सुलभा देशपांडे: शिक्षिका से रंगमंच की दिग्गज नायिका तक, 'शांतता! कोर्ट चालू आहे' की अमर विरासत
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय रंगमंच और सिनेमा की दिग्गज अभिनेत्री सुलभा देशपांडे का जीवन कला, शिक्षा और सामाजिक चेतना का अनूठा संगम था, जिनकी विरासत आज भी रंगकर्मियों की नई पीढ़ी को प्रेरित करती है। 4 जून 2016 को मुंबई स्थित अपने निवास पर लंबी बीमारी के बाद 79 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ था, और उनके जाने से मराठी रंगमंच तथा हिंदी सिनेमा ने अपनी एक अपूरणीय हस्ती खो दी।
शिक्षिका से रंगकर्मी तक का सफर
1937 में तत्कालीन बॉम्बे (अब मुंबई) में जन्मीं सुलभा देशपांडे ने सिद्धार्थ कॉलेज से शिक्षा में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। शुरुआती दौर में उन्होंने छबीलदास हाई स्कूल में बतौर शिक्षिका कार्य किया, लेकिन रंगमंच के प्रति उनका गहरा लगाव उन्हें अभिनय और नाट्य गतिविधियों की ओर खींच लाया।
उन्होंने अपना जीवन कला और विशेष रूप से बाल रंगमंच के विकास के लिए समर्पित कर दिया। बच्चों के लिए नाटकों का निर्देशन, प्रशिक्षण शिविरों का आयोजन और बाल रंगमंच के अध्ययन के लिए विदेश यात्राएँ उनके इसी समर्पण का प्रमाण रहीं।
'आविष्कार' और छबीलदास आंदोलन की नींव
रंगमंच के क्षेत्र में सुलभा का योगदान संस्थागत स्तर पर भी निर्णायक रहा। उन्होंने 1960 में 'रंगायन' की स्थापना में सहयोग दिया। बाद में अपने पति अरविंद देशपांडे तथा अरुण काकडे के साथ मिलकर प्रयोगधर्मी नाट्य संस्था 'आविष्कार' की स्थापना की।
इस संस्था ने मराठी रंगमंच में नए प्रयोगों को बढ़ावा दिया और प्रसिद्ध 'छबीलदास आंदोलन' की नींव रखी, जो आगे चलकर मराठी प्रायोगिक रंगमंच का पर्याय बना।
'शांतता! कोर्ट चालू आहे' से मिली पहचान
सुलभा देशपांडे को सबसे अधिक प्रसिद्धि विजय तेंदुलकर के चर्चित नाटक 'शांतता! कोर्ट चालू आहे' में निभाई भूमिका से मिली। इस नाटक का पहला मंचन 1968 में हुआ और इसमें उनके अभिनय को आलोचकों एवं दर्शकों दोनों ने व्यापक सराहना दी।
इसके अलावा 'सखाराम बिंदर', 'राजा रानीला घाम हवा', 'दुर्गा झाली गौरी' और 'बाबा हरवले आहेत' जैसे नाटकों में भी उनके अभिनय ने गहरी छाप छोड़ी। बादल सरकार के प्रसिद्ध नाटक 'एवम इंद्रजीत' सहित कई हिंदी और मराठी प्रस्तुतियों में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा।
सिनेमा और टेलीविजन में योगदान
फिल्मों में उनका पदार्पण 1971 में 'शांतता! कोर्ट चालू आहे' के सिनेमाई संस्करण से हुआ। हिंदी सिनेमा में उन्होंने 'भूमिका', 'गमन', 'सलाम बॉम्बे!', 'विरासत' और 'इंग्लिश विंग्लिश' जैसी फिल्मों में प्रभावशाली अभिनय किया। 'इंग्लिश विंग्लिश' उनकी अंतिम बॉलीवुड फिल्म साबित हुई।
टेलीविजन पर भी उन्होंने 'तन्हा', 'एक पैकेट उम्मीद', 'कहता है दिल जी ले जरा', 'मिसेज तेंदुलकर' और 'अस्मिता' जैसे लोकप्रिय धारावाहिकों में अपनी प्रतिभा का परिचय दिया।
सम्मान और स्थायी विरासत
रंगमंच और कला के क्षेत्र में उनके अमूल्य योगदान को सम्मानित करते हुए वर्ष 1987 में उन्हें प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया। गौरतलब है कि वे केवल एक अभिनेत्री नहीं, बल्कि भारतीय प्रायोगिक रंगमंच की एक चलती-फिरती संस्था थीं।
उनकी पुण्यतिथि पर आज भी रंगमंच जगत उन्हें उस प्रेरणास्रोत के रूप में याद करता है, जिनकी कला यात्रा यह सिखाती है कि कैसे एक शिक्षिका, बाल रंगमंच की ध्वजवाहक बनकर, भारतीय नाट्य परंपरा को नई दिशा दे सकती है।