत्व होता है और देवी से रोगों से मुक्ति की प्रार्थना की जाती है।
10 मार्च को सूर्योदय सुबह 6:37 मिनट पर और सूर्यास्त शाम 6:26 मिनट पर होगा। कृष्ण पक्ष की सप्तमी है। नक्षत्र अनुराधा शाम 7:05 मिनट तक रहेगा, उसके बाद ज्येष्ठा है। योग हर्षण सुबह 8:21 मिनट तक है और करण विष्टि दोपहर 12:40 मिनट तक रहेगा।
शुभ मुहूर्त की बात करें तो मंगलवार को ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4:59 मिनट से 5:48 मिनट तक, अभिजित मुहूर्त दोपहर 12:08 मिनट से 12:55 मिनट तक, विजय मुहूर्त दोपहर 2:30 मिनट से 3:17 मिनट तक, और गोधूलि मुहूर्त शाम 6:24 मिनट से 6:48 मिनट तक है।
अशुभ समय में राहुकाल दोपहर 3:29 मिनट से 4:58 मिनट तक, यमगंड सुबह 9:34 मिनट से 11:03 मिनट तक, और गुलिक काल दोपहर 12:32 मिनट से 2:00 बजे तक रहेगा।