दोपहिया वाहन सबसे लोकप्रिय कम्यूटिंग साधन, ₹785 प्रति माह औसत खर्च: NSO सर्वे 2026
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के ताज़ा सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में निश्चित कार्यस्थलों तक आने-जाने के लिए दोपहिया वाहन सबसे प्रमुख परिवहन साधन बने हुए हैं — देश के 42.6 प्रतिशत कर्मचारी टू-व्हीलर से दफ्तर पहुँचते हैं। सर्वे के आँकड़ों के अनुसार, एक कर्मचारी कार्यस्थल तक दैनिक आवागमन पर औसतन ₹785 प्रति माह खर्च करता है।
शहरी और ग्रामीण यात्रा खर्च में बड़ा अंतर
सर्वेक्षण के आँकड़े शहरी और ग्रामीण कर्मचारियों के बीच यात्रा व्यय में स्पष्ट विभाजन दर्शाते हैं। शहरी कर्मचारी हर माह आवागमन पर औसतन ₹1,044 खर्च करते हैं, जबकि ग्रामीण कर्मचारियों का यही खर्च ₹612 प्रति माह है। यह अंतर परिवहन अवसंरचना, ईंधन लागत और शहरी दूरियों की असमानता को प्रतिबिंबित करता है।
गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में शहरी आवागमन लागत पर बहस तेज़ है और सार्वजनिक परिवहन के विस्तार की माँग उठ रही है।
यात्रा अवधि और दूरी के मुख्य तथ्य
सर्वे के अनुसार भारत में अधिकांश कामकाजी लोगों की यात्रा अवधि अपेक्षाकृत कम है। 83.4 प्रतिशत कर्मचारी अपने निश्चित कार्यस्थल तक 30 मिनट से कम समय में पहुँच जाते हैं। इसी प्रकार 87.6 प्रतिशत छात्र अपने शैक्षणिक संस्थानों तक आधे घंटे के भीतर पहुँच जाते हैं।
दूरी के लिहाज़ से, 57.6 प्रतिशत कर्मचारी कार्यस्थल तक पहुँचने के लिए 1 किलोमीटर से अधिक दूरी तय करते हैं। 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के आधे से ज़्यादा कर्मचारी प्रतिदिन कार्य-संबंधी यात्रा करते हैं — ग्रामीण क्षेत्रों में यह अनुपात 54.5 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 64.1 प्रतिशत है।
राज्यवार और लैंगिक यात्रा पैटर्न
राज्यवार आँकड़ों के अनुसार राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश में औसत यात्रा समय लगभग 20 से 23 मिनट दर्ज किया गया। दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में यह अवधि अपेक्षाकृत अधिक रही। पूर्वोत्तर भारत, विशेषकर असम और आसपास के राज्यों में, छात्रों और कर्मचारियों दोनों का औसत यात्रा समय सबसे कम — 15 से 19 मिनट — पाया गया।
लैंगिक अंतर के मामले में देशभर में 61.9 प्रतिशत पुरुष कर्मचारी नियमित रूप से प्रतिदिन काम पर यात्रा करते हैं, जबकि महिला कर्मचारियों का यह अनुपात 41.9 प्रतिशत है। यह अंतर कार्यबल में महिला भागीदारी, घरेलू ज़िम्मेदारियों और सुरक्षा संबंधी चिंताओं की जटिल परतों को उजागर करता है।
सार्वजनिक परिवहन और छात्रों के आवागमन का चित्र
शहरी परिवहन के संदर्भ में मेट्रो, मोनोरेल, उपनगरीय रेल और ट्राम का राष्ट्रीय स्तर पर योगदान केवल 5 प्रतिशत है। हालाँकि कुछ राज्यों में इनका उपयोग उल्लेखनीय रूप से अधिक है — महाराष्ट्र में 20.7 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल में 16.5 प्रतिशत और दिल्ली में 14.4 प्रतिशत कर्मचारी इन सार्वजनिक परिवहन साधनों का उपयोग करते हैं।
छात्रों के मामले में 6 वर्ष और उससे अधिक आयु के लगभग दो-तिहाई छात्र रोज़ाना कम से कम 1 किलोमीटर की यात्रा करते हैं — ग्रामीण क्षेत्रों में 65.6 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 68.1 प्रतिशत। छात्रों के बीच ऑटो-रिक्शा का उपयोग 10.5 प्रतिशत (शहरी क्षेत्रों में 14.4 प्रतिशत) है, जबकि 6.7 प्रतिशत छात्र दोपहिया वाहनों से आते हैं, जो शहरी क्षेत्रों में बढ़कर 11.5 प्रतिशत हो जाता है।
15 से 29 वर्ष आयु वर्ग के छात्रों में नियमित यात्रा का स्तर सर्वाधिक है — ग्रामीण भारत में 79.1 प्रतिशत और शहरी भारत में 73.3 प्रतिशत युवा छात्र प्रतिदिन अपने संस्थानों तक पहुँचने के लिए नियमित यात्रा करते हैं। NSO के ये आँकड़े नीति-निर्माताओं के लिए परिवहन-नियोजन और सार्वजनिक गतिशीलता की प्राथमिकताएँ तय करने में एक महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं।