वंदे मातरम बिल पर मौलाना साजिद रशीदी का हमला — 'यह UCC से भी बड़ा हथियार है'
सारांश
मुख्य बातें
मौलाना साजिद रशीदी ने 21 जुलाई 2026 को प्रस्तावित वंदे मातरम बिल को लेकर सरकार पर तीखा निशाना साधा और आरोप लगाया कि यह विधेयक मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने की सुनियोजित साजिश है। उन्होंने इसे समान नागरिक संहिता (UCC) से भी बड़ा हथियार करार दिया।
मौलाना रशीदी के प्रमुख आरोप
रशीदी ने कहा, 'मुसलमानों के खिलाफ वंदे मातरम सबसे बड़ा हथियार है। यह UCC से भी बड़ा हथियार है। सरकार मुसलमान को नागरिक नहीं मानती, उसको मुसलमानों का वोट नहीं चाहिए और मुसलमानों का सपोर्ट नहीं चाहिए।' उन्होंने आगे कहा कि इस बिल में सजा का प्रावधान रखकर सरकार यह तय करना चाहती है कि 'अब जो वंदे मातरम गाएगा वही देशप्रेमी होगा और जिसको वंदे मातरम गाने से परहेज है, वो देशद्रोही होगा।'
ऐतिहासिक संदर्भ और धार्मिक आपत्ति
रशीदी ने 1937 के कांग्रेस-मुस्लिम लीग विवाद का हवाला देते हुए कहा कि मुसलमानों ने तब भी स्पष्ट कर दिया था कि वंदे मातरम की अंतिम छह पंक्तियाँ उनकी धार्मिक आस्था के विरुद्ध हैं। उन्होंने कहा, 'मुसलमान जान दे सकता है, ईमान नहीं दे सकता। इसलिए जो भी चीज हमारी आस्था के खिलाफ होगी, चाहे बिल आए या सजा का प्रावधान किया जाए, हमें उससे कोई फर्क नहीं पड़ता।' यह ऐसे समय में आया है जब वंदे मातरम को अनिवार्य बनाने संबंधी विधेयक पर राष्ट्रीय बहस तेज हो रही है।
बेरोजगारी और महंगाई पर सरकार को घेरा
रशीदी ने यह भी कहा कि सरकार देश में नफरत फैलाना चाहती है और असली मुद्दों — बेरोजगारी, शिक्षा और महंगाई — से ध्यान भटकाने के लिए ऐसे विधेयक लाए जा रहे हैं। उनके अनुसार, 'इन मुद्दों पर सरकार बात नहीं करना चाह रही है।'
मुस्लिम समुदाय में भिन्न मत
उल्लेखनीय है कि सोमवार को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में मुस्लिम समुदाय के काजी मोहम्मद अरशद ने इस प्रस्तावित विधेयक का समर्थन किया था। उन्होंने कहा था, 'मेरी समझ के अनुसार, वंदे मातरम देशहित और राष्ट्र की एकता का प्रतीक है। यह केवल एक गीत या नारा नहीं, बल्कि भारत की शक्ति, सम्मान और गौरव का प्रतीक है। ऐसे में यदि सरकार इसके सम्मान की रक्षा के लिए विधेयक लाना चाहती है, तो यह एक सकारात्मक पहल है।' इससे स्पष्ट होता है कि स्वयं मुस्लिम समुदाय के भीतर इस विधेयक को लेकर एकमत नहीं है।
आगे की स्थिति
वंदे मातरम बिल अभी प्रस्तावित अवस्था में है और इस पर संसदीय प्रक्रिया पूरी होनी बाकी है। विभिन्न धार्मिक एवं राजनीतिक संगठनों की प्रतिक्रियाएँ आने वाले दिनों में इस बहस की दिशा तय करेंगी।