यूएई फिर बना भारत का नंबर 1 एलपीजी सप्लायर, सितंबर में 39% हिस्सेदारी; अमेरिका 23% पर फिसला
सारांश
मुख्य बातें
संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने सितंबर 2026 में एक बार फिर भारत के सबसे बड़े एलपीजी आपूर्तिकर्ता का दर्जा हासिल कर लिया है, जो पिछले छह महीनों से अमेरिका के पास था। समुद्री खुफिया फर्म केप्लर द्वारा संकलित आँकड़ों के अनुसार, सितंबर में भारत के कुल एलपीजी आयात में यूएई की हिस्सेदारी 39 प्रतिशत रही, जो अगस्त में महज 13 प्रतिशत थी। यह बदलाव ऐसे समय में आया है जब मध्य पूर्व में चल रहे संघर्ष के बीच हॉर्मुज जलडमरूमध्य से ऊर्जा प्रवाह धीरे धीरे सामान्य होने की ओर बढ़ रहा है।
आँकड़े क्या कहते हैं
केप्लर के आँकड़ों के अनुसार, यूएई ने सितंबर में भारत को 5,47,000 टन एलपीजी की आपूर्ति की — जो अगस्त के 1,93,000 टन की तुलना में 182 प्रतिशत की उछाल है। दूसरी ओर, अमेरिका का शिपमेंट अगस्त के 3,23,000 टन से 58 प्रतिशत गिरकर सितंबर में घट गया, और कुल आयात में उसकी हिस्सेदारी 53 प्रतिशत से सिमटकर 23 प्रतिशत पर आ गई।
कुवैत तीसरा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता रहा, जबकि कतर चौथे स्थान पर रहा। कुल मिलाकर, सितंबर में भारत का एलपीजी आयात अगस्त की तुलना में 4 प्रतिशत घटकर 13.9 लाख टन रह गया।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य की वापसी
गौरतलब है कि भारत अपनी एलपीजी ज़रूरत का 60 प्रतिशत आयात करता है, और उसमें से 90 प्रतिशत पहले हॉर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते खाड़ी देशों से आता था। अमेरिका इज़रायल और ईरान के बीच युद्ध के कारण इस जलमार्ग के प्रभावी रूप से बंद हो जाने के करीब सात महीने बाद, केप्लर के अनुसार सितंबर के अंतिम सप्ताह में मध्य पूर्व से दैनिक तेल प्रवाह अपने युद्ध पूर्व स्तर के 92 प्रतिशत तक पहुँच गया।
केप्लर ने कहा, "भौतिक बाजार ने अनुमान से अधिक लचीलापन दिखाया है। खाड़ी से बाहर निकलने वाली संयुक्त कच्चे तेल की मात्रा (ईरान को छोड़कर) और सऊदी अरब के पश्चिमी तट तथा यूएई के पूर्वी तट से आने वाली मात्रा लगभग संघर्ष पूर्व स्तर 1.85 करोड़ बैरल प्रतिदिन के आसपास है — और डायवर्ट की गई मात्रा को शामिल करें तो यह अब लगभग 100 प्रतिशत है।"
आपूर्ति बहाली की वजह
विश्लेषकों के अनुसार, तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के प्रवाह में वापसी का श्रेय कई कारकों को दिया जा सकता है। अमेरिकी सैन्य सहायता के साथ जहाजों को एस्कॉर्ट किया जा रहा है, और स्ट्रेट के माध्यम से शटल सुपर टैंकर का उपयोग हो रहा है, जो कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों को पास में इंतजार कर रहे अन्य जहाजों में स्थानांतरित करते हैं। इसके अतिरिक्त, खाड़ी देश हॉर्मुज को बायपास करने के लिए पाइपलाइनों का भी उपयोग कर रहे हैं।
भारत के लिए क्या मायने रखता है
यह बदलाव भारत की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति के लिहाज़ से महत्वपूर्ण है। जब हॉर्मुज बाधित हुआ था, तब भारत ने अमेरिकी एलपीजी पर निर्भरता बढ़ाकर आपूर्ति शृंखला को स्थिर रखा था — एक ऐसा कदम जो घरेलू रसोई गैस की उपलब्धता पर तत्काल असर पड़ने से रोकने में सफल रहा। खाड़ी आपूर्ति के सामान्य होने से भारत को एक बार फिर भौगोलिक रूप से नज़दीक और तुलनात्मक रूप से किफायती स्रोतों पर लौटने का विकल्प मिल रहा है। आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि क्या मध्य पूर्व में स्थिरता टिकाऊ रहती है और भारत की आयात संरचना किस दिशा में जाती है।