ड्रैगन फ्रूट की खेती से 'लखपति दीदी' बनीं कटिहार की रीना देवी, सालाना ₹8-12 लाख की आमदनी
सारांश
मुख्य बातें
बिहार के कटिहार जिले की रीना देवी ने ड्रैगन फ्रूट की खेती को अपनाकर न केवल अपने परिवार की आर्थिक तस्वीर बदली, बल्कि बरारी प्रखंड की सुजापुर पंचायत की दर्जनों महिलाओं के लिए प्रेरणा की मिसाल बन गई हैं। जहाँ कभी साहूकार के कर्ज से जिंदगी जकड़ी रहती थी, वहीं आज उनकी वार्षिक आय ₹8 लाख से ₹12 लाख तक पहुँच चुकी है। जीविका स्वयं सहायता समूह से मिले संगठन, वित्तीय सहयोग और जानकारी ने इस बदलाव की नींव रखी।
संघर्ष से शुरुआत — कर्ज और अनिश्चितता का दौर
रीना देवी के परिवार के लिए खेती कभी केवल पेट भरने का साधन थी। बीज और खाद के लिए साहूकार से कर्ज लेना पड़ता था और फसल बिकने के बाद मिलने वाली रकम का बड़ा हिस्सा ब्याज चुकाने में चला जाता था। बच्चों की पढ़ाई और घर की ज़रूरतें पूरी करना एक साथ बड़ी चुनौती थी।
बदलाव की शुरुआत वर्ष 2014 में हुई, जब गांव में सीआरपी दीदी के माध्यम से उन्हें जीविका कार्यक्रम की जानकारी मिली। परिवार की शुरुआती आपत्तियों के बावजूद उन्होंने माँ दुर्गा जीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ने का साहसिक फैसला किया। नियमित बैठकों में शामिल होकर उन्होंने बचत, ऋण प्रबंधन और सरकारी योजनाओं की जानकारी हासिल की।
ड्रैगन फ्रूट की खेती — जोखिम और जीत की कहानी
वर्ष 2016 में 15 स्वयं सहायता समूहों को मिलाकर सागर जीविका महिला ग्राम संगठन बना, तो रीना देवी उसमें भी सक्रिय भूमिका में आ गईं। वर्ष 2018 में उन्होंने और उनके पति संजय कुमार पोद्दार ने पारंपरिक खेती से हटकर नया रास्ता चुना। समूह से ₹50,000 का ऋण लेकर दो बीघा जमीन में ड्रैगन फ्रूट की खेती शुरू की — गांव में यह फसल पूरी तरह नई थी।
शुरुआती दो वर्षों तक कोई आमदनी नहीं हुई। पौधों की देखभाल, मेहनत और धैर्य ही पूंजी था। तीसरे वर्ष पहली बार करीब 4 क्विंटल ड्रैगन फ्रूट का उत्पादन हुआ, जिसे पूर्णिया बाजार में अच्छी कीमत पर बेचा गया। रीना देवी बताती हैं — 'ड्रैगन फ्रूट की खेती शुरू करते समय डर भी लगा था, लेकिन आज उसी खेती ने मेरे परिवार की जिंदगी बदल दी है।'
वर्ष 2022 में समूह से दो बार ऋण लेकर उन्होंने खाद, निराई और पौधों के विस्तार पर निवेश किया। आज उत्पादन 7 से 10 क्विंटल तक पहुँच गया है और इससे सालाना ₹7 से ₹8 लाख की आमदनी हो रही है।
मक्का की खेती से आय का और विस्तार
नवंबर 2023 में रीना देवी ने समूह से ₹2 लाख का ऋण लेकर 10 बीघा जमीन बंटाई पर ली और मक्का की खेती शुरू की। बेहतर तकनीक और परिश्रम से करीब 400 क्विंटल मक्का का उत्पादन हुआ। ड्रैगन फ्रूट और मक्का दोनों मिलाकर उनकी वार्षिक आय अब ₹8 लाख से ₹12 लाख तक पहुँच चुकी है।
यह ऐसे समय में आया है जब बिहार में ग्रामीण कृषि आय के स्तर को लेकर गंभीर सवाल उठते रहे हैं। गौरतलब है कि जीविका कार्यक्रम के तहत महिलाओं को मिल रहे वित्तीय और सांगठनिक सहयोग ने राज्य के कई जिलों में ऐसी ही तस्वीरें बदली हैं।
बच्चों के भविष्य पर असर और 'लखपति दीदी' की पहचान
इस आर्थिक बदलाव का सबसे गहरा असर रीना देवी के तीनों बच्चों के जीवन पर पड़ा है। उनकी बड़ी बेटी ग्रेजुएशन पूरी कर चुकी है और उसे सरकार की ओर से ₹50,000 की वित्तीय सहायता मिली। दूसरी बेटी ग्रेजुएशन में है, जबकि छोटा बेटा आठवीं कक्षा में पढ़ रहा है। आज रीना देवी 'लखपति दीदी' के रूप में सम्मानित जीवन जी रही हैं।
वह कहती हैं — 'अब मेरा सपना है कि गांव की दूसरी महिलाएं भी समूह से जुड़कर अपने पैरों पर खड़ी हों और अपने परिवार के भविष्य को बेहतर बनाएं।'
आगे की राह — एक मॉडल जो फैल सकता है
रीना देवी की यह यात्रा महज एक व्यक्तिगत सफलता की कहानी नहीं है — यह उस बड़े बदलाव का प्रमाण है जो संगठन, वित्तीय समावेश और कृषि में नवाचार मिलकर ला सकते हैं। सुजापुर पंचायत में उनसे प्रेरित होकर अन्य महिलाएं भी स्वयं सहायता समूहों से जुड़ रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसे मॉडल को राज्य स्तर पर बढ़ावा मिले, तो ग्रामीण महिला सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा परिवर्तन संभव है।