सीवान में अवैध अस्पतालों का कहर: 16 दिन के नवजात की मौत, न डॉक्टर न लाइसेंस
सारांश
Key Takeaways
- सीवान के डॉ. उमेश के क्लीनिक में 16 दिन के नवजात शिशु की मौत हुई, क्लीनिक बिना लाइसेंस संचालित था।
- क्लीनिक में न प्रशिक्षित डॉक्टर था और न वैध दस्तावेज, फिर भी मरीजों से हजारों रुपये वसूले जाते थे।
- सीवान जिले में ऐसे दर्जनों अवैध अस्पताल और क्लीनिक बिना किसी रोक-टोक के संचालित हो रहे हैं।
- जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग को कई बार शिकायत के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
- स्थानीय लोगों ने एकजुट होकर अवैध क्लीनिक संचालकों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की मांग की है।
- यह घटना बिहार में स्वास्थ्य निगरानी व्यवस्था की गंभीर खामियों और प्रशासनिक निष्क्रियता को उजागर करती है।
सीवान (बिहार), 24 अप्रैल। बिहार के सीवान जिले में बिना वैध लाइसेंस और प्रशिक्षित डॉक्टरों के धड़ल्ले से संचालित हो रहे अवैध अस्पतालों का एक और खौफनाक मामला सामने आया है। डॉ. उमेश के क्लीनिक में भर्ती एक 16 दिन के नवजात शिशु की मौत हो गई, जिसके बाद परिजनों ने अस्पताल पहुंचकर जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। यह घटना उस व्यापक लापरवाही की ओर इशारा करती है, जिसमें स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन की चुप्पी सवालों के घेरे में है।
क्या है पूरा मामला
सीवान में डॉ. उमेश का क्लीनिक कथित तौर पर बिना किसी वैध दस्तावेज के संचालित हो रहा था। परिजनों का आरोप है कि इस क्लीनिक में न कोई प्रशिक्षित चिकित्सक तैनात था और न ही कोई योग्य स्वास्थ्यकर्मी। इसके बावजूद मरीजों से हजारों रुपये फीस के नाम पर वसूले जा रहे थे।
नवजात शिशु को 16 दिनों तक इसी क्लीनिक में रखा गया, लेकिन उचित इलाज न मिलने के कारण उसकी मौत हो गई। मौत की खबर मिलते ही परिजन क्लीनिक पहुंचे और जमकर हंगामा किया।
जिलेभर में फैला अवैध क्लीनिकों का जाल
यह मामला केवल एक क्लीनिक तक सीमित नहीं है। स्थानीय लोगों के अनुसार सीवान जिले में दर्जनों ऐसे अस्पताल और क्लीनिक संचालित हो रहे हैं, जिनके पास न वैध पंजीकरण है, न प्रशिक्षित डॉक्टर और न ही आवश्यक चिकित्सा उपकरण।
कई बार इन अस्पतालों में अप्रशिक्षित कर्मचारी मरीजों को इंजेक्शन तक लगा देते हैं, जिससे मरीजों की स्थिति और गंभीर हो जाती है। यह सिलसिला वर्षों से चल रहा है, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
प्रशासन की निष्क्रियता पर सवाल
स्थानीय निवासियों का कहना है कि इस संबंध में जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग को कई बार लिखित शिकायतें दी जा चुकी हैं। लेकिन आज तक किसी भी अवैध क्लीनिक पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। इस निष्क्रियता ने इन अवैध संचालकों के हौसले और बढ़ा दिए हैं।
अब स्थानीय लोगों ने एकजुट होकर जिला प्रशासन से मांग की है कि इन सभी अवैध अस्पतालों की पहचान कर उनके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए। लोगों का यह भी सवाल है कि क्या गरीबों की जान की कोई कीमत नहीं है?
गहरा संदर्भ: बिहार में स्वास्थ्य व्यवस्था की विडंबना
यह घटना उस समय सामने आई है जब बिहार सरकार स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के बड़े-बड़े दावे कर रही है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के तहत करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि जिला स्तर पर अवैध क्लीनिकों पर अंकुश लगाने की कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं है।
गौरतलब है कि बिहार मेडिकल काउंसिल और राज्य स्वास्थ्य विभाग के नियमों के तहत हर अस्पताल और क्लीनिक का पंजीकरण अनिवार्य है। इसके बावजूद सीवान जैसे जिलों में यह नियम केवल कागजों तक सीमित रह गया है। आलोचकों का कहना है कि इन अवैध क्लीनिकों को स्थानीय स्तर पर राजनीतिक संरक्षण मिलता है, जिसके चलते कार्रवाई नहीं होती।
तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो उत्तर प्रदेश और राजस्थान में भी इसी तरह के अवैध क्लीनिकों की समस्या रही है, लेकिन वहां समय-समय पर बड़े अभियान चलाकर कार्रवाई की गई है। बिहार में ऐसे अभियानों की भारी कमी देखी जाती है।
आगे क्या होगा
नवजात की मौत के बाद स्थानीय जनप्रतिनिधियों पर भी दबाव बढ़ रहा है। उम्मीद है कि सीवान जिला प्रशासन जल्द ही इन अवैध क्लीनिकों के खिलाफ छापेमारी अभियान शुरू करेगा। यदि प्रशासन ने इस बार भी आंखें मूंद लीं, तो यह मामला उच्च न्यायालय तक पहुंच सकता है।