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समान नागरिक संहिता पर विरोध तेज: जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने यूसीसी को बताया अव्यावहारिक, कांग्रेस ने माँगी व्यापक बहस

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समान नागरिक संहिता पर विरोध तेज: जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने यूसीसी को बताया अव्यावहारिक, कांग्रेस ने माँगी व्यापक बहस

सारांश

यूसीसी पर देश में बहस दो धाराओं में बँट गई है — जमीयत उलेमा-ए-हिंद का पुरजोर विरोध और कांग्रेस की 'पहले चर्चा, फिर कानून' की माँग। शामली से मुंबई तक उठती ये आवाज़ें संकेत देती हैं कि यह विधेयक संसद से पहले सड़क पर ही बड़ी परीक्षा देगा।

मुख्य बातें

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के जिला अध्यक्ष मौलाना मुफ्ती मोहम्मद साजिद कासमी ने शामली, उत्तर प्रदेश में यूसीसी को धार्मिक विविधता के विरुद्ध और अव्यावहारिक बताया।
कासमी ने कहा कि मुसलमान शरीयत के बिना नहीं रह सकते और यूसीसी को एकतरफा लागू करना उचित नहीं होगा।
कांग्रेस नेता हुसैन दलवई ने मुंबई में यूसीसी विधेयक पर व्यापक सार्वजनिक बहस और पारदर्शिता की माँग की।
दलवई ने महिलाओं के संपत्ति अधिकार , गुजारा-भत्ता और इद्दत प्रावधानों पर स्पष्टता माँगी।
बहुविवाह पर रोक के प्रस्ताव को दलवई ने सही दिशा में कदम बताया, लेकिन पूरे विधेयक पर सर्वसम्मति को ज़रूरी बताया।

समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर देशभर में राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। उत्तर प्रदेश के शामली में जमीयत उलेमा-ए-हिंद के जिला अध्यक्ष मौलाना मुफ्ती मोहम्मद साजिद कासमी ने यूसीसी का कड़ा विरोध करते हुए इसे देश की धार्मिक विविधता के विरुद्ध बताया। वहीं, मुंबई में कांग्रेस नेता हुसैन दलवई ने विधेयक पर व्यापक सार्वजनिक संवाद की आवश्यकता पर जोर दिया।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद का विरोध

मौलाना मुफ्ती मोहम्मद साजिद कासमी ने कहा कि जमीयत उलेमा-ए-हिंद पहले से यूनिफॉर्म सिविल कोड का विरोध करती आई है और यह विरोध आगे भी जारी रहेगा। उनके अनुसार, भारत विभिन्न धर्मों, संस्कृतियों और सामाजिक परंपराओं वाला देश है, इसलिए सभी पर एकसमान रूप से लागू होने वाला कानून व्यावहारिक नहीं हो सकता। उन्होंने यह भी कहा कि मुसलमान शरीयत के बिना नहीं रह सकते और अलग-अलग समुदायों की धार्मिक मान्यताओं का सम्मान किया जाना चाहिए।

कासमी के अनुसार, यूसीसी को एकतरफा तरीके से लागू करने का कोई भी प्रयास उचित नहीं होगा। यह ऐसे समय में आया है जब केंद्र सरकार यूसीसी को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाती दिख रही है।

कांग्रेस नेता की माँग: पहले चर्चा, फिर कानून

मुंबई में कांग्रेस नेता हुसैन दलवई ने कहा कि यदि सरकार यूसीसी विधेयक लाना चाहती है तो इस पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन पहले विधेयक की पूरी जानकारी आम जनता तक पहुँचनी चाहिए और इस पर व्यापक बहस होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी महत्वपूर्ण कानून को समाज के विभिन्न वर्गों से संवाद किए बिना लागू करना उचित नहीं है।

दलवई ने महिलाओं के अधिकारों की पैरवी करते हुए कहा कि महिलाओं को कानूनी अधिकार मिलना स्वागत योग्य है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मुस्लिम समाज में भी महिलाओं को आर्थिक लाभ और कुछ कानूनी अधिकार प्रदान किए गए हैं।

विधेयक के प्रमुख प्रावधानों पर स्पष्टता की माँग

दलवई ने विधेयक में संपत्ति में महिलाओं के अधिकार, गुजारा-भत्ता, इद्दत से जुड़े प्रावधानों और अन्य सामाजिक पहलुओं पर स्पष्टता की माँग की। उन्होंने कहा कि बहुविवाह पर रोक लगाने का प्रस्ताव सही दिशा में एक कदम हो सकता है, लेकिन पूरे विधेयक पर समाज के सभी वर्गों की राय आवश्यक है।

गौरतलब है कि व्यापक संवाद और सहमति से बना कानून अधिक प्रभावी और सामाजिक रूप से स्वीकार्य होगा — यह तर्क विपक्षी दलों और कई सामाजिक संगठनों की साझा माँग बनता जा रहा है।

यूसीसी बहस का व्यापक संदर्भ

यूसीसी पर यह विवाद नया नहीं है। उत्तराखंड यूसीसी लागू करने वाला देश का पहला राज्य बन चुका है, जिसके बाद केंद्रीय स्तर पर इसकी माँग और विरोध दोनों तेज हुए हैं। आलोचकों का कहना है कि बिना सर्वसम्मति के लागू किया गया यूसीसी सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुँचा सकता है, जबकि समर्थकों का तर्क है कि यह लैंगिक समानता की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम होगा। आने वाले समय में संसद में इस विधेयक पर होने वाली बहस इसकी दिशा तय करेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

जबकि कांग्रेस की 'पहले बहस' की माँग प्रक्रियागत लोकतंत्र की दलील है — दोनों अलग-अलग मोर्चों पर एक ही विधेयक को चुनौती देते हैं। उत्तराखंड के अनुभव से यह स्पष्ट है कि यूसीसी लागू करना और उसे सामाजिक स्वीकृति दिलाना दो अलग काम हैं। बिना व्यापक संवाद के पारित कानून अदालतों में चुनौती और सड़कों पर विरोध — दोनों का सामना कर सकता है, जो किसी भी सरकार के लिए राजनीतिक रूप से महँगा साबित हो सकता है।
RashtraPress
29 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

समान नागरिक संहिता (यूसीसी) क्या है और इस पर विवाद क्यों है?
यूसीसी एक ऐसा कानून है जो विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे व्यक्तिगत मामलों में सभी धर्मों के नागरिकों पर एकसमान नियम लागू करेगा। विवाद इसलिए है क्योंकि अभी अलग-अलग धर्मों के अपने पर्सनल लॉ हैं और कई समुदाय इन्हें अपनी धार्मिक पहचान का हिस्सा मानते हैं।
जमीयत उलेमा-ए-हिंद यूसीसी का विरोध क्यों कर रही है?
जमीयत उलेमा-ए-हिंद का कहना है कि भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता को देखते हुए एकसमान कानून व्यावहारिक नहीं है। संगठन के जिला अध्यक्ष मौलाना मुफ्ती मोहम्मद साजिद कासमी के अनुसार, मुसलमान शरीयत के बिना नहीं रह सकते और अलग-अलग समुदायों की धार्मिक मान्यताओं का सम्मान होना चाहिए।
कांग्रेस नेता हुसैन दलवई ने यूसीसी पर क्या कहा?
कांग्रेस नेता हुसैन दलवई ने कहा कि यूसीसी विधेयक लाने पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन पहले इसकी पूरी जानकारी जनता तक पहुँचनी चाहिए और व्यापक बहस होनी चाहिए। उन्होंने संपत्ति अधिकार, गुजारा-भत्ता और इद्दत जैसे प्रावधानों पर स्पष्टता की माँग भी की।
यूसीसी का महिलाओं पर क्या असर पड़ेगा?
दलवई ने कहा कि महिलाओं को कानूनी अधिकार मिलना स्वागत योग्य है और बहुविवाह पर रोक का प्रस्ताव सही दिशा में कदम हो सकता है। हालाँकि उन्होंने यह भी कहा कि विधेयक में संपत्ति अधिकार, गुजारा-भत्ता और इद्दत जैसे पहलुओं पर पूरी स्पष्टता ज़रूरी है।
क्या भारत में यूसीसी कहीं लागू हो चुका है?
हाँ, उत्तराखंड यूसीसी लागू करने वाला देश का पहला राज्य बन चुका है। इसके बाद केंद्रीय स्तर पर यूसीसी की माँग और विरोध दोनों तेज हुए हैं, और अब यह राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गया है।
राष्ट्र प्रेस
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