श्रावणी मेला 2026: सुल्तानगंज में आस्था के साथ अरबों का कारोबार, 50 लाख श्रद्धालुओं का अनुमान
सारांश
मुख्य बातें
बिहार के भागलपुर जिले में स्थित अजगैबीनाथ गंगाधाम, सुल्तानगंज में प्रतिवर्ष लगने वाला श्रावणी मेला केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं, बल्कि अरबों रुपये के कारोबार का केंद्र भी बन चुका है। इस वर्ष 50 लाख से अधिक श्रद्धालुओं के आने का अनुमान है, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था को पूरे साल की जीवनरेखा प्रदान करते हैं। एक महीने तक चलने वाला यह मेला हजारों परिवारों की वार्षिक आजीविका का प्रमुख आधार है।
मेले की आर्थिक संरचना
सावन के महीने में सुल्तानगंज में 25,000 से अधिक अस्थायी दुकानें लगती हैं। भूमि किराये से लेकर पूजा सामग्री, कांवर, गेरुआ वस्त्र और गंगा तट पर सहज उपलब्ध मिट्टी तक — हर वस्तु यहाँ मूल्यवान बन जाती है। इन दुकानों के माध्यम से लाखों-करोड़ों रुपये का कारोबार होता है, जो इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था की मुख्य रीढ़ है।
मेले का आर्थिक प्रभाव पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहता। होटल, नाव सेवाएँ, ऑटो-टैक्सी चालक, फूल विक्रेता और खान-पान के छोटे व्यवसायी — सभी की आय इस एक महीने में कई गुना बढ़ जाती है। पर्यटन और परिवहन क्षेत्र में भी उल्लेखनीय उछाल दर्ज किया जाता है।
पुरोहित की नज़र से: एक कांवरिये का खर्च
पिछले 35 वर्षों से सुल्तानगंज में तीर्थ पुरोहित का कार्य कर रहे चुन्नू-मुन्नू उर्फ लाल मोहरिया पंडा ने बताया कि श्रावणी मेले में देश-विदेश से कांवरिये अजगैबीनाथ पहुँचते हैं, साथ ही बड़ी संख्या में ब्राह्मण, पंडित और पुजारी भी आते हैं।
मेले की अर्थव्यवस्था पर उन्होंने कहा, "एक कांवरिये का गंगाधाम से बाबाधाम (देवघर) तक का खर्च करीब ₹6,000 से ₹7,000 होता है। महीने भर में करोड़ों लोग यहाँ आते हैं। आज दो घंटे में ही सवा से डेढ़ लाख लोग जल भरकर निकले हैं। उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और नेपाल समेत सात-आठ राज्यों से लोग यहाँ केवल कमाई के लिए आते हैं।"
स्थानीय उत्पादन की चुनौती
हालाँकि लाल मोहरिया पंडा ने चिंता भी जताई कि मेले में बिकने वाला अधिकांश सामान पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और दिल्ली से आता है। उनके अनुसार, यदि सरकार स्थानीय स्तर पर इन उत्पादों के निर्माण को प्रोत्साहित करे, तो स्थानीय निवासियों की आमदनी में और अधिक वृद्धि हो सकती है — एक ऐसा अवसर जो अभी तक अनुपयोगी है।
प्रशासन का आकलन
अर्थशास्त्र के छात्र रहे भागलपुर के एसडीएम विकास कुमार ने बताया कि सावन के एक महीने की कमाई से क्षेत्र के लोगों की साल भर की जीविका का आधार तैयार होता है। उन्होंने इस वर्ष 50 लाख से अधिक श्रद्धालुओं के आगमन का अनुमान व्यक्त किया है, जो मेले के बढ़ते आर्थिक और धार्मिक महत्व को रेखांकित करता है।
यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब बिहार में ग्रामीण रोज़गार और स्थानीय उद्यमिता को बढ़ावा देने की माँग लगातार उठ रही है। श्रावणी मेला इस दिशा में एक स्वाभाविक और सिद्ध आर्थिक मॉडल के रूप में उभर रहा है — बशर्ते स्थानीय उत्पादन को नीतिगत समर्थन मिले।