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लखपति दीदी योजना: गुजरात में करीब 6 लाख महिलाएं बनीं आत्मनिर्भर, SHG से बदली जिंदगी

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लखपति दीदी योजना: गुजरात में करीब 6 लाख महिलाएं बनीं आत्मनिर्भर, SHG से बदली जिंदगी

सारांश

गुजरात में करीब 6 लाख महिलाएं 'लखपति दीदी' बन चुकी हैं — नवसारी की भावनाबेन की कैंटीन सालाना ₹10 लाख कमा रही है, आणंद की कोमलबेन का समूह 10 से 60 महिलाओं तक पहुँचा। SHG-आधारित यह मॉडल ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक तस्वीर बदल रहा है।

मुख्य बातें

गुजरात में अब तक करीब 6 लाख महिलाएं 'लखपति दीदी' बन चुकी हैं, जो देश के अग्रणी राज्यों में शामिल है।
नवसारी की भावनाबेन पटेल के गायत्री सखी मंडल ने सरकारी सहायता से कैंटीन शुरू की; समूह अब सालाना ₹10 लाख से अधिक कमा रहा है।
आणंद की कोमलबेन चौहान का आस्था सखी मंडल मई 2014 में 10 महिलाओं से शुरू होकर अब 60-70 महिलाओं को रोज़गार दे रहा है।
समूह सदस्य रश्मिबेन सरकारी प्रशिक्षण के बाद हर महीने लगभग ₹7,000 तक की आय अर्जित कर रही हैं।
देशभर में 3 करोड़ से अधिक महिलाएं 'लखपति दीदी' बन चुकी हैं; योजना DAY-NRLM के तहत संचालित है।

लखपति दीदी योजना ने गुजरात में महिला सशक्तीकरण की एक नई इबारत लिखी है — राज्य में अब तक करीब 6 लाख महिलाएं इस योजना के तहत 'लखपति दीदी' का दर्जा हासिल कर चुकी हैं। स्वयं सहायता समूहों (SHG) के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं ने न केवल अपनी वार्षिक आय ₹1 लाख से ऊपर पहुँचाई है, बल्कि अपने परिवारों और समुदायों में आर्थिक बदलाव की अगुवाई भी की है। गुजरात अब इस योजना के सफल क्रियान्वयन में देश के अग्रणी राज्यों में शामिल हो गया है।

योजना की पृष्ठभूमि और ढाँचा

लखपति दीदी योजना केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा संचालित दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) के अंतर्गत चलाई जा रही है। इस योजना में SHG से जुड़ी महिलाओं को तकनीकी प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता, ऋण सुविधा और उत्पादों के लिए बाज़ार उपलब्ध कराया जाता है। जिन महिलाओं की वार्षिक आय ₹1 लाख से अधिक हो जाती है, उन्हें आधिकारिक रूप से 'लखपति दीदी' की मान्यता दी जाती है। गुजरात में इस योजना को राज्य सरकार की 'मिशन मंगलम' पहल का भी सहयोग मिल रहा है।

नवसारी की भावनाबेन: कैंटीन से सालाना ₹10 लाख की आय

नवसारी जिले की चिखली तालुका के नोगामा गाँव की भावनाबेन पटेल इस योजना की एक प्रेरणादायक मिसाल हैं। गायत्री सखी मंडल से जुड़ी भावनाबेन ने राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और मिशन मंगलम के तहत ₹10 लाख की सरकारी सहायता प्राप्त कर कैंटीन और कैटरिंग व्यवसाय शुरू किया। उनका दस सदस्यीय समूह पिछले तीन वर्षों से जिला पंचायत में कैंटीन का सफलतापूर्वक संचालन कर रहा है और अब सालाना ₹10 लाख से अधिक की आय अर्जित कर रहा है।

भावनाबेन ने बताया, 'सरकार से मिली ₹10 लाख की सहायता से हमने यह कैंटीन शुरू की थी। आज हमारी सभी दस बहनें आत्मनिर्भर बन चुकी हैं। इसके लिए मैं सरकार और GLPC का दिल से धन्यवाद करती हूँ।'

आणंद की कोमलबेन: 10 से 60 महिलाओं तक का सफर

आणंद जिले के गामडी गाँव की कोमलबेन चौहान ने मई 2014 में केवल 10 महिलाओं के साथ 'आस्था सखी मंडल' की स्थापना की थी। मिशन मंगलम के अंतर्गत उन्होंने मिट्टी के दीये, गणपति प्रतिमाएं, पैचवर्क, तोरण, बेडशीट और अन्य हस्तशिल्प उत्पादों का निर्माण शुरू किया। आज यह समूह 60 से 70 महिलाओं को रोज़गार और आय का अवसर उपलब्ध करा रहा है।

कोमलबेन ने कहा, 'आज लोग मुझे लखपति दीदी कहकर बुलाते हैं। यह मेरे लिए गर्व की बात है कि इस योजना ने मुझे नई पहचान दी है।'

समूह की अन्य सदस्यों की कहानी

आस्था सखी मंडल की सदस्य रेखाबेन पिछले दस वर्षों से इस समूह से जुड़ी हैं। समूह से जुड़ने से पहले वे कोई आय अर्जित नहीं करती थीं, लेकिन अब वे अपने परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों में सक्रिय योगदान दे रही हैं। समूह की एक अन्य सदस्य रश्मिबेन ने सरकारी प्रशिक्षण के ज़रिए पैचवर्क, टेराकोटा, टेडी बियर और खिलौना निर्माण जैसे कौशल हासिल किए हैं और अब हर महीने लगभग ₹7,000 तक की आय अर्जित कर रही हैं।

राष्ट्रीय परिदृश्य और आगे की राह

आँकड़ों के अनुसार, देशभर में अब तक 3 करोड़ से अधिक महिलाएं 'लखपति दीदी' बन चुकी हैं। गुजरात की करीब 6 लाख लखपति दीदियाँ इस राष्ट्रीय लक्ष्य में उल्लेखनीय योगदान दे रही हैं। यह योजना ऐसे समय में और अधिक प्रासंगिक हो जाती है जब ग्रामीण महिलाओं की श्रम-भागीदारी दर को बढ़ाना नीतिगत प्राथमिकता बनी हुई है। गौरतलब है कि केंद्र सरकार पिछले 12 वर्षों से महिला वित्तीय समावेशन को आत्मनिर्भर भारत की नींव के रूप में प्रोत्साहित कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि SHG-आधारित मॉडल की दीर्घकालिक सफलता बाज़ार पहुँच और कौशल उन्नयन के निरंतर समर्थन पर निर्भर करेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली कसौटी यह है कि इनमें से कितनी महिलाएं सरकारी सहायता हटने के बाद भी ₹1 लाख की आय बनाए रख पाती हैं। SHG मॉडल की दीर्घकालिक सफलता बाज़ार पहुँच, आपूर्ति श्रृंखला और कौशल उन्नयन के निरंतर समर्थन पर टिकी है — जो अक्सर प्रारंभिक प्रशिक्षण चरण के बाद कमज़ोर पड़ जाती है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि 'लखपति दीदी' की मान्यता वार्षिक आय सीमा पार करने पर मिलती है, लेकिन इस आय की निरंतरता और वृद्धि को मापने का कोई सार्वजनिक ढाँचा अभी तक सामने नहीं आया है।
RashtraPress
28 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लखपति दीदी योजना क्या है और इसे कौन चलाता है?
लखपति दीदी योजना केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) के तहत चलाई जाती है। इसमें स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और बाज़ार उपलब्ध कराया जाता है; जिनकी वार्षिक आय ₹1 लाख से अधिक हो जाती है उन्हें 'लखपति दीदी' की मान्यता दी जाती है।
गुजरात में लखपति दीदी योजना का अब तक क्या असर रहा है?
गुजरात में अब तक करीब 6 लाख महिलाएं 'लखपति दीदी' बन चुकी हैं, जिससे राज्य इस योजना के क्रियान्वयन में देश के अग्रणी राज्यों में शामिल हो गया है। राज्य में मिशन मंगलम पहल ने भी इस योजना को अतिरिक्त बल दिया है।
मिशन मंगलम और लखपति दीदी योजना में क्या संबंध है?
मिशन मंगलम गुजरात सरकार की राज्यस्तरीय पहल है, जो DAY-NRLM के समानांतर SHG महिलाओं को वित्तीय सहायता और उद्यम स्थापना में मदद करती है। नवसारी की भावनाबेन और आणंद की कोमलबेन दोनों ने इसी पहल के तहत सहायता प्राप्त कर अपने व्यवसाय शुरू किए।
देशभर में कितनी महिलाएं लखपति दीदी बन चुकी हैं?
आँकड़ों के अनुसार, देशभर में अब तक 3 करोड़ से अधिक महिलाएं 'लखपति दीदी' बन चुकी हैं। इनमें गुजरात की करीब 6 लाख महिलाएं शामिल हैं।
इस योजना से जुड़ी महिलाओं को क्या-क्या सुविधाएं मिलती हैं?
योजना के तहत SHG सदस्यों को तकनीकी प्रशिक्षण (पैचवर्क, टेराकोटा, खिलौना निर्माण आदि), वित्तीय सहायता, ऋण सुविधा और उत्पादों के लिए बाज़ार उपलब्ध कराया जाता है। नवसारी के गायत्री सखी मंडल को ₹10 लाख की सहायता मिली, जिससे समूह ने कैंटीन व्यवसाय शुरू किया।
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