10 अगस्त 2026
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पश्चिम एशिया संघर्ष में भारत ने एलपीजी आयात के स्रोत बदले, तेल कंपनियों को ₹22,000 करोड़ का नुकसान

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पश्चिम एशिया संघर्ष में भारत ने एलपीजी आयात के स्रोत बदले, तेल कंपनियों को ₹22,000 करोड़ का नुकसान

सारांश

पश्चिम एशिया संघर्ष ने भारत की एलपीजी आपूर्ति श्रृंखला को हिला दिया — खाड़ी पर 90% निर्भरता घटाकर अमेरिका को एक-तिहाई हिस्सेदारी मिली, लेकिन कीमत चुकाई सरकारी तेल कंपनियों ने: मात्र तीन महीनों में ₹22,000 करोड़ की अंडर-रिकवरी।

मुख्य बातें

पश्चिम एशिया संघर्ष के बाद भारत ने एलपीजी की 90% खाड़ी-निर्भरता कम करते हुए अमेरिका, ईरान, अर्जेंटीना, चिली, फ्रांस और नीदरलैंड से आयात बढ़ाया।
अप्रैल 2026 तक अमेरिका की हिस्सेदारी 8% (फरवरी) से बढ़कर लगभग एक-तिहाई हो गई; यह 2025 के 22 लाख टन/वर्ष के द्विपक्षीय समझौते से संभव हुआ।
सऊदी अरामको कॉन्ट्रैक्ट प्राइस फरवरी से जून 2026 के बीच 46% बढ़ी; एलपीजी खपत फरवरी के 32 लाख टन से घटकर अप्रैल में 24.7 लाख टन रह गई।
मई 2026 में मांग सालाना आधार पर 20% गिरी; वाणिज्यिक सिलेंडर (19 किग्रा) में 79% से अधिक मूल्य वृद्धि हुई।
सरकारी तेल कंपनियों को मार्च-मई 2026 के बीच कुल ₹22,000 करोड़ की अंडर-रिकवरी; दिल्ली में घरेलू सिलेंडर पर नुकसान ₹651 प्रति सिलेंडर तक पहुँचा।

पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक संघर्ष के बीच भारत ने अपनी तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) आपूर्ति श्रृंखला में बड़ा बदलाव करते हुए अमेरिका, ईरान, अर्जेंटीना, चिली, फ्रांस और नीदरलैंड से खरीद बढ़ाई, ताकि खाड़ी क्षेत्र पर ऐतिहासिक निर्भरता कम की जा सके। क्रिसिल की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस रणनीतिक विविधीकरण से आपूर्ति सुरक्षा तो बनी रही, लेकिन बढ़ी हुई परिवहन लागत और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उछाल के कारण सरकारी तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) को मार्च से मई 2026 के बीच कुल ₹22,000 करोड़ की अंडर-रिकवरी झेलनी पड़ी।

आयात संरचना में बड़ा बदलाव

परंपरागत रूप से भारत अपनी एलपीजी जरूरतों का लगभग 90 प्रतिशत पश्चिम एशियाई देशों से पूरा करता रहा है। लेकिन संघर्ष के कारण आपूर्ति बाधित होने के बाद यह तस्वीर तेज़ी से बदली। अप्रैल 2026 तक अमेरिका भारत के कुल एलपीजी आयात में लगभग एक-तिहाई हिस्सेदारी के साथ प्रमुख आपूर्तिकर्ता बन गया, जबकि फरवरी 2026 में उसकी हिस्सेदारी मात्र 8 प्रतिशत थी।

यह बदलाव 2025 के अंत में हुए उस द्विपक्षीय समझौते की वजह से संभव हुआ जिसके तहत भारत को अमेरिका से 22 लाख टन प्रति वर्ष एलपीजी की आपूर्ति तय की गई — जो भारत की सालाना आयात जरूरतों का लगभग 10 प्रतिशत है। इसके अलावा ईरान भी आयात सूची में वापस लौटा और अप्रैल में उसकी हिस्सेदारी लगभग 6 प्रतिशत रही।

घरेलू खपत पर असर

आपूर्ति बाधा और ऊँची कीमतों का सीधा असर घरेलू मांग पर पड़ा। फरवरी 2026 में भारत की एलपीजी खपत 32 लाख टन थी, जो अप्रैल 2026 में घटकर 24.7 लाख टन रह गई। मार्च और अप्रैल में मांग सालाना आधार पर 13 प्रतिशत कम हुई, जबकि मई में यह गिरावट 20 प्रतिशत तक पहुँच गई।

गौरतलब है कि वित्त वर्ष 2025-26 में रिकॉर्ड 3.32 करोड़ टन एलपीजी खपत दर्ज की गई थी — सालाना 6 प्रतिशत की वृद्धि — लेकिन इसके तुरंत बाद के महीनों में मांग में तीव्र गिरावट आई।

वाणिज्यिक और घरेलू उपभोक्ताओं पर अलग-अलग असर

क्रिसिल की रिपोर्ट के अनुसार, वाणिज्यिक और औद्योगिक उपभोक्ता सबसे अधिक प्रभावित हुए क्योंकि उन्हें बाज़ार-आधारित कीमतें चुकानी पड़ीं। दिल्ली में 19 किलोग्राम वाले वाणिज्यिक सिलेंडर की कीमत में 79 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई।

दूसरी ओर, घरेलू उपभोक्ताओं की मांग अपेक्षाकृत स्थिर रही क्योंकि 14.2 किलोग्राम वाले घरेलू सिलेंडर की कीमत इस पूरी अवधि में केवल लगभग 10 प्रतिशत बढ़ाई गई। यह मूल्य नियंत्रण ही ओएमसी के भारी घाटे की मुख्य वजह बना।

तेल कंपनियों को भारी अंडर-रिकवरी

भारतीय आयात के लिए मानक मानी जाने वाली सऊदी अरामको कॉन्ट्रैक्ट प्राइस फरवरी से जून 2026 के बीच 46 प्रतिशत बढ़ गई — आपूर्ति बाधा की आशंका और बढ़ी मालभाड़ा लागत के कारण। इसके बावजूद घरेलू कीमतें सीमित रखने से खरीद लागत और खुदरा बिक्री मूल्य के बीच की खाई चौड़ी होती गई।

क्रिसिल के अनुमान के अनुसार, मई 2026 में दिल्ली में घरेलू एलपीजी सिलेंडर पर अंडर-रिकवरी ₹651 प्रति सिलेंडर तक पहुँच गई। कुल मिलाकर सरकारी तेल कंपनियों को मार्च से मई 2026 के बीच ₹22,000 करोड़ का नुकसान उठाना पड़ा।

आगे क्या होगा

यह ऐसे समय में आया है जब सरकार एलपीजी सब्सिडी नीति की समीक्षा कर रही है और ओएमसी की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबा खिंचा, तो घरेलू सिलेंडर कीमतों में और बढ़ोतरी या सरकारी सब्सिडी में इज़ाफे का फैसला अपरिहार्य हो सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि ₹22,000 करोड़ की अंडर-रिकवरी का बोझ आखिरकार कौन उठाएगा — उपभोक्ता, करदाता, या ओएमसी की बैलेंस शीट। घरेलू सिलेंडर पर केवल 10% मूल्य वृद्धि राजनीतिक दृष्टि से सुविधाजनक थी, लेकिन इसने सरकारी कंपनियों को तीन महीनों में ₹651 प्रति सिलेंडर के घाटे में धकेल दिया। यह वही पुरानी दुविधा है — ऊर्जा सुरक्षा बनाम ऊर्जा सामर्थ्य — जिसका कोई स्थायी हल बिना मूल्य-सुधार के संभव नहीं है।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पश्चिम एशिया संघर्ष के दौरान भारत ने एलपीजी आयात में क्या बदलाव किए?
भारत ने खाड़ी देशों पर अपनी पारंपरिक 90% निर्भरता घटाते हुए अमेरिका, ईरान, अर्जेंटीना, चिली, फ्रांस और नीदरलैंड से एलपीजी आयात बढ़ाया। अप्रैल 2026 तक अमेरिका की हिस्सेदारी फरवरी के 8% से बढ़कर लगभग एक-तिहाई हो गई।
भारत-अमेरिका एलपीजी आपूर्ति समझौता क्या है?
2025 के अंत में हुए इस समझौते के तहत अमेरिका भारत को 22 लाख टन प्रति वर्ष एलपीजी की आपूर्ति करेगा, जो भारत की सालाना आयात जरूरतों का लगभग 10% है। इसी समझौते ने संघर्ष के दौरान आपूर्ति विविधीकरण को तेज़ी से संभव बनाया।
तेल विपणन कंपनियों को ₹22,000 करोड़ का नुकसान क्यों हुआ?
क्रिसिल के अनुसार, सऊदी अरामको कॉन्ट्रैक्ट प्राइस फरवरी से जून 2026 के बीच 46% बढ़ी, लेकिन घरेलू सिलेंडर की कीमत केवल 10% बढ़ाई गई। इस अंतर के कारण मई 2026 में दिल्ली में अंडर-रिकवरी ₹651 प्रति सिलेंडर तक पहुँची और मार्च-मई के बीच कुल नुकसान ₹22,000 करोड़ रहा।
संघर्ष के दौरान भारत में एलपीजी की खपत कितनी घटी?
फरवरी 2026 में 32 लाख टन रही खपत अप्रैल 2026 में घटकर 24.7 लाख टन रह गई। मार्च-अप्रैल में मांग सालाना आधार पर 13% और मई में 20% कम हुई।
वाणिज्यिक और घरेलू एलपीजी उपभोक्ताओं पर क्या फर्क पड़ा?
वाणिज्यिक उपभोक्ताओं को 19 किग्रा सिलेंडर पर 79% से अधिक मूल्य वृद्धि झेलनी पड़ी, जबकि घरेलू उपभोक्ताओं के 14.2 किग्रा सिलेंडर की कीमत केवल लगभग 10% बढ़ी। इस अंतर के कारण घरेलू मांग अपेक्षाकृत स्थिर रही, लेकिन ओएमसी का घाटा बढ़ता गया।
राष्ट्र प्रेस
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