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तियानआनमेन नरसंहार 1989: जब चीन ने छात्रों के सामने टैंक उतारे, लोकतंत्र की आवाज़ कुचली

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तियानआनमेन नरसंहार 1989: जब चीन ने छात्रों के सामने टैंक उतारे, लोकतंत्र की आवाज़ कुचली

सारांश

4 जून 1989 की रात बीजिंग के तियानआनमेन चौक पर चीनी सेना ने टैंकों और गोलियों से लोकतंत्र की माँग कुचल दी। छह सप्ताह तक चले शांतिपूर्ण छात्र आंदोलन का अंत खूनी रहा — मौतों का आँकड़ा आज भी रहस्य है, और चीन में यह विषय आज भी ‘प्रतिबंधित’ है।

मुख्य बातें

4 जून 1989 को बीजिंग के तियानआनमेन चौक पर चीनी सेना ने प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई की।
आंदोलन अप्रैल 1989 में शुरू हुआ और क़रीब छह सप्ताह तक शांतिपूर्ण ढंग से चला।
छात्र लोकतांत्रिक सुधार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज़ उठा रहे थे।
सेना ने टैंकों और भारी हथियारों के साथ कार्रवाई की; हज़ारों लोग घायल हुए।
मृतकों की संख्या सैकड़ों से हज़ारों तक बताई जाती है; चीन ने आधिकारिक आँकड़ा कभी जारी नहीं किया।
चीन में आज भी इस घटना पर सार्वजनिक चर्चा और इंटरनेट सामग्री पर कड़े प्रतिबंध हैं।

4 जून 1989 की तारीख आधुनिक चीन के इतिहास की सबसे रक्तरंजित रातों में गिनी जाती है। इसी दिन बीजिंग के ऐतिहासिक तियानआनमेन चौक पर लोकतांत्रिक सुधारों की माँग कर रहे हज़ारों निहत्थे छात्रों और नागरिकों पर चीनी सेना ने टैंकों और भारी हथियारों के साथ कार्रवाई की, जिसे दुनिया आज ‘तियानआनमेन स्क्वायर नरसंहार’ के नाम से जानती है।

आंदोलन की शुरुआत और माँगें

वर्ष 1989 में चीन के हज़ारों छात्र और आम नागरिक लोकतांत्रिक सुधारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बढ़ते भ्रष्टाचार के खिलाफ़ सड़कों पर उतरे। अप्रैल महीने से शुरू हुआ यह आंदोलन धीरे-धीरे एक विशाल जनआंदोलन में तब्दील हो गया और लाखों लोग तियानआनमेन चौक पर जुटने लगे।

प्रदर्शनकारियों का मक़सद सरकार को उखाड़ फेंकना नहीं था। वे राजनीतिक सुधार, पारदर्शिता और अधिक नागरिक स्वतंत्रता की माँग कर रहे थे। उस दौर में चीन आर्थिक खुलेपन की राह पर तो था, लेकिन राजनीतिक स्वतंत्रता अब भी सीमित थी। बढ़ती महंगाई, कम वेतन और व्यापक भ्रष्टाचार ने इस असंतोष को और हवा दी।

शांतिपूर्ण धरना और मार्शल लॉ

क़रीब छह सप्ताह तक यह आंदोलन शांतिपूर्ण ढंग से चलता रहा। प्रदर्शनकारी धरने पर बैठे रहे, भाषण हुए और लोग सरकार से बातचीत की उम्मीद लगाए रहे। लेकिन तत्कालीन चीनी नेतृत्व ने इस आंदोलन को अपने एकदलीय शासन के लिए सीधी चुनौती के रूप में देखा। इसके बाद राजधानी बीजिंग में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया।

3-4 जून की वो काली रात

3 जून 1989 की रात और 4 जून की सुबह हालात अचानक बदल गए। चीनी सेना को आंदोलन को हर हाल में ख़त्म करने के आदेश दिए गए। सैनिक टैंकों और भारी हथियारों के साथ तियानआनमेन चौक और उसके आसपास की सड़कों पर पहुँच गए।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, सेना ने निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी की। कथित तौर पर कई छात्र और सामान्य नागरिक मारे गए, जबकि हज़ारों लोग घायल हुए। टैंक के सामने खड़े एक अकेले व्यक्ति की तस्वीर — जिसे दुनिया ‘टैंक मैन’ के नाम से जानती है — आज भी लोकतांत्रिक प्रतिरोध का वैश्विक प्रतीक मानी जाती है।

मौतों का आँकड़ा आज भी रहस्य

इस घटना में कितने लोगों की जान गई, इसका प्रामाणिक आँकड़ा आज भी स्पष्ट नहीं है। चीन सरकार ने कभी आधिकारिक रूप से विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की। अलग-अलग स्रोतों के अनुसार मृतकों की संख्या सैकड़ों से लेकर हज़ारों तक बताई जाती है। यही वजह है कि यह घटना तीन दशक से अधिक समय बाद भी विवाद और बहस का विषय बनी हुई है।

आज भी ‘प्रतिबंधित’ है यह विषय

चीन में इस विषय पर खुलकर चर्चा करना आज भी आसान नहीं है। वहाँ मीडिया रिपोर्टिंग, सार्वजनिक कार्यक्रमों और इंटरनेट पर इस घटना से जुड़ी सामग्री पर कड़े नियंत्रण लागू हैं। बीजिंग प्रशासन इस विषय को बेहद संवेदनशील मानता है और इसके सार्वजनिक उल्लेख को सीमित करता है। आलोचकों का कहना है कि इतिहास के इस अध्याय पर पर्दा डालने की कोशिशों के बावजूद, हर साल 4 जून को दुनिया भर में लोकतंत्र समर्थक इसे याद करते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि एक जीवित राजनीतिक प्रश्न है — कि क्या आर्थिक उदय के बावजूद एकदलीय व्यवस्था अपने ही नागरिकों के असहमति-अधिकार को बर्दाश्त कर सकती है। तीन दशक से अधिक बाद भी मौतों का आँकड़ा सार्वजनिक न होना अपने आप में राज्य की पारदर्शिता पर सबसे बड़ी टिप्पणी है। ‘टैंक मैन’ की तस्वीर वैश्विक स्मृति में ज़िंदा है, जबकि चीन के भीतर वह ‘मिटा दी गई स्मृति’ है — और यही विरोधाभास बीजिंग की सॉफ्ट पावर की सबसे कमज़ोर कड़ी बना हुआ है।
RashtraPress
21 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तियानआनमेन स्क्वायर नरसंहार क्या है?
यह 3-4 जून 1989 को बीजिंग के तियानआनमेन चौक पर चीनी सेना द्वारा लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनकारियों पर की गई सशस्त्र कार्रवाई है। सेना ने टैंकों और भारी हथियारों के साथ निहत्थे छात्रों व नागरिकों पर गोलियाँ चलाईं, जिसमें कथित तौर पर सैकड़ों से हज़ारों लोग मारे गए।
तियानआनमेन चौक पर प्रदर्शन क्यों हुए थे?
अप्रैल 1989 में शुरू हुए इन प्रदर्शनों के पीछे लोकतांत्रिक सुधार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, पारदर्शिता और बढ़ते भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनाक्रोश था। बढ़ती महंगाई और कम वेतन से परेशान आम जनता भी इस आंदोलन से जुड़ गई थी।
तियानआनमेन नरसंहार में कितने लोग मारे गए थे?
मृतकों की सही संख्या आज भी स्पष्ट नहीं है क्योंकि चीन सरकार ने कभी आधिकारिक आँकड़ा सार्वजनिक नहीं किया। अलग-अलग स्रोतों के अनुसार यह संख्या सैकड़ों से लेकर हज़ारों तक बताई जाती है।
क्या चीन में आज भी तियानआनमेन पर चर्चा प्रतिबंधित है?
हाँ, चीन में आज भी इस विषय पर सार्वजनिक चर्चा बेहद सीमित है। मीडिया रिपोर्टिंग, सार्वजनिक आयोजनों और इंटरनेट पर इससे जुड़ी सामग्री पर कड़े नियंत्रण लागू हैं और सरकार इसे संवेदनशील विषय मानती है।
राष्ट्र प्रेस
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