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सुल्तानगंज: उत्तरवाहिनी गंगा और बाबा बैद्यनाथ धाम को जोड़ती सावन की 105 किमी कांवर यात्रा

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सुल्तानगंज: उत्तरवाहिनी गंगा और बाबा बैद्यनाथ धाम को जोड़ती सावन की 105 किमी कांवर यात्रा

सारांश

सुल्तानगंज सिर्फ एक घाट नहीं — यह उत्तरवाहिनी गंगा, सदियों पुरानी कांवर परंपरा और हिंदू-बौद्ध विरासत का अनूठा संगम है। हर सावन लाखों श्रद्धालु यहाँ से 105 किमी पैदल चलकर बाबा बैद्यनाथ धाम पहुँचते हैं — यह यात्रा तपस्या है, पर्यटन नहीं।

मुख्य बातें

सुल्तानगंज ( भागलपुर, बिहार ) में गंगा उत्तर दिशा में प्रवाहित होती है, जिसे उत्तरवाहिनी गंगा कहते हैं — यही इसे शिवजलाभिषेक के लिए विशेष पवित्र बनाती है।
कांवरिये यहाँ से गंगाजल लेकर 105 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर बाबा बैद्यनाथ धाम, देवघर पहुँचते हैं।
धार्मिक लोकविश्वास के अनुसार भगवान राम ने भी सुल्तानगंज से जल लेकर बाबा बैद्यनाथ धाम में जलाभिषेक किया था।
बाबा अजगैवीनाथ मंदिर गंगा की धारा के बीच चट्टान पर स्थित है; आसपास गुप्त, उत्तर गुप्त और पाल काल की दुर्लभ शिल्पकृतियाँ हैं।
सुल्तानगंज से मिली एक टन वजनी कांस्य बुद्ध प्रतिमा वर्तमान में बर्मिंघम संग्रहालय, इंग्लैंड में संरक्षित है।
विशेषज्ञों के अनुसार यहाँ के बौद्ध विहार, स्तूप अवशेषों और प्राचीन मंदिरों के वैज्ञानिक संरक्षण की आवश्यकता है।

सावन माह के आरंभ होते ही बिहार के भागलपुर जिले का सुल्तानगंज लाखों शिवभक्तों की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र बन जाता है। उत्तरवाहिनी गंगा के पावन तट पर स्थित यह नगर हर वर्ष झारखंड के देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम तक की 105 किलोमीटर लंबी कांवर यात्रा का प्रारंभिक पड़ाव बनता है। धार्मिक परंपरा और सदियों पुरानी आस्था का यह संगम सुल्तानगंज को बिहार के सर्वाधिक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक केंद्रों में स्थापित करता है।

उत्तरवाहिनी गंगा का धार्मिक महत्व

सुल्तानगंज में गंगा की धारा असामान्य रूप से उत्तर दिशा की ओर प्रवाहित होती है, जिसे उत्तरवाहिनी गंगा कहा जाता है। सनातन परंपरा में उत्तर दिशा को विशेष आध्यात्मिक महत्व प्राप्त है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव का निवास कैलाश पर्वत भी उत्तर दिशा में स्थित है, इसलिए उत्तरवाहिनी गंगा का जल शिवलिंग पर अर्पित करना विशेष पुण्यदायी माना जाता है।

यही कारण है कि कांवरिये केवल सुल्तानगंज से ही गंगाजल लेकर देवघर की ओर प्रस्थान करते हैं। गंगा घाटों पर स्नान और पूजा-अर्चना के बाद श्रद्धालु कांवर में पवित्र जल भरते हैं और 'बोल बम' के जयघोष के साथ यात्रा आरंभ करते हैं। बड़ी संख्या में कांवरिये यह पूरी दूरी नंगे पैर तय करते हैं।

कांवर यात्रा: भक्ति और तपस्या का प्रतीक

कांवरियों के लिए यह यात्रा केवल एक स्थान से दूसरे स्थान पहुँचने का माध्यम नहीं, बल्कि कठिन तपस्या, दृढ़ संकल्प और अटूट भक्ति का प्रतीक मानी जाती है। धार्मिक परंपरा और लोकविश्वास से जुड़ी एक कथा के अनुसार भगवान राम ने भी सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर बाबा बैद्यनाथ धाम में जलाभिषेक किया था। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए श्रद्धालु आज भी यहाँ से जल लेकर देवघर पहुँचते हैं।

यह ऐसे समय में और अधिक प्रासंगिक हो जाता है जब आधुनिक जीवनशैली के बावजूद सावन में लाखों की संख्या में श्रद्धालु इस कठिन पैदल यात्रा को चुनते हैं — जो भारत की जीवित लोक-आस्था की जीवंत अभिव्यक्ति है।

बाबा अजगैवीनाथ मंदिर और ऐतिहासिक विरासत

सुल्तानगंज का धार्मिक महत्व केवल कांवर यात्रा तक सीमित नहीं है। गंगा की धारा के बीच एक विशाल चट्टान पर स्थित बाबा अजगैवीनाथ मंदिर यहाँ का प्रमुख धार्मिक केंद्र है। मंदिर के आसपास की पहाड़ियों पर गुप्त काल, उत्तर गुप्त काल और पाल काल से जुड़ी अनेक प्राचीन शिल्पकृतियाँ मौजूद हैं।

विष्णु, उमा-महेश्वर और अर्धनारीश्वर सहित विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ इस क्षेत्र की समृद्ध कला परंपरा की झलक देती हैं। गंगा तट पर स्थित मुरली पहाड़ पुरातात्विक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, जहाँ प्राचीन निर्माण अवशेष, शिलालेख और कई शिवलिंग प्राप्त हुए हैं।

बौद्ध विरासत और बर्मिंघम की कांस्य प्रतिमा

गौरतलब है कि सुल्तानगंज में हुए उत्खननों से बौद्ध विहार और स्तूप के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। यहाँ से मिली करीब एक टन वजनी एक दुर्लभ कांस्य बुद्ध प्रतिमा वर्तमान में इंग्लैंड के बर्मिंघम संग्रहालय में संरक्षित है।

यह तथ्य इस बात का प्रमाण है कि सुल्तानगंज केवल हिंदू आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि बौद्ध और हिंदू — दोनों सभ्यताओं की साझा विरासत का संगम-स्थल रहा है। प्राचीन काल से यहाँ लगने वाले विशाल मेलों और श्रावणी महोत्सव का उल्लेख ऐतिहासिक स्रोतों में भी मिलता है।

विरासत संरक्षण की आवश्यकता

आज सुल्तानगंज धार्मिक पर्यटन के साथ-साथ विरासत पर्यटन के लिहाज से भी नई संभावनाएँ रखता है। विशेषज्ञों का मानना है कि श्रावणी मेले की पहचान के साथ-साथ यहाँ मौजूद प्राचीन मंदिरों, मूर्तियों, बौद्ध अवशेषों और पुरातात्विक स्थलों का वैज्ञानिक संरक्षण किया जाना आवश्यक है।

एक ही भूभाग पर उत्तरवाहिनी गंगा की धार्मिक आस्था, कांवर यात्रा की परंपरा, बाबा अजगैवीनाथ की उपासना और प्राचीन हिंदू-बौद्ध विरासत का यह अद्वितीय संगम सुल्तानगंज को बिहार के सर्वाधिक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन केंद्रों में स्थापित करने की पूरी क्षमता रखता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यहाँ की बौद्ध विरासत — जिसमें बर्मिंघम संग्रहालय में रखी एक टन की कांस्य प्रतिमा भी शामिल है — लगभग अनदेखी रहती है। यह विरोधाभास उजागर करता है कि भारत में पुरातात्विक संरक्षण की प्राथमिकताएँ किस तरह धार्मिक पहचान के इर्द-गिर्द तय होती हैं। सुल्तानगंज में हिंदू और बौद्ध — दोनों परंपराओं की जड़ें एक ही मिट्टी में हैं, फिर भी नीतिगत संवाद में केवल श्रावणी मेले की चर्चा होती है। विरासत पर्यटन की असली संभावना तभी साकार होगी जब इस स्थल को उसकी समग्रता में देखा और संरक्षित किया जाए।
RashtraPress
8 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुल्तानगंज से ही कांवर यात्रा क्यों शुरू होती है?
सुल्तानगंज में गंगा उत्तर दिशा में बहती है, जिसे उत्तरवाहिनी गंगा कहते हैं। सनातन परंपरा में उत्तरवाहिनी गंगा का जल अत्यंत पवित्र माना जाता है और भगवान शिव के निवास कैलाश पर्वत की दिशा से इसका संबंध जोड़ा जाता है, इसलिए इसी जल से बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक करना विशेष पुण्यदायी माना जाता है।
सुल्तानगंज से देवघर की कांवर यात्रा कितनी लंबी है?
सुल्तानगंज से झारखंड के देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम की दूरी करीब 105 किलोमीटर है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु यह पूरी दूरी नंगे पैर तय करते हैं, जिसे वे कठिन तपस्या और भक्ति का प्रतीक मानते हैं।
बाबा अजगैवीनाथ मंदिर कहाँ स्थित है और इसका क्या महत्व है?
बाबा अजगैवीनाथ मंदिर सुल्तानगंज में गंगा की धारा के बीच एक विशाल चट्टान पर स्थित है। यह सुल्तानगंज का प्रमुख धार्मिक केंद्र है और इसके आसपास की पहाड़ियों पर गुप्त, उत्तर गुप्त और पाल काल की दुर्लभ शिल्पकृतियाँ और देवी-देवताओं की प्राचीन प्रतिमाएँ मौजूद हैं।
सुल्तानगंज की कांस्य बुद्ध प्रतिमा अब कहाँ है?
सुल्तानगंज में हुए उत्खनन से प्राप्त करीब एक टन वजनी एक दुर्लभ कांस्य बुद्ध प्रतिमा वर्तमान में इंग्लैंड के बर्मिंघम संग्रहालय में संरक्षित है। यह प्रतिमा इस बात का प्रमाण है कि सुल्तानगंज प्राचीन काल में बौद्ध सभ्यता का भी महत्वपूर्ण केंद्र था।
सुल्तानगंज में विरासत पर्यटन की क्या संभावनाएँ हैं?
सुल्तानगंज में उत्तरवाहिनी गंगा, कांवर यात्रा परंपरा, प्राचीन हिंदू मंदिर और बौद्ध विहार-स्तूप अवशेष एक साथ मौजूद हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यदि यहाँ के पुरातात्विक स्थलों का वैज्ञानिक संरक्षण किया जाए तो यह बिहार के प्रमुख धार्मिक और विरासत पर्यटन केंद्रों में शामिल हो सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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