थुंचन स्मृति: तिरुवनंतपुरम के लोक भवन में 10,000 किताबों वाले नॉलेज हब का उद्घाटन
सारांश
मुख्य बातें
केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने 21 अगस्त 2026 को तिरुवनंतपुरम स्थित लोक भवन में 'थुंचन स्मृति' पब्लिक लाइब्रेरी का उद्घाटन किया — एक ऐसा ज्ञान केंद्र जिसमें 10,000 से अधिक किताबें संग्रहीत हैं। यह लाइब्रेरी मलयालम भाषा और साहित्य के जनक माने जाने वाले थुंचथ रामानुजन एझुथाचन की स्मृति को समर्पित है।
मुख्य घटनाक्रम
लोक भवन के मुख्य प्रवेश द्वार के निकट नई इमारत में स्थापित यह लाइब्रेरी वर्षों से बिखरे पड़े संग्रह को एकीकृत करने का परिणाम है। 4,000 से अधिक मलयालम और लगभग 6,000 अंग्रेज़ी पुस्तकों के साथ-साथ अनेक भारतीय भाषाओं की रचनाएँ भी इस संग्रह में शामिल हैं। साहित्य, इतिहास, संस्कृति, दर्शन और विज्ञान — इन पाँच प्रमुख विषयों में वर्गीकृत इन पुस्तकों को अब व्यवस्थित ढंग से कैटलॉग किया गया है।
राज्यपाल का विज़न
राज्यपाल अर्लेकर ने उद्घाटन के अवसर पर कहा कि उनका लक्ष्य 'थुंचन स्मृति' को एक ऐसे ज्ञान और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित करना है जो केरल की समृद्ध विरासत और विविधता को प्रतिबिंबित करे। उन्होंने स्पष्ट किया कि ये पुस्तकें केवल राजभवन परिसर की शोभा बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि समाज के सक्रिय उपयोग के लिए हैं।
साहित्यिक हस्तियों की प्रतिक्रिया
उद्घाटन समारोह में केरल की कई प्रमुख साहित्यिक और सांस्कृतिक हस्तियाँ उपस्थित रहीं। प्रख्यात निर्देशक अदूर गोपालकृष्णन ने कहा कि एझुथाचन के नाम पर लाइब्रेरी का नामकरण अत्यंत सार्थक है, क्योंकि मलयालम भाषा और साहित्य के इतिहास में उनका स्थान अप्रतिम है। कवि वी. मधुसूदनन नायर ने आशा व्यक्त की कि यह लाइब्रेरी केरल के इतिहास, साहित्य और संस्कृति पर शोध करने वाले विद्वानों और छात्रों के लिए ज्ञान का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र बनेगी।
लेखक जॉर्ज ओनाक्कुर ने कहा कि पठन-पाठन, भाषा और क्षेत्रीय साहित्य के प्रति राज्यपाल की गहरी रुचि इस पहल की प्रमुख प्रेरणा रही है। रोज़मेरी ने इस पर जोड़ा कि पुस्तकों, पठन और साहित्य को एक छत के नीचे लाने की ऐसी कोशिशें अधिक जीवंत सांस्कृतिक स्थानों के निर्माण में सहायक होती हैं।
आम जनता पर असर
यह लाइब्रेरी पाठकों, शोधकर्ताओं, छात्रों, शिक्षकों और लेखकों — सभी के लिए खुली रहेगी। गौरतलब है कि यह संग्रह वर्षों से उपहार और अधिग्रहण के माध्यम से लोक भवन में जमा होता रहा था, परंतु उचित व्यवस्था के अभाव में सार्वजनिक उपयोग से वंचित था। अब इसे एक समर्पित स्थान और व्यवस्थित कैटलॉग के साथ प्रस्तुत किया गया है।
क्या होगा आगे
'थुंचन स्मृति' के ज़रिये लोक भवन ने राज्य की राजधानी में एक नई सांस्कृतिक उपस्थिति दर्ज की है — एक ऐसी जगह जहाँ पुस्तकें, ज्ञान और केरल की सांस्कृतिक स्मृतियाँ एकसाथ जीवित रह सकती हैं। भविष्य में इसे और विस्तार देने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।