4 नवंबर 2026
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सिंडिकेट बैंक मनी लॉन्ड्रिंग: गाजियाबाद कोर्ट ने 5 दोषियों को 3 साल की सजा, ₹50,000 जुर्माना

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सिंडिकेट बैंक मनी लॉन्ड्रिंग: गाजियाबाद कोर्ट ने 5 दोषियों को 3 साल की सजा, ₹50,000 जुर्माना

सारांश

गाजियाबाद कोर्ट ने सिंडिकेट बैंक के फर्जी लोन घोटाले से जुड़े पीएमएलए मामले में 5 दोषियों को 3 साल सजा और ₹50,000 जुर्माना सुनाया। खास यह कि मुख्य अपराध में बरी दो आरोपी भी ईडी के स्वतंत्र साक्ष्यों पर मनी लॉन्ड्रिंग में दोषी — ईडी की बड़ी कानूनी जीत।

मुख्य बातें

गाजियाबाद के विशेष न्यायाधीश ने 3 नवंबर 2026 को केस नंबर 5/23 में पाँच आरोपियों को पीएमएलए के तहत दोषी ठहराया।
माथुर , राजीव कुमार , अरविंद चौधरी , अंकित चौधरी और प्रमोद कुमार — प्रत्येक को 3 साल कठोर कारावास और ₹50,000 जुर्माना ।
जुर्माना न भरने पर अतिरिक्त 3 महीने साधारण कारावास का प्रावधान।
राजीव कुमार और प्रमोद कुमार मुख्य अपराध (सीबीआई मामले) में बरी हुए थे, फिर भी ईडी के साक्ष्यों के आधार पर मनी लॉन्ड्रिंग में दोषी।
2006-07 में सिंडिकेट बैंक की गजरौला शाखा में फर्जी दस्तावेजों से ऋण मंजूर कराने का आरोप सिद्ध।

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के लखनऊ जोनल कार्यालय को सिंडिकेट बैंक से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में 3 नवंबर 2026 को बड़ी न्यायिक सफलता मिली, जब गाजियाबाद के विशेष न्यायाधीश ने केस नंबर 5/23 में पाँचों आरोपियों को दोषी ठहराते हुए प्रत्येक को 3 साल के कठोर कारावास और ₹50,000 जुर्माने की सजा सुनाई। दोषियों में वी.एन. माथुर, राजीव कुमार, अरविंद चौधरी, अंकित चौधरी और प्रमोद कुमार शामिल हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

ईडी ने इस मामले में जाँच की शुरुआत केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई), एसीबी गाजियाबाद द्वारा दर्ज की गई दो प्राथमिकियों के आधार पर की थी। ये एफआईआर सिंडिकेट बैंक के मुख्य सतर्कता अधिकारी की शिकायत पर दर्ज हुई थीं। ईडी की जाँच में सामने आया कि 2006-07 के दौरान सिंडिकेट बैंक की गजरौला शाखा के तत्कालीन प्रबंधक वी.एन. माथुर ने स्वर्गीय नरेंद्र सिंह, अरविंद चौधरी और अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर एक सुनियोजित आपराधिक षड्यंत्र रचा था।

कैसे हुई धोखाधड़ी

जाँच के अनुसार, आरोपियों ने फर्जी बिक्री विलेखों, झूठे 'नॉन-इनकम्ब्रेन्स सर्टिफिकेट' (यानी संपत्ति पर कोई भार न होने के जाली प्रमाण पत्र) और गलत मूल्यांकन रिपोर्टों के आधार पर संबंधित व्यक्तियों, उनकी फर्मों और सहयोगियों को ऋण एवं ओवरड्राफ्ट लिमिट मंजूर कराई। यह पूरी साजिश सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक की प्रणाली के साथ व्यापक छेड़छाड़ का उदाहरण है।

मुख्य अपराध और पीएमएलए में अंतर

गौरतलब है कि गाजियाबाद की सीबीआई कोर्ट नंबर 2 के विशेष न्यायाधीश ने मुख्य अपराध के मामले में वी.एन. माथुर को आईपीसी और प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट, 1988 के प्रावधानों के तहत दोषी ठहराया था, जबकि राजीव कुमार और प्रमोद कुमार को उस मामले में बरी कर दिया गया था। हालाँकि, ईडी द्वारा प्रस्तुत अतिरिक्त साक्ष्यों और दस्तावेजों के आधार पर इन दोनों को अब प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए), 2002 की धारा 3 के तहत मनी लॉन्ड्रिंग का दोषी ठहराया गया है। धारा 4 के अंतर्गत दंड का प्रावधान लागू किया गया।

सजा का विवरण

न्यायालय ने पाँचों दोषियों में से प्रत्येक को 3 साल के कठोर कारावास और ₹50,000 जुर्माने की सजा सुनाई है। यदि कोई दोषी जुर्माना अदा करने में विफल रहता है, तो उसे अतिरिक्त 3 महीने की साधारण जेल की सजा भुगतनी होगी। ईडी ने इस फैसले को जाँच एजेंसी की एक अहम उपलब्धि बताया है।

आगे की राह

यह मामला इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि मुख्य अपराध से बरी हुए आरोपी भी पीएमएलए के तहत दोषी सिद्ध हो सकते हैं — जो ईडी की जाँच पद्धति और मनी लॉन्ड्रिंग कानून के व्यापक दायरे को रेखांकित करता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला भविष्य के बैंक धोखाधड़ी मामलों में पीएमएलए के प्रभावी उपयोग के लिए एक नज़ीर बन सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

यह सवाल भी उठता है कि 2006-07 के घोटाले का फैसला दो दशक बाद आया — न्यायिक विलंब की यह प्रवृत्ति बैंकिंग धोखाधड़ी मामलों में पीड़ित संस्थाओं के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। पीएमएलए का बढ़ता दायरा और ईडी की सक्रियता निश्चित रूप से निवारक संकेत देती है, लेकिन बैंकिंग तंत्र में आंतरिक नियंत्रण की विफलता का मूल प्रश्न अनुत्तरित रहता है।
RashtraPress
4 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सिंडिकेट बैंक मनी लॉन्ड्रिंग मामले में किसे सजा मिली?
गाजियाबाद की विशेष अदालत ने 3 नवंबर 2026 को वी.एन. माथुर, राजीव कुमार, अरविंद चौधरी, अंकित चौधरी और प्रमोद कुमार — इन पाँचों को पीएमएलए, 2002 की धारा 3 के तहत दोषी ठहराया। प्रत्येक को 3 साल के कठोर कारावास और ₹50,000 जुर्माने की सजा सुनाई गई।
सिंडिकेट बैंक घोटाला क्या था और कैसे हुआ?
2006-07 में सिंडिकेट बैंक की गजरौला शाखा के तत्कालीन प्रबंधक वी.एन. माथुर और सहयोगियों ने फर्जी बिक्री विलेखों, झूठे नॉन-इनकम्ब्रेन्स सर्टिफिकेट और गलत मूल्यांकन रिपोर्टों के आधार पर संबंधित व्यक्तियों और फर्मों को अवैध रूप से ऋण और ओवरड्राफ्ट लिमिट दिलाई। बैंक के मुख्य सतर्कता अधिकारी की शिकायत पर सीबीआई ने एफआईआर दर्ज की थी।
राजीव कुमार और प्रमोद कुमार मुख्य अपराध में बरी होने के बावजूद पीएमएलए में दोषी कैसे?
सीबीआई कोर्ट ने मुख्य आपराधिक मामले में राजीव कुमार और प्रमोद कुमार को बरी कर दिया था। लेकिन ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग के लिए स्वतंत्र साक्ष्य और दस्तावेज पेश किए, जिनके आधार पर गाजियाबाद की विशेष अदालत ने उन्हें पीएमएलए के तहत दोषी ठहराया। पीएमएलए के तहत अपराध को स्वतंत्र रूप से साबित किया जा सकता है।
जुर्माना न भरने पर क्या सजा होगी?
अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई दोषी ₹50,000 का जुर्माना अदा करने में विफल रहता है, तो उसे 3 साल के कठोर कारावास के अतिरिक्त 3 महीने की साधारण जेल की सजा भी काटनी होगी।
इस फैसले का बैंकिंग धोखाधड़ी मामलों पर क्या असर पड़ेगा?
विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला एक महत्वपूर्ण नज़ीर स्थापित करता है — मुख्य अपराध से बरी हुए आरोपी भी ईडी की जाँच में पीएमएलए के तहत दोषी ठहराए जा सकते हैं। इससे बैंकिंग धोखाधड़ी के मामलों में ईडी की जाँच का दायरा और प्रभाव दोनों बढ़ेंगे।
राष्ट्र प्रेस
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