पश्चिम एशिया संघर्ष में भारत ने एलपीजी आयात के स्रोत बदले, तेल कंपनियों को ₹22,000 करोड़ का नुकसान
सारांश
मुख्य बातें
पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक संघर्ष के बीच भारत ने अपनी तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) आपूर्ति श्रृंखला में बड़ा बदलाव करते हुए अमेरिका, ईरान, अर्जेंटीना, चिली, फ्रांस और नीदरलैंड से खरीद बढ़ाई, ताकि खाड़ी क्षेत्र पर ऐतिहासिक निर्भरता कम की जा सके। क्रिसिल की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस रणनीतिक विविधीकरण से आपूर्ति सुरक्षा तो बनी रही, लेकिन बढ़ी हुई परिवहन लागत और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उछाल के कारण सरकारी तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) को मार्च से मई 2026 के बीच कुल ₹22,000 करोड़ की अंडर-रिकवरी झेलनी पड़ी।
आयात संरचना में बड़ा बदलाव
परंपरागत रूप से भारत अपनी एलपीजी जरूरतों का लगभग 90 प्रतिशत पश्चिम एशियाई देशों से पूरा करता रहा है। लेकिन संघर्ष के कारण आपूर्ति बाधित होने के बाद यह तस्वीर तेज़ी से बदली। अप्रैल 2026 तक अमेरिका भारत के कुल एलपीजी आयात में लगभग एक-तिहाई हिस्सेदारी के साथ प्रमुख आपूर्तिकर्ता बन गया, जबकि फरवरी 2026 में उसकी हिस्सेदारी मात्र 8 प्रतिशत थी।
यह बदलाव 2025 के अंत में हुए उस द्विपक्षीय समझौते की वजह से संभव हुआ जिसके तहत भारत को अमेरिका से 22 लाख टन प्रति वर्ष एलपीजी की आपूर्ति तय की गई — जो भारत की सालाना आयात जरूरतों का लगभग 10 प्रतिशत है। इसके अलावा ईरान भी आयात सूची में वापस लौटा और अप्रैल में उसकी हिस्सेदारी लगभग 6 प्रतिशत रही।
घरेलू खपत पर असर
आपूर्ति बाधा और ऊँची कीमतों का सीधा असर घरेलू मांग पर पड़ा। फरवरी 2026 में भारत की एलपीजी खपत 32 लाख टन थी, जो अप्रैल 2026 में घटकर 24.7 लाख टन रह गई। मार्च और अप्रैल में मांग सालाना आधार पर 13 प्रतिशत कम हुई, जबकि मई में यह गिरावट 20 प्रतिशत तक पहुँच गई।
गौरतलब है कि वित्त वर्ष 2025-26 में रिकॉर्ड 3.32 करोड़ टन एलपीजी खपत दर्ज की गई थी — सालाना 6 प्रतिशत की वृद्धि — लेकिन इसके तुरंत बाद के महीनों में मांग में तीव्र गिरावट आई।
वाणिज्यिक और घरेलू उपभोक्ताओं पर अलग-अलग असर
क्रिसिल की रिपोर्ट के अनुसार, वाणिज्यिक और औद्योगिक उपभोक्ता सबसे अधिक प्रभावित हुए क्योंकि उन्हें बाज़ार-आधारित कीमतें चुकानी पड़ीं। दिल्ली में 19 किलोग्राम वाले वाणिज्यिक सिलेंडर की कीमत में 79 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई।
दूसरी ओर, घरेलू उपभोक्ताओं की मांग अपेक्षाकृत स्थिर रही क्योंकि 14.2 किलोग्राम वाले घरेलू सिलेंडर की कीमत इस पूरी अवधि में केवल लगभग 10 प्रतिशत बढ़ाई गई। यह मूल्य नियंत्रण ही ओएमसी के भारी घाटे की मुख्य वजह बना।
तेल कंपनियों को भारी अंडर-रिकवरी
भारतीय आयात के लिए मानक मानी जाने वाली सऊदी अरामको कॉन्ट्रैक्ट प्राइस फरवरी से जून 2026 के बीच 46 प्रतिशत बढ़ गई — आपूर्ति बाधा की आशंका और बढ़ी मालभाड़ा लागत के कारण। इसके बावजूद घरेलू कीमतें सीमित रखने से खरीद लागत और खुदरा बिक्री मूल्य के बीच की खाई चौड़ी होती गई।
क्रिसिल के अनुमान के अनुसार, मई 2026 में दिल्ली में घरेलू एलपीजी सिलेंडर पर अंडर-रिकवरी ₹651 प्रति सिलेंडर तक पहुँच गई। कुल मिलाकर सरकारी तेल कंपनियों को मार्च से मई 2026 के बीच ₹22,000 करोड़ का नुकसान उठाना पड़ा।
आगे क्या होगा
यह ऐसे समय में आया है जब सरकार एलपीजी सब्सिडी नीति की समीक्षा कर रही है और ओएमसी की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबा खिंचा, तो घरेलू सिलेंडर कीमतों में और बढ़ोतरी या सरकारी सब्सिडी में इज़ाफे का फैसला अपरिहार्य हो सकता है।