5 नवंबर 2026
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तिरुपति लड्डू मिलावट मामला: सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल आंध्र प्रदेश से बाहर करने की याचिका खारिज की

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तिरुपति लड्डू मिलावट मामला: सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल आंध्र प्रदेश से बाहर करने की याचिका खारिज की

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने तिरुपति लड्डू मिलावट ट्रायल को आंध्र प्रदेश से बाहर भेजने से इनकार कर दिया। CJI सूर्यकांत की पीठ ने कहा कि अदालत पहले ही बयानबाज़ी पर रोक लगा चुकी है। सितंबर 2024 से चल रहे इस विवाद में CBI-SIT जनवरी 2026 में आरोपपत्र दाखिल कर चुकी है और ED भी PMLA के तहत जाँच कर रही है।

मुख्य बातें

सुप्रीम कोर्ट ने 5 नवंबर 2026 को तिरुपति लड्डू मिलावट मामले का ट्रायल आंध्र प्रदेश से बाहर स्थानांतरित करने की याचिका खारिज की।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा — पहले का आदेश पहले से ही सभी को बयानबाज़ी से रोकता है।
CBI -नेतृत्व वाली SIT ने 23 जनवरी 2026 को नेल्लोर ACB अदालत में अंतिम आरोपपत्र दाखिल किया था।
प्रयोगशाला जाँच में सूअर की चर्बी नहीं मिली, लेकिन घी में वनस्पति तेल व कृत्रिम एस्टर से मिलावट के साक्ष्य पाए गए।
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने PMLA के तहत वित्तीय अनियमितताओं की जाँच के लिए ECIR दर्ज की है।
विवाद की शुरुआत सितंबर 2024 में CM चंद्रबाबू नायडू के आरोपों से हुई थी; अदालत ने 30 सितंबर 2024 को उन्हें सार्वजनिक बयानबाज़ी पर फटकार भी लगाई थी।

सर्वोच्च न्यायालय ने 5 नवंबर 2026 को तिरुपति मंदिर के प्रसाद लड्डुओं में कथित मिलावट से जुड़े आपराधिक मामले की सुनवाई आंध्र प्रदेश से बाहर स्थानांतरित करने की माँग ठुकरा दी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने स्पष्ट किया कि फिलहाल मुकदमे को किसी अन्य राज्य में भेजने का कोई पर्याप्त आधार उपलब्ध नहीं है।

याचिका और दलीलें

यह आदेश माचिंद्र शांताराम लांके और मेसर्स मालगंगा मिल्क एंड एग्रो प्रोडक्ट्स की ओर से दाखिल आपराधिक स्थानांतरण याचिका पर सुनवाई के दौरान आया। याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने तर्क दिया कि आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण इस मामले पर लगातार राजनीतिक बयानबाज़ी कर रहे हैं, जिससे अभियोजन की निष्पक्षता पर सवाल उठता है। दवे ने माँग की कि मामले को किसी पड़ोसी राज्य में भेजा जाए जहाँ इस विवाद को लेकर वैसा भावनात्मक माहौल नहीं होगा।

पीठ ने इस दलील को अस्वीकार करते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय अपने पिछले आदेश के ज़रिए ही सभी पक्षों को सार्वजनिक बयानबाज़ी से रोक चुका है। अदालत ने यह भी कहा कि यदि भविष्य में ऐसी कोई ठोस समस्या सामने आती है, तो याचिकाकर्ता पुनः न्यायालय का द्वार खटखटा सकते हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद सितंबर 2024 में तब सार्वजनिक हुआ, जब मुख्यमंत्री नायडू ने आरोप लगाया कि पूर्ववर्ती वाईएसआरसीपी सरकार के कार्यकाल में श्री वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर, तिरुपति के प्रसाद लड्डुओं में पशु चर्बी मिलाई गई। इन आरोपों ने देशभर में धार्मिक भावनाओं को झकझोर दिया। 30 सितंबर 2024 को सर्वोच्च न्यायालय ने जाँच जारी रहने के दौरान सार्वजनिक बयान देने पर नायडू को फटकार लगाते हुए टिप्पणी की थी, 'हमें उम्मीद है कि भगवान को राजनीति से दूर रखा जाएगा।'

इसके बाद 4 अक्टूबर 2024 को अदालत ने केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) के निदेशक की निगरानी में एक स्वतंत्र विशेष जाँच दल (SIT) गठित कर जाँच सौंप दी। गौरतलब है कि यह मामला महज एक खाद्य मिलावट विवाद नहीं, बल्कि देश के सबसे धनी और प्रतिष्ठित मंदिरों में से एक की साख से जुड़ा है।

जाँच और आरोपपत्र

सीबीआई-नेतृत्व वाली SIT ने जाँच पूरी करने के बाद 23 जनवरी 2026 को नेल्लोर की भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) अदालत में अंतिम आरोपपत्र दाखिल किया। आरोपपत्र में करनाल स्थित आईसीएआर-राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान की जाँच रिपोर्ट का हवाला दिया गया, जिसमें तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (TTD) द्वारा जुलाई 2024 में टैंकरों से लिए गए घी के चार सीलबंद नमूनों का विश्लेषण किया गया था।

प्रयोगशाला रिपोर्ट के अनुसार, नमूनों में लार्ड (सूअर की चर्बी) या अन्य पशु वसा की मौजूदगी नहीं पाई गई। हालाँकि, जाँचकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि घी में वनस्पति तेलों और प्रयोगशाला में तैयार एस्टर के मिश्रण से मिलावट की गई थी। आरोप है कि यह मिश्रण इस प्रकार तैयार किया गया था कि वह डेयरी उत्पादों के रासायनिक मानकों जैसा प्रतीत हो।

प्रवर्तन निदेशालय की भूमिका

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने भी मामले से जुड़ी कथित वित्तीय अनियमितताओं की जाँच के लिए धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट (ECIR) दर्ज की है। मार्च 2026 में मुख्यमंत्री नायडू ने कथित तौर पर पूर्ववर्ती सरकार पर पुनः आरोप लगाए और कहा कि पिछली सरकार ने मंदिर की प्रतिष्ठा को धूमिल करने की कोशिश की तथा SIT रिपोर्ट को लेकर भ्रामक प्रचार किया।

आगे क्या होगा

सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी कि याचिकाकर्ता भविष्य में पुनः आ सकते हैं, यह संकेत देती है कि अदालत मामले पर नज़र बनाए हुए है। ACB अदालत, नेल्लोर में ट्रायल की प्रक्रिया अब आगे बढ़ेगी। तिरुपति लड्डू विवाद — जो धार्मिक आस्था, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और आपराधिक जाँच के त्रिकोण पर टिका है — न्यायिक प्रक्रिया के ज़रिए अपने निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जब तक अदालत खुद उस पर काबू रखती हो। विडंबना यह है कि जिस मुख्यमंत्री को अदालत ने पहले बयानबाज़ी पर फटकारा, उन्होंने मार्च 2026 में पुनः आरोप लगाए — और याचिकाकर्ताओं को इसी आधार पर ट्रायल स्थानांतरण की उम्मीद थी। लेकिन अदालत ने संकेत दिया कि पुराना आदेश पर्याप्त सुरक्षा-कवच है। असली परीक्षा अब ACB अदालत, नेल्लोर में होगी — जहाँ लड्डू विवाद के राजनीतिक और आपराधिक धागे खुलेंगे, और देश देखेगा कि क्या यह मामला वास्तव में तथ्यों पर टिका है या आरोपों की धुंध में उलझा रहेगा।
RashtraPress
5 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने तिरुपति लड्डू मामला आंध्र प्रदेश से बाहर भेजने से क्यों इनकार किया?
अदालत ने कहा कि स्थानांतरण के लिए पर्याप्त आधार नहीं है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय पहले ही अपने आदेश से सभी पक्षों को सार्वजनिक बयानबाज़ी से रोक चुका है। पीठ ने यह भी कहा कि भविष्य में ठोस समस्या आने पर याचिकाकर्ता पुनः अदालत का रुख कर सकते हैं।
तिरुपति लड्डू मिलावट विवाद क्या है और यह कब शुरू हुआ?
यह विवाद सितंबर 2024 में शुरू हुआ, जब आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने आरोप लगाया कि पूर्ववर्ती YSRCP सरकार के कार्यकाल में तिरुपति मंदिर के लड्डू प्रसाद बनाने में पशु चर्बी युक्त घी इस्तेमाल किया गया। बाद में CBI-नेतृत्व वाली SIT ने जाँच की और जनवरी 2026 में आरोपपत्र दाखिल किया।
CBI-SIT जाँच में क्या पाया गया?
ICAR-राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान, करनाल की रिपोर्ट के अनुसार, घी के नमूनों में सूअर की चर्बी (लार्ड) नहीं मिली। हालाँकि, जाँचकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि घी में वनस्पति तेलों और कृत्रिम एस्टर से मिलावट की गई थी, जिसे डेयरी मानकों जैसा दिखाने के लिए तैयार किया गया था।
इस मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की क्या भूमिका है?
ED ने मामले से जुड़ी कथित वित्तीय अनियमितताओं की जाँच के लिए PMLA के तहत ECIR दर्ज की है। यह जाँच आपराधिक मुकदमे के समानांतर चल रही है।
अब यह मामला कहाँ और कैसे आगे बढ़ेगा?
नेल्लोर की ACB अदालत में ट्रायल प्रक्रिया जारी रहेगी, जहाँ CBI-SIT का आरोपपत्र 23 जनवरी 2026 को दाखिल किया जा चुका है। सर्वोच्च न्यायालय ने संकेत दिया है कि वह मामले पर नज़र बनाए हुए है और ज़रूरत पड़ने पर हस्तक्षेप कर सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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