बालगंधर्व: मराठी रंगमंच के वो महानायक जिन्होंने स्त्री पात्र निभाकर रचा अमर इतिहास
सारांश
मुख्य बातें
नारायण श्रीपाद राजहंस, जिन्हें दुनिया बालगंधर्व के नाम से जानती है, ने उस युग में भारतीय रंगमंच को नई ऊँचाइयाँ दीं जब महिलाओं का मंच पर आना सामाजिक रूप से वर्जित था। 26 जून 1888 को जन्मे इस महान कलाकार ने मराठी रंगमंच पर स्त्री पात्रों को इतनी सजीवता से जीवंत किया कि दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते थे। उनकी कला ने न केवल रंगमंच को, बल्कि उस दौर के समाज और फैशन को भी गहराई से प्रभावित किया।
प्रारंभिक जीवन और संगीत की ओर रुझान
नारायण श्रीपाद राजहंस का जन्म महाराष्ट्र के सांगली जिले के पलुस तालुका के नागठाणे गाँव में एक पारंपरिक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके घर का वातावरण संगीत और अध्यात्म से सराबोर था — उनकी माता स्वयं गायन करती थीं और उनके नाना अप्पा शास्त्री बाबा महाराज की सभाओं में पुराण-वाचन करते थे।
जब बालक नारायण का झुकाव संगीत और रंगमंच की ओर बढ़ा, तो उनके पिता ने इसका विरोध किया, क्योंकि उस काल में रंगमंच को सामाजिक दृष्टि से कम प्रतिष्ठित पेशा माना जाता था। पिता एक बार उन्हें वापस घर ले भी आए। किंतु स्वतंत्रता आंदोलन के प्रणेता लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने स्वयं हस्तक्षेप किया और परिवार को नाटक मंडली की गरिमा व सुरक्षा का आश्वासन देकर नारायण को मंच पर लौटने की अनुमति दिलाई।
'बालगंधर्व' की उपाधि और करियर की शुरुआत
पुणे में डेक्कन कॉलेज के निकट आयोजित एक गायन कार्यक्रम में नारायण की प्रतिभा सुनकर लोकमान्य तिलक भावविभोर हो उठे और उन्होंने नारायण को 'बालगंधर्व' — अर्थात 'बाल देवदूत गायक' — की उपाधि से नवाज़ा। इसके बाद कोल्हापुर के छत्रपति शाहू महाराज ने उनकी असाधारण प्रतिभा को पहचाना, उनकी श्रवण संबंधी समस्याओं का उपचार कराया और उन्हें प्रतिष्ठित किर्लोस्कर नाटक मंडली में भेजा।
वर्ष 1905 में किर्लोस्कर मंडली से उनके पेशेवर अभिनय जीवन की विधिवत शुरुआत हुई। गुरु गोविंद देवल के कड़े अनुशासन में प्रशिक्षण लेने के बाद वर्ष 1906 में मिरज में उन्होंने शकुंतला के रूप में अपनी पहली प्रस्तुति दी — और पहले ही शो में दर्शकों का दिल जीत लिया।
समाज और फैशन पर अमिट प्रभाव
बालगंधर्व की लोकप्रियता इतनी अभूतपूर्व थी कि मुंबई और पुणे की संभ्रांत महिलाएँ उनकी साड़ियों के डिज़ाइन, उनके द्वारा पहने जाने वाले विशेष जैकेट, बालों के जूड़े और यहाँ तक कि उनकी चाल-ढाल की नकल करने लगीं। पुरुषों के फैशन में भी 'गंधर्व टोपी' और 'गंधर्व कोट' का जोरदार चलन शुरू हो गया। यह ऐसे समय में आया जब किसी कलाकार का इस स्तर पर सांस्कृतिक प्रभाव होना अत्यंत दुर्लभ था।
गंधर्व नाटक मंडली और जीवन के कठिन मोड़
12 मार्च 1911 को 'संगीत मानापमान' नाटक के पहले शो की उसी सुबह उनकी नवजात पुत्री का निधन हो गया — एक असहनीय व्यक्तिगत त्रासदी के बावजूद वे मंच पर उतरे। वर्ष 1911 में नानासाहेब जोगलेकर की असामयिक मृत्यु के बाद किर्लोस्कर मंडली बिखर गई। इसके बाद 1913 में बालगंधर्व ने गणपतराव बोडस और गोविंदराव तांबे के साथ मिलकर 'गंधर्व नाटक मंडली' की स्थापना की।
इस मंडली के नाटकों में भव्य और यथार्थवादी सेट, असली इत्रों का छिड़काव और महँगे परिधानों का उपयोग होता था — जिसके कारण कंपनी भारी कर्ज़ में डूब गई। बाद में उन्होंने सिनेमा की ओर रुख किया और वी. शांताराम की फिल्म 'धर्मात्मा' (1935) में संत एकनाथ की भूमिका निभाई, हालाँकि यह साझेदारी केवल एक ही फिल्म तक सीमित रही।
सम्मान, विदाई और अमर विरासत
उनकी पहली पत्नी लक्ष्मीबाई का निधन वर्ष 1940 में हुआ। वर्ष 1951 में उन्होंने सुप्रसिद्ध गायिका-अभिनेत्री गौहरबाई कर्नाटकी से विवाह किया। 1964 में गौहरबाई के निधन ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया।
भारत सरकार ने वर्ष 1955 में उन्हें प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और वर्ष 1964 में पद्म भूषण से अलंकृत किया। लगभग तीन महीने से अधिक समय तक कोमा में रहने के बाद 15 जुलाई 1967 को इस महान नट सम्राट का पुणे में निधन हो गया। पुणे में स्थित 'बाल गंधर्व रंग मंदिर' की नींव स्वयं उनके हाथों से रखी गई थी — एक ऐसी विरासत जो आज भी मराठी रंगमंच की धड़कन है।