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नक्सल प्रभावित चुरचू की महिलाएं लाह चूड़ियों से बन रही 'लखपति दीदी', ₹15 लाख की ग्रांट से मिली उड़ान

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नक्सल प्रभावित चुरचू की महिलाएं लाह चूड़ियों से बन रही 'लखपति दीदी', ₹15 लाख की ग्रांट से मिली उड़ान

सारांश

कभी नक्सल हिंसा की छाया में रहा चुरचू अब लाह चूड़ियों की खनक से गूंज रहा है। 40 महिलाएं हर महीने ₹70,000–₹80,000 कमा रही हैं — यह सिर्फ आर्थिक बदलाव नहीं, बल्कि एक पूरे क्षेत्र की पहचान का रूपांतरण है।

मुख्य बातें

चुरचू नारी ऊर्जा फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी से जुड़ी करीब 40 महिलाएं लाह की चूड़ियां बनाकर 'लखपति दीदी' बनने की राह पर हैं।
महिलाओं को हर महीने ₹70,000 से ₹80,000 तक की आय हो रही है।
इस पहल की शुरुआत वर्ष 2016 में हुई थी और करीब सात साल पहले काम विस्तारित हुआ।
समूह को ₹15 लाख की सरकारी ग्रांट मिली, जिससे उत्पादन विस्तार में सहायता मिली।
उत्पाद हजारीबाग के अलावा देश के कई राज्यों में बिक रहे हैं; लाह का उपयोग कॉस्मेटिक, ज्वेलरी और दवा उद्योग में भी होता है।

हजारीबाग जिले का चुरचू प्रखंड, जो कभी नक्सल गतिविधियों के कारण सुर्खियों में रहता था, आज महिला सशक्तीकरण की एक प्रेरणादायक मिसाल बन चुका है। प्रखंड के कजरी गांव की करीब 40 महिलाएं पारंपरिक लाह कला को आधुनिक बाज़ार से जोड़कर हर महीने ₹70,000 से ₹80,000 तक की आय अर्जित कर रही हैं और 'लखपति दीदी' बनने की राह पर हैं। यह बदलाव न केवल इन परिवारों की आर्थिक तस्वीर बदल रहा है, बल्कि एक पूरे क्षेत्र की पहचान को नया रूप दे रहा है।

कैसे हुई शुरुआत

चुरचू नारी ऊर्जा फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी की कलाकार ममता देवी ने बताया कि वर्ष 2016 में इस पहल की नींव रखी गई थी। शुरुआत में महिलाओं को घर की चारदीवारी से बाहर निकलने के अवसर बहुत कम मिलते थे। प्रशिक्षण कार्यक्रमों के ज़रिए उन्होंने लाह की चूड़ियां बनाना सीखा और धीरे-धीरे यह हुनर उनकी आजीविका का मज़बूत आधार बन गया। आज से करीब सात साल पहले जब इस काम की शुरुआत हुई, तब किसी ने शायद अंदाज़ा भी नहीं लगाया था कि यह छोटी-सी पहल इतना बड़ा रूप लेगी।

उत्पादन प्रक्रिया और बाज़ार तक पहुंच

लाह की चूड़ी बनाना एक कुशल और श्रमसाध्य प्रक्रिया है। सबसे पहले लाह को गर्म करके पिघलाया जाता है, फिर उसे मनचाहा आकार दिया जाता है। इसके बाद उसमें विभिन्न रंग मिलाए जाते हैं और ग्राहकों की पसंद के अनुसार मोती, शीशे, राइनस्टोन व अन्य सजावटी सामग्री से सजाया जाता है। इन महिलाओं के तैयार उत्पाद अब हजारीबाग की सीमाओं से बाहर निकलकर देश के कई राज्यों तक पहुंच रहे हैं।

गौरतलब है कि झारखंड लाह उत्पादन के मामले में देश के अग्रणी राज्यों में शामिल है। यहां तैयार लाह का उपयोग चूड़ियों के अलावा कॉस्मेटिक, ज्वेलरी और दवा उद्योग में भी बड़े पैमाने पर होता है। महिलाओं ने इसी पारंपरिक कच्चे माल को आधुनिक डिज़ाइन और बेहतर विपणन से जोड़कर अपनी पहचान बनाई है।

सरकारी सहयोग और पुरस्कार

कंपनी के कोऑर्डिनेटर संदीप मुर्मु ने बताया कि केंद्र सरकार और अन्य संस्थाओं से मिले सहयोग ने इस पहल को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। समय के साथ समूह को सामाजिक पहचान और पुरस्कार भी मिले हैं। ट्रेनर संगीता देवी के अनुसार, समूह से जुड़ी महिलाओं को ₹15 लाख की ग्रांट भी प्राप्त हुई, जिससे काम के विस्तार में मदद मिली।

आम जनता और परिवारों पर असर

यह ऐसे समय में आया है जब ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को लेकर देशभर में नीतिगत बहस जारी है। चुरचू का यह उदाहरण दर्शाता है कि पारंपरिक कौशल, सरकारी सहयोग और महिलाओं की दृढ़ इच्छाशक्ति मिलकर किस तरह किसी क्षेत्र की तस्वीर बदल सकती है। घर की ज़िम्मेदारियां निभाते हुए भी ये महिलाएं चूड़ी केंद्र में काम कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो रही हैं।

आगे की राह

कभी जहां शाम ढलते ही डर का साया मंडराता था, आज उसी चुरचू में लाह की रंग-बिरंगी चूड़ियों की खनक एक नई सुबह का संदेश दे रही है। सरकारी योजनाओं, व्यावसायिक प्रशिक्षण और महिलाओं की अथक मेहनत ने मिलकर इस नक्सल प्रभावित क्षेत्र को आत्मनिर्भरता की नई परिभाषा दी है — और आने वाले वर्षों में इस मॉडल के और विस्तार की संभावनाएं प्रबल हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

जब संस्थागत सहयोग और बाज़ार से जुड़ते हैं, तो वे सुरक्षा-समस्याग्रस्त क्षेत्रों में भी स्थायी बदलाव ला सकते हैं। हालांकि, सवाल यह है कि क्या यह मॉडल झारखंड के अन्य नक्सल प्रभावित प्रखंडों तक व्यवस्थित रूप से पहुंचाया जा रहा है, या यह एक अलग-थलग सफलता बनकर रह जाएगा। ₹15 लाख की ग्रांट और 40 महिलाओं का समूह एक शुरुआत है, लेकिन स्केलेबिलिटी और बाज़ार की दीर्घकालिक स्थिरता पर निर्भर करेगा कि यह प्रयोग नीति का हिस्सा बनता है या सिर्फ एक प्रेरक उदाहरण।
RashtraPress
20 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

चुरचू की महिलाएं लाह चूड़ियां बनाकर कितना कमा रही हैं?
चुरचू नारी ऊर्जा फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी से जुड़ी महिलाओं को हर महीने करीब ₹70,000 से ₹80,000 तक की आय हो रही है। यह आय उन्हें 'लखपति दीदी' बनने की दिशा में आगे बढ़ा रही है।
चुरचू नारी ऊर्जा फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी की शुरुआत कब हुई?
इस पहल की शुरुआत वर्ष 2016 में हुई थी। महिलाओं ने प्रशिक्षण लेकर लाह की चूड़ियां बनाना सीखा और धीरे-धीरे यह काम रोजगार का प्रमुख माध्यम बन गया।
लाह की चूड़ी बनाने की प्रक्रिया क्या है?
सबसे पहले लाह को गर्म करके पिघलाया जाता है, फिर उसे आकार दिया जाता है। इसके बाद रंग मिलाए जाते हैं और मोती, शीशे, राइनस्टोन जैसी सजावटी सामग्री से इसे आकर्षक बनाया जाता है।
इस समूह को सरकार से क्या सहायता मिली?
ट्रेनर संगीता देवी के अनुसार, समूह को करीब ₹15 लाख की ग्रांट मिली जिससे काम के विस्तार में मदद मिली। केंद्र सरकार और अन्य संस्थाओं के सहयोग से भी यह पहल आगे बढ़ी है।
झारखंड में लाह उत्पादन का क्या महत्व है?
झारखंड लाह उत्पादन के मामले में देश के प्रमुख राज्यों में शामिल है। यहां का लाह देश-विदेश में भेजा जाता है और इसका उपयोग चूड़ियों के अलावा कॉस्मेटिक, ज्वेलरी और दवा उद्योग में भी होता है।
राष्ट्र प्रेस
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