यूसीसी पर मुस्लिम धर्मगुरुओं का विरोध: 'शरीयत में हस्तक्षेप काबिल-ए-कबूल नहीं'
सारांश
मुख्य बातें
समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर देश में विमर्श तेज़ हो गया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इस ऐलान के बाद कि भाजपा शासित राज्यों में 2029 से पहले 21 राज्यों में यूसीसी लागू किया जाएगा, प्रमुख मुस्लिम धर्मगुरुओं ने 15 सितंबर 2026 को बरेली से खुलकर इसका विरोध दर्ज कराया है। उनका स्पष्ट कहना है कि यूसीसी शरीयत में अस्वीकार्य हस्तक्षेप है।
मौलाना रजवी बरेलवी का रुख
मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने मंत्री भूपेंद्र चौधरी के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि 'जहाँ तक समान नागरिक संहिता की बात है, भारत के मुसलमानों ने बहुत पहले ही अपना नज़रिया स्पष्ट कर दिया है कि यह शरीयत में हस्तक्षेप है।' उन्होंने आगे कहा, 'शरीयत में किसी भी तरह का हस्तक्षेप मुसलमानों के लिए काबिल-ए-कबूल नहीं है।' उनके अनुसार, हर दल अपनी पार्टी लाइन के अनुरूप बयान देता है, किंतु मुसलमानों का रुख इस विषय पर पहले से तय है।
मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली की दलील
मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने संवैधानिक पृष्ठभूमि का हवाला देते हुए कहा कि 'हमारा मानना है कि यूसीसी मुल्क के लिए फायदेमंद नहीं है।' उन्होंने तर्क दिया कि जब संविधान बना, तब भी यूसीसी को उसका अभिन्न हिस्सा नहीं बनाया गया, क्योंकि संविधान निर्माताओं को पता था कि भारत में 'हर सौ-दो सौ किलोमीटर पर संस्कृति, भाषा और रहन-सहन का तरीका बदलता है।' उन्होंने यह भी कहा कि एक ही समुदाय में अनेक रीति-रिवाज़ और सांस्कृतिक परंपराएँ हैं, इसलिए 'ऐसे मुल्क में यूसीसी सब पर थोपा नहीं जा सकता।'
मसूद अज़हर पर भी बोले मौलाना रजवी
यूसीसी के अलावा, मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने आतंकवादी मसूद अज़हर के मुद्दे पर भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि 'मसूद अज़हर भारत का मोस्ट वांटेड आतंकवादी है' और पाकिस्तान की सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उस पर लगाए गए जुर्माने को और बढ़ाया जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत में कई घटनाओं में मसूद अज़हर का हाथ रहा है। गौरतलब है कि उन्होंने आतंकवाद को किसी एक धर्म से जोड़कर देखने से इनकार करते हुए कहा, 'आतंकवाद एक बीमारी है और इसका खात्मा होना ज़रूरी है।'
संवैधानिक और ऐतिहासिक संदर्भ
यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब उत्तराखंड पहले ही यूसीसी लागू कर चुका है और केंद्र सरकार अन्य राज्यों में इसे विस्तार देने की योजना बना रही है। संविधान के अनुच्छेद 44 में यूसीसी को 'राज्य के नीति-निदेशक तत्त्वों' में रखा गया था — बाध्यकारी प्रावधान के रूप में नहीं — और तब से इसे लेकर धार्मिक एवं राजनीतिक बहस निरंतर जारी रही है। आलोचकों का कहना है कि यूसीसी अल्पसंख्यक समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों को प्रभावित करेगी, जबकि समर्थकों का तर्क है कि यह लिंग-न्याय और समानता की दिशा में आवश्यक कदम है।
आगे क्या होगा
केंद्र सरकार की ओर से यूसीसी के क्रियान्वयन का रोडमैप अभी विस्तृत रूप में सामने नहीं आया है। धर्मगुरुओं का यह विरोध ऐसे समय में महत्त्वपूर्ण है जब देश में यूसीसी पर राष्ट्रीय स्तर पर परामर्श-प्रक्रिया की माँग भी उठ रही है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह मुद्दा आने वाले विधानसभा चुनावों में प्रमुख राजनीतिक विमर्श बने रहने की संभावना है।