लखपति दीदी योजना: गुजरात में करीब 6 लाख महिलाएं बनीं आत्मनिर्भर, SHG से बदली जिंदगी
सारांश
मुख्य बातें
लखपति दीदी योजना ने गुजरात में महिला सशक्तीकरण की एक नई इबारत लिखी है — राज्य में अब तक करीब 6 लाख महिलाएं इस योजना के तहत 'लखपति दीदी' का दर्जा हासिल कर चुकी हैं। स्वयं सहायता समूहों (SHG) के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं ने न केवल अपनी वार्षिक आय ₹1 लाख से ऊपर पहुँचाई है, बल्कि अपने परिवारों और समुदायों में आर्थिक बदलाव की अगुवाई भी की है। गुजरात अब इस योजना के सफल क्रियान्वयन में देश के अग्रणी राज्यों में शामिल हो गया है।
योजना की पृष्ठभूमि और ढाँचा
लखपति दीदी योजना केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा संचालित दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) के अंतर्गत चलाई जा रही है। इस योजना में SHG से जुड़ी महिलाओं को तकनीकी प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता, ऋण सुविधा और उत्पादों के लिए बाज़ार उपलब्ध कराया जाता है। जिन महिलाओं की वार्षिक आय ₹1 लाख से अधिक हो जाती है, उन्हें आधिकारिक रूप से 'लखपति दीदी' की मान्यता दी जाती है। गुजरात में इस योजना को राज्य सरकार की 'मिशन मंगलम' पहल का भी सहयोग मिल रहा है।
नवसारी की भावनाबेन: कैंटीन से सालाना ₹10 लाख की आय
नवसारी जिले की चिखली तालुका के नोगामा गाँव की भावनाबेन पटेल इस योजना की एक प्रेरणादायक मिसाल हैं। गायत्री सखी मंडल से जुड़ी भावनाबेन ने राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और मिशन मंगलम के तहत ₹10 लाख की सरकारी सहायता प्राप्त कर कैंटीन और कैटरिंग व्यवसाय शुरू किया। उनका दस सदस्यीय समूह पिछले तीन वर्षों से जिला पंचायत में कैंटीन का सफलतापूर्वक संचालन कर रहा है और अब सालाना ₹10 लाख से अधिक की आय अर्जित कर रहा है।
भावनाबेन ने बताया, 'सरकार से मिली ₹10 लाख की सहायता से हमने यह कैंटीन शुरू की थी। आज हमारी सभी दस बहनें आत्मनिर्भर बन चुकी हैं। इसके लिए मैं सरकार और GLPC का दिल से धन्यवाद करती हूँ।'
आणंद की कोमलबेन: 10 से 60 महिलाओं तक का सफर
आणंद जिले के गामडी गाँव की कोमलबेन चौहान ने मई 2014 में केवल 10 महिलाओं के साथ 'आस्था सखी मंडल' की स्थापना की थी। मिशन मंगलम के अंतर्गत उन्होंने मिट्टी के दीये, गणपति प्रतिमाएं, पैचवर्क, तोरण, बेडशीट और अन्य हस्तशिल्प उत्पादों का निर्माण शुरू किया। आज यह समूह 60 से 70 महिलाओं को रोज़गार और आय का अवसर उपलब्ध करा रहा है।
कोमलबेन ने कहा, 'आज लोग मुझे लखपति दीदी कहकर बुलाते हैं। यह मेरे लिए गर्व की बात है कि इस योजना ने मुझे नई पहचान दी है।'
समूह की अन्य सदस्यों की कहानी
आस्था सखी मंडल की सदस्य रेखाबेन पिछले दस वर्षों से इस समूह से जुड़ी हैं। समूह से जुड़ने से पहले वे कोई आय अर्जित नहीं करती थीं, लेकिन अब वे अपने परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों में सक्रिय योगदान दे रही हैं। समूह की एक अन्य सदस्य रश्मिबेन ने सरकारी प्रशिक्षण के ज़रिए पैचवर्क, टेराकोटा, टेडी बियर और खिलौना निर्माण जैसे कौशल हासिल किए हैं और अब हर महीने लगभग ₹7,000 तक की आय अर्जित कर रही हैं।
राष्ट्रीय परिदृश्य और आगे की राह
आँकड़ों के अनुसार, देशभर में अब तक 3 करोड़ से अधिक महिलाएं 'लखपति दीदी' बन चुकी हैं। गुजरात की करीब 6 लाख लखपति दीदियाँ इस राष्ट्रीय लक्ष्य में उल्लेखनीय योगदान दे रही हैं। यह योजना ऐसे समय में और अधिक प्रासंगिक हो जाती है जब ग्रामीण महिलाओं की श्रम-भागीदारी दर को बढ़ाना नीतिगत प्राथमिकता बनी हुई है। गौरतलब है कि केंद्र सरकार पिछले 12 वर्षों से महिला वित्तीय समावेशन को आत्मनिर्भर भारत की नींव के रूप में प्रोत्साहित कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि SHG-आधारित मॉडल की दीर्घकालिक सफलता बाज़ार पहुँच और कौशल उन्नयन के निरंतर समर्थन पर निर्भर करेगी।