गृह लक्ष्मी बकाया पर तेजस्वी सूर्या का कर्नाटक सरकार पर वार: 'सर्वर नहीं, सरकार की जेब खाली'
सारांश
मुख्य बातें
भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या ने गुरुवार, 5 नवंबर 2026 को गृह लक्ष्मी योजना के तहत फरवरी और मार्च 2025 की किस्तों का भुगतान न होने को लेकर कर्नाटक की कांग्रेस सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि कर्नाटक हाईकोर्ट में सरकार का जवाब उसके विधानसभा में दिए गए पहले के बयान से सीधे विरोधाभासी है।
क्या है पूरा विवाद
बेंगलुरु दक्षिण से सांसद सूर्या ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट करते हुए इस विरोधाभास को उजागर किया। उनके अनुसार, दिसंबर 2025 में तत्कालीन महिला एवं बाल कल्याण मंत्री लक्ष्मी हेब्बालकर ने विधानसभा में गृह लक्ष्मी किस्तों में देरी के लिए तकनीकी गड़बड़ी को ज़िम्मेदार ठहराया था। लेकिन नवंबर 2026 में वही सरकार हाईकोर्ट में वित्तीय बाधाओं का हवाला दे रही है।
सूर्या ने अपनी पोस्ट में लिखा, 'दिसंबर 2025 में तत्कालीन मंत्री लक्ष्मी हेब्बालकर ने विधानसभा में गृह लक्ष्मी के बकाया के लिए तकनीकी गड़बड़ी को दोष दिया था। नवंबर 2026 में उनकी ही सरकार कोर्ट में वित्तीय बाधाओं का हवाला दे रही है, जो उनके बयान से मेल नहीं खाता। सर्वर कभी क्रैश नहीं हुए। राज्य की आर्थिक स्थिति क्रैश हुई। इस बात का और क्या सबूत चाहिए कि यह जीरो-बैलेंस, कंगाल सरकार है।'
हाईकोर्ट में सरकार का रुख
सूर्या ने आर. गंगा और अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से दायर रिट याचिका पर राज्य सरकार की ओर से हाईकोर्ट में दाखिल आपत्तियों का बयान भी साझा किया। इस मामले में प्रधान सचिव, वित्त विभाग, बेंगलुरु और अन्य को प्रतिवादी बनाया गया है।
सरकार ने अपने हलफनामे में स्वीकार किया कि फरवरी और मार्च 2025 की गृह लक्ष्मी किस्तें जारी करने के प्रस्ताव वित्त विभाग को भेजे गए थे, लेकिन वित्तीय बाधाओं के कारण अनुदान जारी नहीं हो सका, जिससे उन दो महीनों की सहायता का भुगतान अटका रहा।
सरकार की दलील — 'कल्याण योजना, कानूनी अधिकार नहीं'
कर्नाटक सरकार ने यह भी तर्क दिया कि याचिकाकर्ता स्वयं इस योजना के लाभार्थी हैं और उन्होंने करीब 1.24 करोड़ नामांकित लाभार्थियों के हित में जनहित याचिका की तरह कोर्ट का रुख किया है। सरकार ने योजना के क्रियान्वयन का बचाव करते हुए कहा कि यह परिवारों की महिला मुखियाओं को वित्तीय सहायता देकर महिलाओं को सशक्त बनाने का एक कल्याणकारी कार्यक्रम है।
हालाँकि, सरकार ने यह भी दलील दी कि किसी कल्याणकारी योजना का अस्तित्व स्वतः ही लाभार्थियों को वैध अपेक्षा के सिद्धांत के आधार पर सहायता मांगने का अटूट अधिकार नहीं देता — विशेषकर जब राज्य वास्तविक वित्तीय बाधाओं के कारण धन जारी करने में असमर्थ हो। इन्हीं आधारों पर सरकार ने रिट याचिका खारिज करने की माँग की।
राजनीतिक पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि यह विवाद 2025 में विधानसभा में हुई गरमागरम बहस की पृष्ठभूमि में सामने आया है, जब भाजपा ने सरकार पर गृह लक्ष्मी के लंबित भुगतानों को लेकर सदन को गुमराह करने का आरोप लगाया था। यह ऐसे समय में आया है जब कर्नाटक सरकार पर 'पाँच गारंटी' योजनाओं को लेकर वित्तीय दबाव की चर्चा लगातार बनी हुई है। आलोचकों का कहना है कि तकनीकी खराबी से वित्तीय संकट तक का सरकारी बयानों का यह बदलाव जवाबदेही के गहरे सवाल उठाता है।
इस मामले में हाईकोर्ट की आगामी सुनवाई तय करेगी कि क्या लाभार्थी कल्याणकारी योजना के तहत किस्त को कानूनी अधिकार के रूप में दावा कर सकते हैं — एक सवाल जिसका जवाब देशभर की राज्य सरकारों के लिए नज़ीर बन सकता है।