श्रावणी मेला 2025: सुल्तानगंज में 'जीविका दीदी की रसोई' से 100 से अधिक महिलाओं को रोज़गार, ₹30 लाख आमदनी का अनुमान
सारांश
मुख्य बातें
भागलपुर के सुल्तानगंज में चल रहे श्रावणी मेले में 'जीविका दीदी की रसोई' ने एक साथ दो काम किए — कांवड़ियों को सात्विक और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराया, और 100 से अधिक महिलाओं को महीने भर का सशक्त रोज़गार दिया। नमामि गंगे घाट पर संचालित इस रसोई में प्रतिदिन 1,000 से अधिक कांवड़िये भोजन ग्रहण करते हैं।
रसोई का संचालन और रोज़गार का दायरा
नमामि गंगे घाट पर जीविका का संचालन देख रहे मैनेजर सौरभ कुमार ने बताया कि इस एक माह के मेले से प्रत्येक जीविका दीदी को ₹8,000 से ₹10,000 तक की कमाई होने का अनुमान है। उन्होंने यह भी बताया कि पूरे आयोजन से कुल ₹30 लाख की आमदनी की संभावना है।
सौरभ कुमार के अनुसार, 'जीविका दीदी की रसोई' में काम करने वाली महिलाएं सुल्तानगंज और उसके आस-पास के इलाकों की निवासी हैं। उन्होंने कहा, 'इनमें से कई महिलाएं पहले कोई काम नहीं करती थीं। जब उन्हें जीविका के ज़रिए इस मौके के बारे में पता चला, तो उन्हें रोज़गार मिल गया।'
महिलाओं की आवाज़: बदलाव की कहानी
रसोई में एक काउंटर संभालने वाली रितु देवी ने बताया कि इस पहल से न केवल अच्छा मुनाफा हुआ है, बल्कि पहले से बेरोज़गार महिलाओं को भी काम के अवसर मिले हैं। यह ऐसे समय में आया है जब ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ाना सरकार की प्राथमिकता बनी हुई है।
बाबा नगरी में भक्ति का माहौल
श्रावणी मेले के दौरान देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ मंदिर में भी आस्था का सैलाब उमड़ा। सुबह 4:08 बजे मंदिर के द्वार खुलते ही 'हर हर महादेव' और 'बोल बम' के जयकारों से पूरा परिसर गूंज उठा। एक ही दिन में 2,26,747 श्रद्धालुओं ने बाबा बैद्यनाथ को पवित्र जल अर्पित किया। गर्भगृह खुलने से पूर्व पुजारी गौरव झा ने प्रतिदिन की भाँति सरदार पूजा संपन्न की।
जीविका योजना की पृष्ठभूमि
बिहार सरकार, 'बिहार रूरल लाइवलीहुड्स प्रमोशन सोसाइटी' के माध्यम से विश्व बैंक की सहायता से 'बिहार रूरल लाइवलीहुड्स प्रोजेक्ट' — जिसे सामान्यतः 'जीविका' के नाम से जाना जाता है — लागू कर रही है। इसका उद्देश्य ग्रामीण गरीबों का सामाजिक और आर्थिक सशक्तीकरण है। बाद में 'बिहार कोसी बाढ़ रिकवरी प्रोजेक्ट' के आजीविका बहाली वाले हिस्से को भी इसी पहल के अंतर्गत शामिल किया गया। गौरतलब है कि श्रावणी मेले जैसे बड़े धार्मिक आयोजन जीविका जैसी योजनाओं के लिए व्यावहारिक मंच साबित हो रहे हैं, जहाँ स्वयं सहायता समूहों की महिलाएं अपनी उद्यमशीलता का परिचय दे रही हैं।
आने वाले वर्षों में यदि इस मॉडल को अन्य धार्मिक मेलों और सांस्कृतिक आयोजनों तक विस्तारित किया जाए, तो यह ग्रामीण महिला रोज़गार का एक टिकाऊ ढाँचा बन सकता है।