16 सितंबर 2026
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यूसीसी पर मौलाना अरशद मदनी का केंद्र पर हमला: 'देश संविधान से चलेगा या किसी दल के एजेंडे से?'

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यूसीसी पर मौलाना अरशद मदनी का केंद्र पर हमला: 'देश संविधान से चलेगा या किसी दल के एजेंडे से?'

सारांश

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने एक्स पर पूछा — 'देश संविधान से चलेगा या किसी दल के एजेंडे से?' अमित शाह के 2029 तक एनडीए राज्यों में यूसीसी लागू करने के ऐलान के बाद यह तीखी प्रतिक्रिया है। उत्तराखंड हाईकोर्ट में कपिल सिब्बल के ज़रिए कानूनी लड़ाई भी जारी है।

मुख्य बातें

मौलाना अरशद मदनी ने 16 सितंबर 2026 को एक्स पर यूसीसी को लेकर केंद्र सरकार पर कड़ा हमला बोला।
गृह मंत्री अमित शाह के 2029 तक एनडीए राज्यों में यूसीसी लागू करने के ऐलान को उन्होंने संवैधानिक चुनौती बताया।
जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने उत्तराखंड हाईकोर्ट में याचिका दायर की है; अब तक छह सुनवाई हो चुकी हैं।
जमीयत की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल अदालत में पेश हुए हैं।
मदनी ने संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 का हवाला देते हुए अनुसूचित जनजातियों को मिली छूट और मुसलमानों के साथ व्यवहार में भेदभाव का सवाल उठाया।
उन्होंने कहा कि मुस्लिम पारिवारिक कानून कुरआन और हदीस से लिए गए हैं, मानव-निर्मित कानून नहीं।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने 16 सितंबर 2026 को समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर केंद्र सरकार पर कड़ा हमला बोला। उन्होंने गृह मंत्री अमित शाह के उस ऐलान पर सीधे सवाल उठाए, जिसमें कहा गया था कि 2029 से पहले एनडीए शासित सभी राज्यों में यूसीसी लागू कर दी जाएगी।

एक्स पर उठाया बुनियादी सवाल

मदनी ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा कि अमित शाह का यह ऐलान एक बुनियादी प्रश्न खड़ा करता है — 'देश संविधान से चलेगा या किसी राजनीतिक दल के वैचारिक एजेंडे से?' उनके अनुसार, समान नागरिक संहिता लागू करना संविधान की सर्वोच्चता और नागरिकों को प्राप्त धार्मिक स्वतंत्रता को समाप्त करने की एक सुनियोजित कोशिश है।

गौरतलब है कि यह बयान ऐसे समय में आया है जब उत्तराखंड में यूसीसी पहले ही लागू हो चुकी है और अन्य एनडीए-शासित राज्यों में भी इसे विस्तारित करने की चर्चाएँ तेज़ हो रही हैं।

उत्तराखंड हाईकोर्ट में कानूनी लड़ाई

मदनी ने बताया कि जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने यूसीसी के विरुद्ध उत्तराखंड हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है और अब तक छह सुनवाई हो चुकी हैं। संगठन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल सहित अन्य वकील अदालत में पेश हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका से न्याय मिलने की उम्मीद है।

धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों का तर्क

मदनी ने स्पष्ट किया कि वे शरीयत के विरुद्ध कोई भी कानून स्वीकार नहीं कर सकते। उनके शब्दों में, 'मुसलमान हर चीज़ से समझौता कर सकता है लेकिन अपने धर्म और दीन से हरगिज़ कोई समझौता नहीं कर सकता।' उन्होंने रेखांकित किया कि यह सवाल मुसलमानों के अस्तित्व का नहीं, बल्कि उनके संवैधानिक और धार्मिक अधिकारों का है।

उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 का हवाला देते हुए कहा कि जब अनुसूचित जनजातियों को यूसीसी से संवैधानिक प्रावधानों के तहत छूट दी जा सकती है, तो मुसलमानों को मिली धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान क्यों नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार, 'यूसीसी के नाम पर यह भेदभाव क्यों?'

मदनी ने यह भी कहा कि मुस्लिम पारिवारिक कानून मनुष्यों द्वारा नहीं, बल्कि कुरआन मजीद और हदीस से लिए गए हैं। जो नागरिक किसी धार्मिक पर्सनल लॉ के तहत मामलों का संचालन नहीं करना चाहते, उनके लिए देश में वैकल्पिक नागरिक कानून पहले से मौजूद हैं — इसलिए अनिवार्य यूसीसी की आवश्यकता ही नहीं है।

'एक देश, एक कानून' के नारे पर पलटवार

सरकार के 'एक देश, एक कानून' के नारे को मदनी ने सैद्धांतिक रूप से अस्वीकार किया। उन्होंने कहा कि भारत का खुद का कानूनी ढाँचा विभिन्न राज्यों में अनेक मामलों में अलग-अलग कानूनों की अनुमति देता है — गोहत्या से संबंधित कानून भी पूरे देश में एकसमान नहीं हैं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि जमीयत उलेमा-ए-हिंद की पुरानी माँग है कि गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा देकर पूरे देश में उसकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।

आगे क्या होगा

यूसीसी पर कानूनी और राजनीतिक बहस आने वाले महीनों में और तेज़ होने की संभावना है। उत्तराखंड हाईकोर्ट में अगली सुनवाई की तारीख़ की प्रतीक्षा है, जबकि विपक्षी दल और विभिन्न धार्मिक संगठन इस मुद्दे को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में रखने की कोशिश जारी रखेंगे। सरकार ने अभी तक मदनी की इस विशेष प्रतिक्रिया पर कोई टिप्पणी नहीं की है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि संविधान की मूल भावना का प्रश्न बना रहे हैं। अनुसूचित जनजातियों को छूट और मुसलमानों से अपेक्षित अनुपालन के बीच के अंतर पर उनका तर्क संवैधानिक रूप से उल्लेखनीय है, जिसे मुख्यधारा की कवरेज अक्सर नज़रअंदाज़ कर देती है। दूसरी ओर, सरकार के लिए असली परीक्षा यह है कि वह यूसीसी को 'धार्मिक हस्तक्षेप' से अलग 'नागरिक समानता' के रूप में स्थापित करे — एक ऐसा कथानक जो अब तक अदालत और जनता के बीच पर्याप्त रूप से नहीं रखा गया है। यह विवाद 2029 की राजनीतिक समय-सीमा से पहले और गहरा होगा।
RashtraPress
16 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मौलाना अरशद मदनी ने यूसीसी पर क्या कहा?
मौलाना अरशद मदनी ने एक्स पर लिखा कि गृह मंत्री अमित शाह का यूसीसी ऐलान यह बुनियादी सवाल खड़ा करता है कि देश संविधान से चलेगा या किसी राजनीतिक दल के वैचारिक एजेंडे से। उन्होंने यूसीसी को संविधान की सर्वोच्चता और धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला बताया।
जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने यूसीसी के खिलाफ कहाँ याचिका दायर की है?
जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने यूसीसी के विरुद्ध उत्तराखंड हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। अब तक छह सुनवाई हो चुकी हैं और संगठन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल सहित अन्य वकील अदालत में पेश हुए हैं।
अमित शाह ने यूसीसी को लेकर क्या ऐलान किया था?
गृह मंत्री अमित शाह ने ऐलान किया था कि 2029 से पहले एनडीए शासित सभी राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू कर दी जाएगी। यही ऐलान मदनी की इस तीखी प्रतिक्रिया का तात्कालिक कारण बना।
मदनी ने अनुसूचित जनजातियों की छूट का सवाल क्यों उठाया?
मदनी ने तर्क दिया कि यदि संविधान के प्रावधानों के तहत अनुसूचित जनजातियों को यूसीसी से छूट दी जा सकती है, तो संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत मुसलमानों को मिली धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान क्यों नहीं किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, यह यूसीसी के नाम पर भेदभाव है।
क्या यूसीसी पहले से किसी राज्य में लागू है?
हाँ, उत्तराखंड में यूसीसी पहले से लागू है और इसी कानून को जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने उत्तराखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी है। सरकार इसे अन्य एनडीए-शासित राज्यों में 2029 से पहले विस्तारित करने की योजना बना रही है।
राष्ट्र प्रेस
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